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लोकतंत्र या 'तंत्रलोक'

लोकतंत्र जनता के लिए कार्य करने की प्रणाली है। लेकिन अब तो लगने लगा है कि यह प्रणाली कभी थी। पिछले 75 वर्षों में सारा ही स्वरूप बदल गया। परिवर्तन तो होना ही था, किन्तु जितना और जैसा हुआ है, वह आजादी के सपनों से तो मेल नहीं खाता... कोरोना से दिनोदिन बिगड़ रहे हालात और व्यवस्था की विकृति पर चोट करता 'पत्रिका' समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विचारोत्तेजक अग्रलेख -

Published: January 13, 2022 09:00:11 am

नीति एक व्यापक शब्द है और इसके अर्थ भी व्यापक होते हैं। इसके चार विभाग हैं-साम-दाम- दण्ड-भेद। इसका अर्थ हुआ येन-केन-प्रकारेण, जैसे-तैसे-कैसे भी। आगे एक छिपा हुआ अर्थ भी है- किसी के भले-बुरे की चिन्ता किए बिना, हर परिस्थिति में, अपना कार्य सिद्ध कर लेना। नीति किसी भी क्षेत्र की हो, सिद्धान्त एक ही है। इसका सबसे श्रेष्ठ उदाहरण आज की राजनीति है। सच बात तो यह भी है कि लोकतंत्र और राजनीति में ज्यादा सामंजस्य होता नहीं है।

हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था जनता द्वारा और जनता के लिए निर्धारित है। जनता ही अपने प्रतिनिधि चुनती है, जो राजकाज चलाते हैं, जनता का पालन करते हैं, उसे जीवन चलाने और विकास करने के अवसर प्रदान करते हैं। एक तरह से संरक्षक की भूमिका निभाते हैं। यानी लोकतंत्र जनता के लिए कार्य करने की प्रणाली है। लेकिन अब तो लगने लगा है कि यह प्रणाली कभी थी। पिछले 75 वर्षों में सारा ही स्वरूप बदल गया। परिवर्तन तो होना ही था, किन्तु जितना और जैसा हुआ है, वह आजादी के सपनों से तो मेल नहीं खाता।

देश में कोरोना की तीसरी लहर का दौर चल रहा है। पिछले दो वर्ष में कोरोना ने अनगिनत जानें ली हैं। केन्द्र व राज्यों की सरकारें नित नई गाइडलाइन जारी करती जाती हैं। किसके लिए? न सरकारें, कार्यपालिका और राजनीति के महारथी इन गाइडलाइनों का पालन करते हैं, न ही किसी के मरने पर आंसू बहाते हैं। मास्क न लगाने पर आम आदमी का ही चालान काटते हैं। दो गज दूरी रखने और सैनिटाइज करने के नारे भी केवल आम आदमी के लिए। सही तो कहावत है- 'गरीब की जोरू सब की भाभी'। पिछले कोरोनाकाल में लोग मरते रहे, नेता अपनी जीत के जश्न में डूबे रहे। आम नागरिक यदि एक-दूसरे की सहायता नहीं करता, तो न जाने कितने और लोग जिन्दगी से हाथ धो बैठते।

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Gulab Kothari Article distortion of system Loktantra ya Tantralok
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राजस्थान में तो बड़े-बड़े आयोजन स्वयं सरकार एवं राजनीतिक दलों ने ही प्रायोजित किए थे। क्रिकेट मैच और कांग्रेस की महंगाई भगाओ रैली का आयोजन सरकार की देखरेख में ही हुआ। भाजपा के सम्मेलन और वसुन्धरा राजे के देव दर्शन कार्यक्रम को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। कौन सा मास्क और कौन सी दूरियां? जो मरता है मरे! उसका अपना भाग्य।

अभी तो कोरोना का रोना और बढऩे वाला है। देशभर की भविष्यवाणियां कह रही हैं कि 15 फरवरी तक तीसरी लहर का दौर चरम पर होगा। हैरत की बात यह है कि इस तथ्य के बावजूद हमारे मुख्य चुनाव आयुक्त ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया। यह तो हमारे लोकतंत्र के ठाठ और जनता के हित में होने वाले कार्यों की बानगी है।

केन्द्र सरकार ने विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित की थी जिसने चुनाव वाले पांच राज्यों में कोविड प्रसार की आशंकाओं का अध्ययन किया था। गत सोमवार को ही स्वास्थ्य विभाग में इस प्रकरण पर चर्चा की गई। यह आकलन रिपोर्ट आंखें खोलने वाली है। रिपोर्ट के कुछ दिन पूर्व ही चुनाव आयोग ने चुनाव की तिथियां घोषित की थीं। रिपोर्ट के अनुसार पांच में से तीन चुनावी राज्य (उत्तर प्रदेश, पंजाब, व मणिपुर) कोविड की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील हैं।

रिपोर्ट में देश के 714 जिलों को इस दृष्टि से चार श्रेणियों में बांटा है। इनमें से पहली और दूसरी श्रेणी को कोरोना फैलाव की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील घोषित किया गया है। इन दोनों श्रेणियों वाले जिलों में वेक्सीन की दोनों डोज आधे से भी कम लगी हैं। तथा दोनों में ही आबादी के अनुपात में कोरोना सक्रमण के केस ज्यादा है।

उत्तरप्रदेश के 75 में से 65 जिले इन दो श्रेणियों में आते हैं। पहली व दूसरी श्रेणी में क्रमश: 39 एवं 26। इसी प्रकार पंजाब में 22 में से 21 जिले संवेदनशील हैं जिनमें पहली श्रेणी में 9 व दूसरी में 12 है। मणिपुर के 16 में से 9 जिले हैं जिनमें दो पहली श्रेणी में व सात दूसरी श्रेणी में हैं। सर्वे में कुल 99 जिले पहली, 212 जिले दूसरी, 299 जिले तीसरी और 104 जिले चौथी श्रेणी में माने गए हैं।

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सरकारें पूरी शक्ति से कार्य तो करेंगी। टीकाकरण की गति बढ़ाने की बड़ी चुनौती होगी। साथ ही अस्पतालों में बिस्तर, गहन चिकित्सा इकाई, जांच सुविधा, मेडिकल स्टाफ, दवाइयां, ऑक्सीजन आदि की आपात व्यवस्था के भी मुद्दे सामने हैं। कोरोना की बढ़़ती रफ्तार व्यवस्था की प्रतीक्षा नहीं करेगी।

खतरनाक परिणाम भी आ सकते हैं। रिपोर्ट में स्थिति को विस्फोटक बताया गया है। तब इन चुनावों को लोक के लिए तंत्र की व्यवस्था माना जाए अथवा तंत्र के लिए लोक की आहुति। देखना है कि प्रकृति को क्या मंजूर होगा?

कोरोना के चरम पर पहुंचने में एक माह बाकी है और सरकारें अभी से इतनी चिन्तित नजर आ रही हैं। कहीं मास्क लगाने की सख्ती, कहीं नाइट कफ्र्यू और कहीं लॉकडाउन की तैयारी। चुनाव प्रक्रिया चरम पर होने के दौरान कोरोना संक्रमण का प्रसार हुआ तो क्या होगा यह एक बड़ा प्रश्न है।

अभी तो जिन सरकारों ने पिछले दिनों बड़े-बड़े आयोजन तक करवाए, वे भी पाबन्दियों की इस दौड़ में पीछे नहीं। साल भर तक तो हजारों किसान आन्दोलनरत थे। कहां था कोरोना? ऐसा लगता है कि जहां सरकारों का स्वार्थ होता है, वहां कोरोना पहुंच ही नहीं सकता। जहां सरकार को कमाई करनी होती है वहां अनावश्यक रूप से चालान कटने लगते हैं।

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आज दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, बेंगलूरु जैसे शहरों में तो हालात बेकाबू होने लगे हैं। सरकारें तरह-तरह के आदेश जारी करने लग गईं हैं। चुनाव वाले राज्यों में भी सख्ती है पर सरकारों की सुविधा के हिसाब से। चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में फिलहाल चुनाव रैलियों पर पाबंदियां लगा रखी हैं।

यूपी में शादी-समारोह में बंद कमरे के आयोजन में 100 से कम और खुले में क्षमता के 50 फीसदी अतिथि बुलाने की छूट है तो राजस्थान में शहरी इलाकों में 50 की सीमा बांध दी गई है। चुनाव वाले राज्य पंजाब में निजी व सरकारी कार्यालयों में दोनों डोज वालों को ही अनुमति दी गई है तो स्कूल-कॉलेज 15 जनवरी तक बंद रखने के निर्देश हुए हैं। दिल्ली-मुम्बई तो युद्ध स्तर पर कूद पड़े हैं।

दिल्ली महाराष्ट्र, यूपी, तमिलनाडु, पंजाब, छत्तीसगढ़ व त्रिपुरा, कमोबेश सब जगह नाइट कफ्र्यू लागू है लेकिन दिन की गतिविधियों को सरकारों की सुविधा के अनुसार अनुमत श्रेणी में अथवा पाबंदी वाली श्रेणी में रखा गया है। कहीं सिर्फ स्कूल बंद हैं तो कहीं स्कूल-कॉलेज दोनों। हिमाचल प्रदेश में सार्वजनिक कार्यक्रमों में-इण्डेार में अधिकतम 100 व खुले में 300 लोग जमा हो सकते हैं। वहीं केरल में इण्डोर में 75 व खुले में 150 लोगों के शामिल होने की छूट है।

सबसे ज्यादा उन गतिविधियों को बंद किया गया है जिनसे सरकारों के राजस्व पर खास असर नहीं पड़ता। जहां कमाई है वहां बंदिशें कहीं दिखती ही नहीं। अगले 15-20 दिन में देश की तस्वीर क्या होगी महज अनुमान ही लगाया जा सकता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि एक मोटे अनुमान के अनुसार प्रतिदिन दस लाख तक संक्रमण के नए केस आने शुरू हो जाएंगे।

पांच राज्यों में इसी दौरान पार्टियों के बड़े नेता राजनीतिक दौरों पर और राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी चुनाव क्षेत्रों में ड्यूटी दे रहे होंगे। इन चुनाव वाले राज्यों में कोरोना की चर्चा तक नहीं होने वाली। वहां नाइट कर्फ्यू भी दिखावे का! न कोई लॉकडाउन। कोरोना प्रभावित लोगों को भी कार्यकर्ता भर-भरकर ले जाएंगे-मतदान करने। वापिस लौटें तो भाग्य से। हालांकि कोरोना संक्रमितों को घर से मतदान की सुविधा भी दी गई है।

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जहां चुनाव नहीं, उन राज्यों के अधिकारी भी नदारद होंगे। ये लोग शहरों से ही लुप्त हो जाते हैं। नेता भी बस वक्तव्य जारी करते रहते हैं। अनुमान के मुताबिक हालात विकट हुए तो फरवरी मध्य तक कई राज्यों में लॉकडाउन लगने की आशंका है। ऐसे में जनजीवन ठप हो सकता है। हर व्यक्ति जीवन के लिए प्रार्थना कर रहा होगा। और, चुनावी राज्यों में कोरोना चरम पर हो भी जाए तो राजनेता उत्साह के साथ जीत की खुशियां मनाने में मशगूल होंगे।

वे ही जनता के रहनुमा और 'शुभचिन्तक' होते हैं। वे ही लोकतंत्र के कर्णधार कहलाते हैं। तो क्या वे ही 'तंत्र' में स्वयं की भागीदारी के लिए 'लोक' की बलि चढ़ाएंगे। क्या इससे वीभत्स स्वरूप लोकतंत्र का हो सकता है? लोक पर शासन करने वाला ऐसा तंत्र कितना 'जनता के लिए' हो पाएगा, जो जनता को रौंदकर सत्ता पर काबिज होना चाहता है!
अफसर तो जनता के नौकर होते हैं, किन्तु जनता के हित को बाद में देखते हैं। जनता कितना भी विरोध कर ले, सुनेंगे ऊपर वालों की। और यही हुआ। संक्रमण का विस्तार आकलन के अनुरूप हुआ तो कोरोना केचरमकाल में ही आम चुनाव हो जाएंगे।

लेकिन चुनाव परिणाम आने तक, विजयी जुलुस निकलने तक और नई सरकारों के शपथ ग्रहण समारोह तक यह चरम दिखाया नहीं जाएगा। तो क्या हमें आभार प्रकट करना चाहिए-मुख्य चुनाव आयुक्त का जिसने जनता को यह 'सुअवसर' प्रदान किया।

प्रश्न तो उठता है जन प्रतिनिधियों के आचरण को लेकर। सभी राजनीतिक दल चुनाव टालने के लिए तैयार नहीं हैं। उनके कानों में कोरोना की भविष्यवाणियां नहीं जा रहीं। वे तो जनता को समय पर नई सरकारें देने को उत्सुक हैं। उनको कुर्सी दिखाई पड़ रही है। जनता की जान की कीमत दिखाई नहीं पड़ रही है।

वैसे भी डॉक्टर्स कह ही रहे हैं कि यह दौर उतना खतरनाक नहीं है। इससे ज्यादा खतरनाक अपराधी तो चुनाव में जीतकर आने वाले हैं। नेताओं को कुर्सियां मिल जानी चाहिए। उसके बाद पांच साल तक वैसे भी जनता की जरूरत किसको पड़ती है! मरते रहेंगे, उनकी बला से। आज तो यही लोकतंत्र का उपहार है। ठुकरा दो या प्यार करो!

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