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और परिपक्व होगा जीएसटी

अभी जीएसटी का नेटवर्क उतना परिपक्व नहीं है और इनपुट टैक्स क्रेडिट की पुष्टि में यह पूरी तरह समर्थ नहीं दिख रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो इसका दुरुपयोग हो सकता है।

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Sunil Sharma

Aug 28, 2018

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- मधुरेन्द्र सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार

इसे आप इस सदी का सबसे बड़ा टैक्स सुधार मान सकते हैं। जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स ने देश में दोहरी टैक्स प्रणाली को खत्म कर दिया है, जिससे लाखों कारोबारियों के लिए आसानी होने लगी है हालांकि शुरुआती दिनों में इसके कारण उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था। मोदी सरकार की यह उल्लेखनीय उपलब्धि रही और यह लक्ष्य के करीब पहुंचता प्रतीत हो रहा है।

यों तो कहा जा रहा था कि कार्यान्वयन के पहले बारह महीने में इस टैक्स से सरकार को 13 लाख करोड़ रुपए की वसूली होगी, लेकिन फिलहाल यह नहीं हो पाया है। अप्रेल में एक लाख करोड़ रुपए का जादुई आंकड़ा छूने के बाद इसमें गिरावट आई, लेकिन अब पिछले तीन महीनों की औसत वसूली 95 हजार करोड़ रुपए प्रति माह की रही है। यह है तो अनुमान से कम, लेकिन इससे उम्मीदें बंधी हैं और ऐसा लग रहा है कि आने वाले महीनों में वसूली फिर एक लाख करोड़ रुपए से ऊपर चली जाएगी।

सबसे अच्छी बात है पारदर्शिता क्योंकि यह एक कंप्यूटरीकृत प्रणाली का हिस्सा है। दूसरी अच्छी बात यह हुई कि देश भर में सडक़ों से टैक्स और चुंगी के नाके हट गए जिससे ट्रांसपोर्टरों को आसानी हुई। उनका खर्च घटा और समय की भारी बचत हो रही है। जीएसटी लागू करने के पीछे यह भी एक उद्देश्य था जो पूरा होता दिख रहा है। हालांकि यह भी सच है कि अभी जीएसटी का नेटवर्क उतना परिपक्व नहीं है और इनपुट टैक्स क्रेडिट की पुष्टि में यह पूरी तरह समर्थ नहीं दिख रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो इसका दुरुपयोग हो सकता है।

जीएसटी वसूली से उत्साहित काउंसिल ने पिछले दिनों एक बड़ा कदम उठाया और 200 से ज्यादा वस्तुओं को 28 प्रतिशत टैक्स के दायरे से बाहर कर दिया। अब बहुत कम ही वस्तुएं इस वर्ग में रह गई हैं और अंदाजा है कि वे भी धीरे-धीरे बाहर हो जाएंगी। इसके अलावा 88 वस्तुओं पर काउंसिल ने टैक्स घटाकर न्यूनतम यानी 5 प्रतिशत कर दिया है। पिछले दिनों वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि टैक्स वसूली में बढ़ोतरी होने से अब 28 प्रतिशत टैक्स स्लैब को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है और इसमें सिर्फ विलासिता के सामान रह जाएंगे।

उन्होंने यह भी बताया था कि 235 तरह के सामानों पर टैक्स घटाया गया और 68 सामानों को 28 प्रतिशत स्लैब से बाहर किया गया। यह भी सोचा जा रहा है कि जीएसटी के चार वर्गों को घटाकर तीन या दो कर दिया जाए। इसके लिए 12 और 18 प्रतिशत की दर को मिलाकर 15 प्रतिशत कर दिया जाए। लेकिन यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि टैक्स की आने वाले समय में वसूली कैसी और कितनी होती है। लेकिन एक बात तय है कि टैक्स घटने से जनता और कारोबारियों में एक विश्वास जगा है। इससे दोनों को तो लाभ हो ही रहा है, आने वाले महीनों में सरकार को वह टैक्स मिलेगा जिसकी चोरी हो रही थी। इस वसूली से उम्मीद है कि देश का वित्तीय घाटा भी कम होगा।

इस वित्त वर्ष में केन्द्र सरकार को जीएसटी से करीब 70 हजार करोड़ रुपए के घाटे का अनुमान है, पर जिस तेजी से वसूली बढ़ रही है उससे यह राशि काफी कम हो जाने का अंदाजा है। सामानों की कीमतें घटने से जनता का विश्वास बढ़ा है, पर यह भी सच है कि टैक्स में कटौती का लाभ जनता तक पहुंचने नहीं दिया जा रहा है।

कई मामले सामने आए हैं जिनमें पाया गया कि कुछ बड़ी कंपनियों ने भी टैक्स कटौती का लाभ जनता तक पहुंचाने की बजाय खुद ही हड़प लिया। इसी तरह बड़े पैमाने पर रेस्तरां मालिकों ने टैक्स में कटौती के बाद खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ाकर पहले के स्तर पर कर दी हैं। सरकार ने ऐसे तत्वों से निबटने के लिए एक कानून भी बनाया है, जो टैक्स कटौती का लाभ जनता तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं।

पेट्रोल-डीजल के बढ़े हुए दाम से हैरान-परेशान जनता इन पर टैक्स घटाने की मांग कर रही है। इन उत्पादों पर ज्यादा टैक्स है और इन्हें जीएसटी में लाने की मांग जायज भी है। तय है कि आम चुनावों के मद्देनजर यह जीएसटी के दायरे में आएंगे ही। लेकिन जीएसटी ने राज्यों के राजस्व के स्रोतों को कम कर दिया है। अकाल-बाढ़ जैसी त्रासदी के अलावा किसानों का कर्ज चुकाने के लिए उनके पास अतिरिक्त धन कहां से आएगा?

बिहार जैसे राज्य ने शराबबंदी कर आय का मौजूद विकल्प भी बंद कर लिया है। इस मद में बिहार सरकार को सालाना लगभग 5,000 करोड़ रुपए की आय होती थी जो कुछ सालों से बंद हो गई है। इस कानून के कारण राज्य सरकार की आय का एक बहुत बड़ा स्रोत सूख गया है। इसका असर वहां विकास कार्यों पर पड़ा है। मुख्यमंत्री के गृह जिले नालंदा तक में सडक़ें बुरी हालत में हैं।

वोट की राजनीति के तहत शराबबंदी का विकल्प चुनने पर विचार कर रहे राज्यों को बिहार से सबक लेना चाहिए। राज्यों को धन अर्जन के उपायों के बारे में सोचना ही होगा, अन्यथा अतिरिक्त धन के लिए वे केन्द्र पर निर्भर रहेंगे और आकस्मिक परिस्थितियों में उनके हाथ बंधे रह जाएंगे। जीएसटी के अलावा धन कहां से आएगा, यह सभी राज्यों को सोचना चाहिए।

बहरहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि जीएसटी की उड़ान सही रास्ते पर है।