
गुलाब कोठारी
शरीर कोई साधारण मशीन नहीं, ब्रह्माण्ड की प्रतिकृति है। उसके बाद भी कोई दो शरीर एक जैसे नहीं होते। विज्ञान भले ही ठोस दावे ठोकता रहे, आज भी हमारे तीन शरीर (कारण-सूक्ष्म-स्थूल), पंचकोश, सप्तगुहा जैसे सिद्धान्तों को स्पष्ट नहीं कर पाया। तीन मन, तीन श्रेणी के प्राण और प्रकृति के सांवत्सरिक चक्र के समन्वय की अवधारणा को चिकित्सा से नहीं जोड़ पाया। यही कारण है कि कई बीमारियों की जड़ तक नहीं पहुंच पाया। शरीर (स्थूल) में होने वाली अभिव्यक्ति (सिम्टम्स) की ही चिकित्सा हो पा रही है। दवा बन्द कैसे हो, जब रोग का कारण, कारण-शरीर में उपस्थित हो। मरते दम तक दवा बन्द नहीं कर सकते-भले ही उसके साइड इफेक्ट होते रहें। चिकित्सा की लागत का अनुमान भी लगा सकते हैं।
दूसरी बात है शरीर निर्माण की प्रक्रिया के ज्ञान में विरोधाभास। शरीर में परिवर्तन की प्रक्रिया की एक प्राकृतिक गति होती है। इससे तेज परिवर्तन का प्रयास इस प्राकृतिक प्रणाली को ध्वस्त कर देता है। हर शरीर में रोग भी पनपने में कई वर्ष लेता है। उसे पुन: स्वस्थ होने में भी उतना ही समय चाहिए। यही तो आयुर्वेद चिकित्सा का आधार है। कौन रोगी आज के युग में इतना समय चिकित्सा में लगाने को तैयार होगा! उसे तो तुरन्त स्वस्थ होना है। इस इच्छा की पूर्ति के लिए ही मेडिकल साइन्स नए-नए प्रयोग करता है। मानव जीवन एक प्रयोगशाला बन गया है। कभी सल्फा ड्रग्स रामबाण थी- विष बन गई। पेनिसिलिन अगले चरण में विषैली साबित हो गई। एण्टीबायोटिक के आगे भी कई दवा-प्रणालियां बाजार में हैं। एक से बढ़कर एक साइड इफेक्ट से समाज त्रस्त है। क्योंकि इन औषधियों की प्रहारात्मक गति शरीर की प्राकृतिक परिवर्तन गति से कई गुणा तेज है। शरीर का रोग निरोधक तंत्र समर्पण कर देता है। रोग पर नियंत्रण छूट जाता है। कैंसर इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
आपने मधुमेह की दवा ली। शरीर को इन्सुलिन मिल गया। शुगर कम हो गई। पैन्क्रियाज (अग्नाशय ग्रन्थि) को सन्देश गया-‘इन्सुलिन नहीं बनाना है’। फैक्ट्री बन्द हो गई। आप 15-20 वर्ष तक दवा खाते रहेंगे, तो इस काल में पैन्क्रियाज काम ही नहीं करेंगी। धीरे-धीरे सदा के लिए बन्द को जाएंगी। दवा की मात्रा सब तय करेंगी। दवा बन्द करने की सलाह भी कोई डाक्टर नहीं देगा। समय के साथ डायबिटीज के कारण कितने दूसरे अवयवों पर दुष्प्रभाव पड़ता है, यह तो आज सर्वविदित है। यही हाल और भी कुछ असाध्य रोगों का है।
शरीर में जो अन्न या दवा पेट में जाएंगी, उनका पहले रस बनता है। रस निर्माण के जो रसायन हैं, वे सब अन्त:स्रावी ग्रन्थियों (endocrine glands) से निकलते हैं। इन रसायनों का निर्माण हमारे विचार तंत्र से होता है।
विचाराें से ही रोग पैदा होते हैं, विचारों से ही चिकित्सा का मार्ग प्रशस्त भी होता है। रस से रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र बनते हैं। प्रत्येक धातु के निर्माण में औसतन सात दिन का समय लगता है। आगे ओज और मन का निर्माण होता है। मन पर अन्न का प्रभाव होने में नौ सप्ताह का समय लग जाता है। तब मन के विचार बदलते हैं। रक्त की दवा का प्रभाव दो सप्ताह में, अस्थि की दवा का प्रभाव पांच सप्ताह में हो पाता है। इतने समय में दवा अपने कार्य क्षेत्र में पहुंच पाती है। चिकित्सा में कितना समय लगेगा यह तो रोग की गंभीरता पर निर्भर करेगा।
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अब यदि हम तेजी से इलाज लेते हैं, तो हमारा यह प्राकृतिक तंत्र समाप्त (बेकार) हो जाता है। तीन या पांच सप्ताह की जगह 2-3 दिन में हम स्थान पर पहुंचना चाहते हैं तो भीड़ को धक्का देकर निकलने की सी बात हो गई। यह भी सही है कि शरीर स्वधर्म नहीं छोडे़गा। वह अपनी गति से स्वस्थ रहने का उपक्रम बनाए रखेगा किन्तु पार नहीं पा सकेगा। चिकित्सा का अन्त अवयव को निकाल देने तक ले जाता है। काम करना बन्द कर देगा तो निकालना ही पडे़गा।
कई बार चिकित्सकों ने अन्त:स्रावी ग्रन्थियों को भी निकालकर देखा है। रोग को कम नहीं कर पाए। क्योंकि रोग का कारण विचारों से जुड़ा है। उनमें जब तक परिवर्तन नहीं आएगा, अन्त:स्रावी ग्रन्थियों के स्राव नहीं बदलेंगे। रोग ठीक नहीं होगा।
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आजकल एक नई अवधारणा प्रचलन में आ रही है—बॉडी-मास-इन्डेक्स। व्यक्ति की आयु, ऊंचाई (लम्बाई) के अनुरूप उसका वजन कितना हो। सम्पूर्ण मानव समाज को एक निश्चित पैमाने पर बांध दिया। इसमें व्यक्ति का प्रकृति-पूर्व कर्म-जन्मजात वंश प्रभाव आदि को गौण मान लिया गया है। व्यक्ति का कर्म क्षेत्र श्रमप्रधान है, बुद्धिप्रधान है, कर्म अतिअल्प है, जैसे कारणों का बोध स्वचिन्तन पर आधारित है। नई पीढ़ी को यह चिन्तन बहुत रास आ रहा है। वह ‘जिम’ जाने लगी है। गहन शारीरिक श्रम करके अपना वजन घटा रही है। खान-पान छूट रहा है। लाखों रुपये दे-देकर डाइटिशियन से खाने का प्रोग्राम बनवा रहे हैं। यह वैज्ञानिक विकास का दौर है। ‘स्लिम’ रहना आज का प्राथमिक लक्ष्य है।
हम ऊपर वर्णित शरीर की धातुओं की कार्यप्रणाली को देखें तो दूसरी बात यह भी समझ में आएगी कि धातुओं के निर्माण का एक क्रम भी है। अन्न से रक्त नहीं, पहले रस ही बनेगा। खाना नहीं खाएंगे तो रस कहां से बनेगा? रस से रक्त बनता है। रक्त की कमी रस के कारण होगी। रक्त से मांस बनता है। मांस से मेद-अस्थि-मज्जा-शुक्रादि बनते हैं। एक धातु की कमी से आगे की सभी धातुओं में कमी आ जाएगी। सभी धातुओं की रोग-निरोधक क्षमता घटती जाएगी। मन तक तो शायद कुछ पहुंचने को बचे ही नहीं। तब क्या प्यार-क्या सपने-क्या सुख-दु:ख। मन नियंत्रण से मुक्त ही समझो। हमारा जीने का एकमात्र कारण मन है। हमारे कर्म का आधार मन की इच्छाओं को पूरी करना ही तो है। इसको सदा प्राणवान बनाए रखना होता है। इसी से मन गतिमान होता है। मन भावप्रधान तत्त्व है। भाव अन्न से उठते हैं। सत्त्व ही उत्कर्ष है। रोग तमस का स्वरूप होता है। अत: इस देश में भक्ति की प्रधानता है।
चाराें से ही रोग पैदा होते हैं, विचारों से ही चिकित्सा का मार्ग प्रशस्त भी होता है। रस से रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र बनते हैं। प्रत्येक धातु के निर्माण में औसतन सात दिन का समय लगता है। आगे ओज और मन का निर्माण होता है। मन पर अन्न का प्रभाव होने में नौ सप्ताह का समय लग जाता है। तब मन के विचार बदलते हैं। रक्त की दवा का प्रभाव दो सप्ताह में, अस्थि की दवा का प्रभाव पांच सप्ताह में हो पाता है। इतने समय में दवा अपने कार्य क्षेत्र में पहुंच पाती है। चिकित्सा में कितना समय लगेगा यह तो रोग की गंभीरता पर निर्भर करेगा।
अब यदि हम तेजी से इलाज लेते हैं, तो हमारा यह प्राकृतिक तंत्र समाप्त (बेकार) हो जाता है। तीन या पांच सप्ताह की जगह 2-3 दिन में हम स्थान पर पहुंचना चाहते हैं तो भीड़ को धक्का देकर निकलने की सी बात हो गई। यह भी सही है कि शरीर स्वधर्म नहीं छोडे़गा। वह अपनी गति से स्वस्थ रहने का उपक्रम बनाए रखेगा किन्तु पार नहीं पा सकेगा। चिकित्सा का अन्त अवयव को निकाल देने तक ले जाता है। काम करना बन्द कर देगा तो निकालना ही पडे़गा।
कई बार चिकित्सकों ने अन्त:स्रावी ग्रन्थियों को भी निकालकर देखा है। रोग को कम नहीं कर पाए। क्योंकि रोग का कारण विचारों से जुड़ा है। उनमें जब तक परिवर्तन नहीं आएगा, अन्त:स्रावी ग्रन्थियों के स्राव नहीं बदलेंगे। रोग ठीक नहीं होगा।
आजकल एक नई अवधारणा प्रचलन में आ रही है—बॉडी-मास-इन्डेक्स। व्यक्ति की आयु, ऊंचाई (लम्बाई) के अनुरूप उसका वजन कितना हो। सम्पूर्ण मानव समाज को एक निश्चित पैमाने पर बांध दिया। इसमें व्यक्ति का प्रकृति-पूर्व कर्म-जन्मजात वंश प्रभाव आदि को गौण मान लिया गया है। व्यक्ति का कर्म क्षेत्र श्रमप्रधान है, बुद्धिप्रधान है, कर्म अतिअल्प है, जैसे कारणों का बोध स्वचिन्तन पर आधारित है। नई पीढ़ी को यह चिन्तन बहुत रास आ रहा है। वह ‘जिम’ जाने लगी है। गहन शारीरिक श्रम करके अपना वजन घटा रही है। खान-पान छूट रहा है। लाखों रुपये दे-देकर डाइटिशियन से खाने का प्रोग्राम बनवा रहे हैं। यह वैज्ञानिक विकास का दौर है। ‘स्लिम’ रहना आज का प्राथमिक लक्ष्य है।
हम ऊपर वर्णित शरीर की धातुओं की कार्यप्रणाली को देखें तो दूसरी बात यह भी समझ में आएगी कि धातुओं के निर्माण का एक क्रम भी है। अन्न से रक्त नहीं, पहले रस ही बनेगा। खाना नहीं खाएंगे तो रस कहां से बनेगा? रस से रक्त बनता है। रक्त की कमी रस के कारण होगी। रक्त से मांस बनता है। मांस से मेद-अस्थि-मज्जा-शुक्रादि बनते हैं। एक धातु की कमी से आगे की सभी धातुओं में कमी आ जाएगी। सभी धातुओं की रोग-निरोधक क्षमता घटती जाएगी। मन तक तो शायद कुछ पहुंचने को बचे ही नहीं। तब क्या प्यार-क्या सपने-क्या सुख-दु:ख। मन नियंत्रण से मुक्त ही समझो। हमारा जीने का एकमात्र कारण मन है। हमारे कर्म का आधार मन की इच्छाओं को पूरी करना ही तो है। इसको सदा प्राणवान बनाए रखना होता है। इसी से मन गतिमान होता है। मन भावप्रधान तत्त्व है। भाव अन्न से उठते हैं। सत्त्व ही उत्कर्ष है। रोग तमस का स्वरूप होता है। अत: इस देश में भक्ति की प्रधानता है।
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Updated on:
02 Jul 2024 10:59 am
Published on:
02 Jul 2024 10:54 am
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