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मानवाधिकार हो विकास का लक्ष्य

हम अपनी विकास नीतियों पर फिर से विचार करें और देखें कि क्या विकल्प हो सकता है जो उत्पादन-वृद्धि तो करे, साथ ही रोजगार, समानता और मानवाधिकारों को भी पुष्ट करता हो।

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Sunil Sharma

Aug 07, 2018

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- नंदकिशोर आचार्य, साहित्यकार व विवेचक

विकास को सामान्य तौर पर केवल आर्थिक संदर्भ में ही समझा जाता है और उसका मूल्यांकन जीडीपी के आधार पर किया जाता है, जो भ्रामक अवधारणा है। इसीलिए सरकारें और आर्थिक मूल्यांकन करने वाली राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां हर तिमाही-छमाही इसके आंकड़े प्रकाशित करती रहती हैं, जो उनका व्यवसाय है। लेकिन आर्थिक विकास का मतलब अगर सामान्य जनता के जीवन की खुशहाली है तो महज जीडीपी के आधार पर उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। तब हमें देखना होगा कि खुशहाली तो दूर, क्या सामान्य जन की बुनियादी जरूरतें भी आवश्यक मात्रा में पूरी हो रही हैं?

चीन और भारत को आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करने से पहले हमें यह देखना होगा कि क्या इन दोनों देशों में आसानी से रोजगार उपलब्ध है या नहीं। कुछ वर्ष पूर्व अपनी चीन यात्रा के दौरान वहां के अंग्रेजी समाचार-पत्र 'चाइना डेली' में प्रकाशित खबरों से पता चला कि चीनी समाज में भयंकर बेरोजगारी, गरीबी और उससे पैदा हिंसक झड़पें सामने आ रही हैं। पुलिस के अनुसार इसका कारण निरन्तर बढ़ती जा रही आर्थिक असमानता थी- गरीब और अमीर के बीच बढ़ती हुई खाई।

हमारे यहां अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट बताती है कि भारत में भी कुल जनसंख्या का लगभग साढ़े सतहत्तर प्रतिशत हिस्सा अपनी सभी प्रकार की जरूरतें तीस रुपए प्रतिदिन में किसी-न-किसी तरह पूरी करने को मजबूर है। इस साढ़े सतहत्तर फीसदी हिस्से को भी उस रिपोर्ट में तीन श्रेणियों में बांटा गया था, क्योंकि उसका निम्नतम स्तर का हिस्सा नौ रुपए प्रतिदिन तथा मध्य स्तर का हिस्सा पन्द्रह रुपए प्रतिदिन से काम चलाता है। क्या ऐसी अर्थव्यवस्था को वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करना वाजिब कहा जा सकता है? कुछ चुनिंदा देशों को छोड़ कर सामान्य जनता की यह स्थिति लगभग सभी जगह देखी जा सकती है।

शायद इसीलिए डडले सियर्स जैसे अर्थशास्त्री के विकास को मापने के पैमाने में तीन मुख्य आधार थे। पहला, गरीबी का उन्मूलन, दूसरा सबके लिए रोजगार तथा तीसरा आर्थिक असमानता में निरन्तर कमी। जिस देश में आए दिन किसान आत्महत्या कर रहे हों, बढ़ती युवा जनसंख्या रोजगार के अभाव में हिंसक और आपराधिक कामों में फंसती जा रही हो, बैंकों की स्थिति चरमराती लगती हो, वहां क्या तटस्थ दृष्टि से अपनी आर्थिक और विकासपरक नीतियों का कुछ जायजा लेना उचित नहीं होगा?

इसी के साथ एक सवाल यह भी बनता है कि क्या विकास के मूल्यांकन की कोई मानवाधिकारपरक दृष्टि भी हो सकती है। यदि जीडीपी में बढ़ोतरी को भी एक आधार मानें तो भी यह सवाल तो बना ही रहता है कि इस बढ़ोतरी की अपनी कीमत क्या है और समाज का कौन-सा वर्ग वह कीमत चुका रहा है। विकास की प्रचलित प्रक्रिया मानवाधिकारों को पुष्ट करने वाली है या उनका हनन करने वाली? मानवाधिकारों को भी अधिकांशत: राजनीतिक सन्दर्भ में ही समझा जाता है। यानी चुनाव और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार। लेकिन मानवाधिकारों के पहलुओं में आर्थिक-सांस्कृतिक अधिकार भी शामिल हैं।

अगर हम केवल अपने देश के संदर्भ में विचार करें तो भी स्पष्ट है कि हमारे विकास कार्यक्रम बड़ी हद तक मानवाधिकार-विरोधी हैं। प्राकृतिक विनाश के अलावा पांच करोड़ से अधिक लोग अपने इलाकों से विस्थापित होकर भटकने को मजबूर हैं। यह संख्या बढ़ती ही जानी है। और, भाषा शोध के अनुसार दो सौ बीस भाषाएं लुप्त हो चुकी हैं, जो सांस्कृतिक मानवाधिकार का स्पष्ट हनन है। एक भाषा के लुप्त होने का मतलब एक भाषिक समूह तथा उस भाषा में संजोए ज्ञान का लुप्त हो जाना है। एक सामाजिक समूह की अस्मिता का नष्ट हो जाना है। इसीलिए, नियामिगिरी पहाडिय़ों में सरकार द्वारा खनन की अनुमति के मामले में उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा कि वहां के निवासियों की सहमति के बिना खनन नहीं किया जा सकता। अन्य जगहों के आदिवासियों के इलाकों में बांधों और खनन के कारण न जाने उनके कितने आस्था-स्थल डूब या खनन का ग्रास हो गए होंगे, इसका कोई लेखा-जोखा किसी के पास नहीं है।

दिल्ली जैसे महानगरों में झारखंड या छत्तीसगढ़ से आये जो लडक़े-लड़कियां घरेलू नौकरों के रूप में कार्यरत हैं, वे अधिकांशत: विस्थापित ही हैं। यही हाल उड़ीसा, आंध्र, महाराष्ट्र या अन्य राज्यों के आदिवासी इलाकों से विस्थापितों का है। नैतिक दृष्टि से देखा जाए तो जबरन विस्थापन एक प्रकार का जाति-हनन है, क्योंकि एक सामाजिक-सांस्कृतिक समूह के रूप में विस्थापित समूह धीरे-धीरे अपने को खो देता है। ये लोग न केवल अपनी भाषा-संस्कृति और निवास खो देते हैं, बल्कि अपने व्यवसाय भी। अगर कुछ मुआवजा उन्हें मिलता भी है तो उसका कोई निरन्तर लाभ देने वाला उपयोग वे नहीं जानते। बैंक में जमा कर दिये जाने पर भी उस रकम की वास्तविक कीमत बढ़ती महंगाई और घटती ब्याज दरों के कारण कम होती जाती है।

यह उचित अवसर है कि हम अपनी विकास नीतियों पर फिर से विचार करें और देखें कि क्या विकल्प हो सकता है जो उत्पादन-वृद्धि तो करे, साथ ही रोजगार, समानता और मानवाधिकारों को भी पुष्ट करता हो। क्या गांधी, शुमाकर या कुमारप्पा जैसे विचारक इसमें कुछ मदद कर सकते हैं?