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- सीएस बरला, अर्थशास्त्री
करीब बारह वर्ष पूर्व गठित स्वामीनाथन आयोग ने भारत सरकार से कहा था कि किसानों की मेहनत व उनके जोखिम को देखते हुए किसान की लागत में ५० प्रतिशत जोडक़र समर्थन मूल्यों की घोषणा की जानी चाहिए। आयोग को यह अपेक्षा थी कि इस प्रकार के समर्थन मूल्यों से सीमांत तथा लघु किसानों को भी लाभ होगा।
इसी संदर्भ में पिछले दिनों केंद्र सरकार ने २०२२ तक किसानों की आय दोगुनी करने के उद्देश्य से खरीफ फसलों के समर्थन मूल्यों में अप्रत्याशित वृद्धि की। संभवत: रबी की फसलों के समर्थन मूल्यों में भी इसी प्रकार की वृद्धि हो। सरकार ने समर्थन मूल्य धान सामान्य का ११, धान ग्रेड (अ) का ६, ज्वार हाइब्रिड का ३०, ज्वार सामान्य का ३०, बाजरा का २९.४, कपास का २२, उड़द का ४, मूंग का २०, मूंगफली का ९, तिल का १५, काला तिल का ३१, सोयाबीन का १०, सूरजमुखी बीज का २४, अहरहर का ४, और मक्का का १६ प्रतिशत बढ़ा दिया है। यद्यपि प्रत्यक्ष तथा परोक्ष लागतों के विश्वसनीय आंकड़ों के अभाव में समर्थन मूल्यों में चार से तीस प्रतिशत तक की वृद्धि क्यों की गई, यह कहीं स्पष्ट नहीं है।
किसान ही नहीं, राजनीतिक पर्यवेक्षक भी इस प्रकार की वृद्धि से चमत्कृत हैं। कुछ टिप्पणीकारों ने तो यह तक कह दिया है कि अब किसानों के ‘अच्छे दिन’ आ गए हैं और उन्हें जश्न मनाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि अर्थशास्त्र के मुताबिक लागत दो प्रकार की होती हैं। पहली, प्रत्यक्ष लागत द्ग जिसमें नकद रूप में चुकाई गई लागत होती है। दूसरी होती है आंतरिक लागत द्ग इसमें किसान व उसके परिवार द्वारा किए गए श्रम का मूल्य, स्थिर साधनों का ब्याज तथा सामान्य जन शामिल हैं।
अब तक कृषि लागत व मूल्य आयोग का ध्यान आंतरिक लागत पर नहीं था तथा समर्थन मूल्यों में वृद्धि की सिफारिश करते समय केवल प्रत्यक्ष लागत को ही केंद्र में रखा जाता था। निस्संदेह, केंद्र सरकार द्वारा समर्थन मूल्यों में वृद्धि से आंतरिक लागत की पर्याप्त भरपाई हो सकेगी, ऐसी आशा है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या समर्थन मूल्य बढऩे से सभी किसानों को लाभ होगा? स्वामीनाथन आयोग की मानें तो लगभग दो-तिहाई किसानों के पास दो हेक्टेयर से भी कम कृषि भूमि थी। इतनी छोटी जोतों के चलते इन किसानों के लिए खेती करना कतई लाभप्रद नहीं हो सकता। २०११-१२ की कृषि गणना के अनुसार, जहां दो हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसानों की संख्या सभी किसानों में ८० प्रतिशत है, वहीं इन लघु व सीमांत किसानों के पास कुल कृषि क्षेत्र का १० प्रतिशत भू-भाग ही है।
इसके विपरीत मध्यम वर्ग के किसानों (२-४ हेक्टेयर) की संख्या कुल किसानों में करीब १५ प्रतिशत है जबकि कुल कृषि क्षेत्र में उनकी कृषि-भूमि ३० प्रतिशत है। इसी तरह 17 हेक्टेयर से अधिक भूमि वाले किसानों, जिन्हें बड़ा किसान माना जाता है, की संख्या कुल किसानों में पांच प्रतिशत है। कुल कृषि भूमि में इनकी भूमि ६० प्रतिशत है। यह कहना प्रासंगिक होगा कि देश में कृषि भूमि का वितरण अत्यंत दोषपूर्ण है तथा बड़े किसानों के पास कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा है।
देखा गया है कि छोटे व सीमांत किसान केवल जीवन निर्वाह के लिए ही कृषि में संलग्न हैं। यह वर्ग उन्नत बीजों तथा सिंचाई के साधनों का सीमित प्रयोग ही कर पाता है। इस स्थिति में इनकी जमीनों पर अनाज उत्पादकता कम रहती है। वाणिज्यिक फसलों, मसालों, फलों, तिलहनों व दलहनों का चयन भी ये इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि परिवार की उदरपूर्ति के लिए इनकी प्राथमिकता अनाज पैदा करने में होती है। जोत बहुत छोटी होने पर सीमांत तथा छोटे किसानों के पास बाजार में लाने योग्य अतिरिक्त अनाज भी बहुत कम होता है। अपने अनाज का एक बड़ा भाग स्थानीय व्यापारी को बेचकर वे नकदी भुगतान की व्यवस्था करते हैं। इस तरह समर्थन मूल्यों में वृद्धि का लाभ उन्हें मिलता है जिनके पास पर्याप्त भूमि है तथा जिनके पास बाजार में लाने योग्य अतिरिक्त उपज है।
एक ओर तो फसलों के प्रारूप (अनाज आधारित) तथा छोटी जोत के कारण सीमांत व छोटे किसान बाजार में कृषि उपज के मूल्य बढऩे के बावजूद लाभ से वंचित रहते हैं, वहीं दूसरी ओर परिवार के भरण-पोषण के लिए बाजार से अनाज खरीदने को भी विवश रहते हैं। समर्थन मूल्य बढऩे के पश्चात कृषि जिंसों की ढुलाई, परिवहन तथा अन्य खर्च जोडऩे पर बाजार में खाद्यान्नों के खुदरा दाम बढ़ जाते हैं। समर्थन मूल्य बढऩे से सार्वजनिक वितरण प्रणाली से उपलब्ध खाद्यान्न भी महंगा होना संभावित है, जब तक कि सरकारी अनुदान में वृद्धि न हो।
स्वामीनाथन आयोग ने इस ओर ध्यान खींचा था कि सरकार की ओर से कृषि पर किया जाने वाला व्यय लगातार कम हो रहा है। दूसरे, कृषि जोतों के अपखंडन तथा उपविभाजन की गहन समस्या के प्रति सरकार संवेदनशील नहीं है। हाल ही में एक अनुमान यह लगाया गया कि देश में एक सीमांत किसान की औसत आय १४,७८४ रुपए मात्र है और वह इस आय को लेकर परिवार की उदरपूर्ति नहीं कर सकता। ऐसे किसानों के पास पूरक आय का कोई स्रोत भी नहीं है। यही वजह है कि समर्थन मूल्यों के बढऩे के बावजूद इस वर्ग के किसानों को कोई लाभ नहीं मिल पाता है।

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