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हिंदी से अन्य भारतीय भाषाओं को खतरा नहीं

अंग्रेजी के साम्राज्यवाद से भारत जैसा एशियाई देश ही नहीं, यूरोप के देश भी परेशान  

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जयपुर

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Patrika Desk

Oct 30, 2022

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अरुण कुमार त्रिपाठी
लेखक और शिक्षक
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गृह मंत्रालय की सरकारी भाषा की समिति ने बीते माह राष्ट्रपति को जो रिपोर्ट सौंपी है उस पर हंगामा मचा हुआ है। उस पर चौतरफा हमला हो रहा है। एक ओर वे लोग हमला कर रहे हैं जो मानते हैं कि हिंदी को महत्त्व दिए जाने से अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा होगी और उस भाषा के बोलने वालों में एक परायापन आएगा। दूसरी ओर वे लोग हैं जिनका मानना है - ज्ञान और सत्ता की भाषा अंग्रेजी ही है और भारतीय भाषाएं संस्कृति और अस्मिता से आगे नहीं बढ़ पाई हैं, वे संकीर्णता पैदा करती हैं, और यह भी कि अंग्रेजी को विदेशी भाषा कहना गलत है वह तो भारतीय भाषा ही है। इन तर्कों की पड़ताल से पहले उन सिफारिशों को जान लेना जरूरी है जो गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में दी गई बताई जाती हैं।

उस रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्रीय विद्यालयों, आइआइटी, आइआइएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षण का माध्यम हिंदी होगी। सरकारी नौकरियों की परीक्षा हिंदी में होगी। उन अफसरों से जवाब मांगा जाएगा जो जानबूझ कर हिंदी में काम नहीं करते। अंग्रेजी वहीं शिक्षा का माध्यम होगी जहां पर जरूरी होगा। वरना उसे हिंदी से बदल दिया जाएगा। सरकारी नौकरियों में चयन के लिए हिंदी का ज्ञान जरूरी होना चाहिए। सरकार के विज्ञापन का 50 प्रतिशत बजट हिंदी वालों को दिया जाएगा। हिंदी का प्रचार-प्रसार करना सभी राज्य सरकारों का दायित्व होगा।

हालांकि ये सिफारिशें संविधान के अनुच्छेद 351 और सरकारी भाषा संबंधी दूसरे प्रावधानों के अनुकूल हैं लेकिन इनको लेकर आशंकाएं फैलाने वाले तुरंत सक्रिय हो गए हैं और कह रहे हैं कि इस देश पर हिंदी वाले और हिंदू लोग अपनी मिल्कियत चलाना चाहते हैं। अगर यह सब प्रावधान लागू कर दिए गए तो असमिया, बांग्ला, तमिल, मलयाली और दूसरे भाषा-भाषियों का क्या होगा? दूसरे धर्मों का क्या होगा? यहां तक कि दूसरी भाषाओं में की जाने वाली पत्रकारिता का क्या होगा?

संयोग से हिंदी के विरोध में इन तर्कों की बौछार उन लोगों की ओर से हो रही है जो स्वयं भारतीय संघ में जिम्मेदार पदों पर रहे हैं और उन्होंने हिंदी को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। जब भी हिंदी का नाम लिया जाता है, ऐसे लोगों के लिए अन्य भाषाएं खतरे में पड़ जाती हैं। लेकिन उनके सामने मराठी भाषी पत्रकार सखाराम गणेश देउस्कर की देशेर कथा (देश की बात) का उल्लेख करना संभवत: काफी होगा। देउस्कर ने यह पुस्तक बांग्ला में लिखी थी। बाद में उसका हिंदी अनुवाद उनके भांजे और हिंदी पत्रकारिता के शिखर पुरुष बाबूराव विष्णु पराडक़र ने किया था। देउस्कर भारतीय जन जागरण के ऐसे विचारक हैं जिनके चिंतन और लेखन में स्थानीयता और अखिल भारतीयता का अद्भुत संगम है। उनकी मातृभाषा मराठी, लेखन की भाषा बांग्ला और चिंतन मनन का क्षेत्र अर्थशास्त्र, समाज और साहित्य था। वे हितवादी और हितवार्ता के संपादक भी रहे। इसलिए ऐसा विचार कोई नासमझ ही व्यक्त कर सकता है कि किसी भारतीय भाषा को बढ़ावा देने से दूसरी भारतीय भाषा को परायापन महसूस होगा।

दूसरा आक्रमण उन लोगों का है जो कहते हैं कि यह समस्या राजनीतिक उतनी नहीं है जितनी कि ज्ञान से जुड़ी हुई है। उनका मानना है कि हिंदी के दक्षिण पर थोपे जाने की आशंका उतनी नहीं है जितनी कि हिंदी के आते ही ज्ञान के द्वार बंद हो जाने की है। वे मध्य प्रदेश में हिंदी में मेडिकल पढ़ाई शुरू किए जाने पर तंज करते हैं। उनका मानना है कि इससे कुछ होने वाला नहीं है और यह प्रक्रिया ज्यादा दिन नहीं चलेगी। वे कहते हैं कि वास्तव में हिंदी ज्ञान के द्वार बंद कर देती है, विज्ञान के द्वार बंद कर देती है और कानून के द्वार बंद कर देती है। वे मान चुके हैं कि हम दो भाषाएं बोल सकते हैं लेकिन दो भाषाओं में ज्ञान को संचित नहीं कर सकते। इसीलिए तमाम अभिभावक आज अंग्रेजी पढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं। वह मांग निरंतर बढ़ती जा रही है। इसलिए असली दिक्कत यह नहीं है कि लोगों को हिंदी में उच्च शिक्षा नहीं दी जा रही है और उच्च न्यायालयों की भाषा हिंदी नहीं है। असली दिक्कत यह है कि समाज के सभी वर्गों को अंग्रेजी की शिक्षा समान रूप से उपलब्ध नहीं है, फिर चाहे कारण जो भी हों।

उन लोगों का मानना है कि हिंदी पर जोर देना लोहियावादियों की सनक थी और अब वह सनक मौजूदा सरकार पर सवार हो रही है। लेकिन ऐसा सोचते और कहते हुए वे अंग्रेजी के साम्राज्यवादी स्वरूप को नजरंदाज कर देते हैं जिसने शासक वर्ग के हितों के कारण दुनिया के अन्य भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान की जबरदस्त उपेक्षा की। उसके दूसरे समाजों को हीन बताया और अपने समाज और ज्ञान को श्रेष्ठ बताया। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि अंग्रेजी के साम्राज्यवाद से भारत जैसा एशियाई देश ही नहीं, यूरोप के देश भी परेशान हैं। अंग्रेजी का यह दबदबा द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले इतना नहीं था जितना उसके बाद हुआ है। इस सिलसिले में रॉबर्ट फिलिप्सन की 1992 में आई पुस्तक ‘लिंगुइस्टिक इम्पीरियलिज्म’ दुनिया के 11 देशों में प्रकाशित हो चुकी है। फिलिप्सन बताते हैं कि यूरोपीय संघ के गैर ब्रिटिश देश भाषाई साम्राज्यवाद के कारण ही ब्रिटेन को हर साल 17 अरब यूरो (1992 में) का भुगतान कर रहे थे। यह उन देशों पर अनावश्यक बोझ है और इसका विरोध भी हुआ है।

इसी सिललिसे में एक और विचारक फ्रांस्वा ग्रिन अपनी रिपोर्ट में कहते हैं कि अगर यूरोप ज्यादा समतामूलक भाषा प्रणाली अपना ले तो हर साल 25 अरब यूरो की बचत हो सकती है। भाषाई साम्राज्यवाद के इसी परिदृश्य पर चिंता जताते हुए मानवशास्त्री गणेश देवी कहते हैं कि वे हर साल भाषाओं को मरते हुए देख रहे हैं। सभी भाषाओं के भीतर ज्ञान की थाती है उसे बचाया जाना है तो भाषा को भी बचाना होगा।