scriptGulab Kothari Article Sharir Hi Brahmand 25 June 2022 | शरीर ही ब्रह्माण्ड: मानव योनि में पशु भाव | Patrika News

शरीर ही ब्रह्माण्ड: मानव योनि में पशु भाव

Gulab Kothari Article Sharir Hi Brahmand: आज मनुष्य दूसरों का अन्न झपटने लगा है। आसुरी भाव में उतरने लगा है। उसे देव रूप में सुख-शान्ति का जीवन स्वीकार्य नहीं है। निश्चित ही है कि पुन: पशुभाव में ही जाना पड़ेगा। आज चारों ओर मानव देह में असुर और पशु दिखने लगे हैं... 'शरीर ही ब्रह्माण्ड' श्रृंखला में पढ़िए पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख-

Updated: June 25, 2022 12:23:41 pm

Gulab Kothari Article: सृष्टि में चौरासी लाख योनियां हैं। इनमें मनुष्य एकमात्र कर्मयोनि है, शेष भोगयोनियां हैं। भोगयोनियां भी मनुष्य के चारों ओर ही रहती हैं क्योंकि सारा ऋणानुबन्ध एक-दूसरी आत्मा के साथ ही रहता है। हम अपने चारों ओर दृष्टिपात करें तो दसों योनियां तो घर के आसपास ही दिखाई दे जाएगी। गाय-भैंस-कुत्ता-बिल्ली-चूहा-चींटी-छिपकली-दीमक-कीट-पतंगे-चिडिय़ा-कबूतर-चील-कौए-हाथी-घोड़े-बैल-बकरी-भेड़े-ऊंट... वगैरह वगैरह। इसी प्रकार पेड़-पौधे-जलचर-नभचर आदि हैं। ये सारी तो स्थूल-शरीर येानियां हैं। सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म योनियां भी होती हैं। हमारा प्रत्यक्ष परोक्ष रूप में सभी से सम्बन्ध रहता है। इस स्थूल देह में जो सूक्ष्म आत्मा रहता है, उसका सम्बन्ध तो सातों लोकों से रहता है। वह अन्य आत्मा को पहचान लेता है और पूर्व कर्म के अनुरूप ही उससे व्यवहार करता है। बुद्धि-शरीर आदि को भान भी नहीं होता कि ऐसा क्यों हो गया।
शरीर ही ब्रह्माण्ड: मानव योनि में पशु भाव
शरीर ही ब्रह्माण्ड: मानव योनि में पशु भाव

इसी प्रकार पालतू जानवर तो परिवार के सदस्यों की तरह हमारे साथ रहते हैं। वे हमें पराए लगते ही नहीं। उनके साथ एक विशेष प्रकार का सुख भी अनुभव करते हैं। कृष्ण ग्वाले थे। गाय उनकी प्रतिनिधि बन गई। मोरपंख भी उनकी पहचान में समा गया।

कालिया नाग उनके जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया। अनेक राक्षसों से उनका पाला पड़ा। राम की तो सेना ही वानरों की थी। जामवन्त रीछ थे। जटायु ने रावण से युद्ध किया था। पत्थर बनीं अहिल्या को पुन: मुक्त किया था।

मानव जाति का इतिहास मूल में तो चौरासी लाख योनियों का ही है। कई जैन तीर्थंकरों के मन में करुणा ही कारण थी, वैराग्य जागरण के पीछे। भोज के लिए एकत्र पशुओं की क्रन्दन ध्वनियां ही करुणा का निमित्त बनी थीं। हिन्दू देवी-देवताओं के वाहन भी पशु-पक्षी ही हैं।

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जैन तीर्थंकरों की पहचान भी वाहनों से ही होती हैं, जो पशु-पक्षी रूप होते हैं। उदाहरण के लिए प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का वाहन वृषभ है। अन्तिम तीर्थंकर महावीर का वाहन सिंह है। गणपति के वाहन मूषक को कौन नहीं जानता। लक्ष्मी उल्लू पर और विष्णु गरुड़ पर सवार रहते हैं।

शिव का वाहन बैल, पार्वती का सिंह है। इनका सबका तात्त्विक अर्थ भी है। ये सभी सृष्टि के तत्त्व हैं। शरीर से इनके गुणों का परिचय मिलता है। लक्ष्मी जहां है, वहां अज्ञान का अंधकार बढ़ जाता है। उल्लू को अंधकार की गतिविधियां दिखाई पड़ती है। जहां ऐश्वर्य है, वहां उल्लू नहीं है। शिव के साथ वृषभ है, वृषण करता है। सृष्टि के जनक हैं।

सर्प विष का प्रतीक है, जो सभी विषयों का मूल है। उनको बाहर नियंत्रित रखने वाला (गले में) शिव ही हो जाता है। मूषक खेत की मिट्टी को ऊपर नीचे करके उसकी उर्वरा को बनाए रखता है। ये गणपति प्राण का कार्य है। ब्रह्मा, महासरस्वती, महालक्ष्मी आदि कमलासीन देव सृष्टि के जनकदेव हैं।

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जीवन का आधार कर्म है और विश्व का आधार कर्मों का फल है। आत्मा न जन्म लेता है, न मरता है। न इसे कोई मार सकता है। पुराने वस्त्रों की तरह शरीर बदल लेता है। इसकी यात्रा चौरासी लाख योनियों में ही बंधी रहती है। इसका कारण भी यही है कि कोई भी मनुष्य क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता। क्योंकि वह प्रकृति जनित गुणों द्वारा कर्म करते रहने के लिए बाध्य किया जाता है- गीता 3/5 ।

कर्म की निरन्तरता ही फल की निरन्तरता है। यही योनियों के व्यापार की निरन्तरता है। हर मनुष्य लाखों योनियों से गुजरता हुआ, लाखों माताओं के गर्भ में पलता हुआ आता है। इन योनियों के संस्कार, ऋणानुबन्ध भी साथ लाता है।

इनको ही संचित कर्म कहते हैं। हमारे व्यवहार में समय-समय पर पिछली योनियों के संस्कार भी झलकते रहते हैं। क्योंकि सृष्टि में तो मानव भी पशु है। भले ही अनृत है।

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जिसे हम प्रकृति कहते हैं, नदी-पहाड़-जंगल-अभयारण्य कहते हैं, वे हमारे ही वंशज हैं। इस दृष्टि से भी कि सबके हृदय में वही एक ईश्वर वास करता है।
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। (गीता 18.61)
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। (गीता 6.30)
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। (गीता 15.7)

इसी अवधारणा को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' कहा गया है। हम सब एक दूसरे से श्रद्धा-सूत्र से बंधे हुए भी रहते हैं। इनके साथ आत्मा का आदान-प्रदान भी रहता है। हमारा अन्न, जो विदेशों से भी मंगाते हैं, जो यात्रा करके अन्यत्र ग्रहण करते हैं, वह अनायास नहीं होता।

किसी के प्रति हमारे विचार, बोल स्वत: ही प्रवाहित नहीं होते। हम भी इस प्रकार एक-दूसरे का अन्न बनते हैं। प्रकृति में देखा जाता है-''जीवो जीवस्य भोजनम्' प्रकृति में रक्षक योनियां भी हैं, भक्षक योनियां भी हैं। यहां तक कि असुरों में भी रक्षक होते हैं।

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योनियां कर्मों के फल रूप में प्राप्त होती हैं। कर्मों का आधार इच्छा है, इच्छा का आधार मन है, मन का आधार अन्न है। यहीं से कर्मों की प्रेरणा की भूमिका बनती है। प्रेरणा का एक अन्य कारण इच्छा भी है।

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:।। (गीता 8.6)
- मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, उस-उस को ही प्राप्त होता है। क्योंकि वह सदा उस भाव से ही भावित रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी यौनाचारी को पुन: मनुष्य देह ही प्राप्त हो। श्वान, कुक्कुट, हिरण, सर्प, कबूतर आदि कई ऐसी योनियां हैं जो इस क्षेत्र में ही रमण करती हैं।

ईश्वर हमारी इच्छा तो पूरी करता है, क्योंकि मूल में यह भी उसी की इच्छा है। योनि प्राप्ति का आधार शरीर न होकर भाव या कामना की पूर्ति मात्र है। क्रोध कामना पूर्ति के अभाव से उत्पन्न होता है। तृष्णा कामना पूर्ति के काल्पनिक सुख से उत्पन्न होती है।

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अत: कामनाएं गुणों के आधार पर फल देती हैं। हमारा मन-बुद्धि-शरीर तीनों त्रिगुण के प्रभाव से आवरित रहते हैं। अत: एक ही के फल की विभिन्न योनियां हो सकती हैं। इसी प्रकार जीव के वर्ण का भी स्वरूप दिखाई पड़ता है। प्रकृति में मनुष्य-पशु-दानव-देवता और जड़ तक सभी के चार वर्ण होते हैं, जो कि जीव का अभिन्न अंग रहता है।

किसी भी अभयारण्य के पशु-पक्षियों को इसी दृष्टि से समझ सकते हैं। शेर-मृग-हाथी-घोड़े-सियार-भेडिय़े आदि को देखें, अथवा चिडिय़ा-मयूर-गिद्ध-चील-कबूतर आदि को देखें, सभी चार-चार वर्ण के होंगे। तृण, वृक्ष, पौधे आदि के भी चार ही वर्ण होंगे। कोई एक-दूसरे का अन्न नहीं खाते, सिवाय गिद्ध और भेडिय़े के। कृष्ण कहे रहे हैं-
चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।। गीता 4.13
- चारों वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरेे द्वारा रचा गया है।

आगे कहते हैं-
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:।। गीता 18.41
- चारों वर्णों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के द्वारा विभक्त किए गए हैं।

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यही कारण है कि पशु भी एक दूसरे का अन्न नहीं खाते। हां! आज मनुष्य दूसरों का अन्न झपटने लगा है। आसुरी भाव में उतरने लगा है। उसे देव रूप में सुख-शान्ति का जीवन स्वीकार्य नहीं है। निश्चित ही है कि पुन: पशुभाव में ही जाना पड़ेगा। आज चारों ओर मानव देह में असुर और पशु दिखने लगे हैं।

ये भोग योनियों में ही तो होता है। मनुष्य की भी ऐसी कई योनियां हैं। कर्म प्रधान, संस्कार प्रधान क्षेत्र में भी अब इनका प्रवेश होने लगा है। सौहार्द का स्थान आक्रामकता छीन रही है। व्यक्ति से भयभीत होने लगा है। मानो पशु से मिल रहा है। ये हत्याएं, बलात्कार, लूट आदि मानवीय गुण नहीं हैं।

असुरों के भी आगे असुर/पशु ही पैदा होंगे। तब चीन और रूस जैसी आक्रामकता साधारण बात हो जाएगी। कह नहीं सकते कि कल्कि अवतार भी इस प्रवाह को रोक पाने में समर्थ होंगे या नहीं। बस, आस्था मात्र एक उत्तर है। क्रमश:

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