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- शिवकुमार शर्मा, कवि एवं न्यायविद
प्रतियोगी परीक्षाओं के आयोजन के दौरान कई मर्तबा आम आदमी का जीना दूभर होने लगा है। परीक्षा तिथि को बड़ी संख्या में परीक्षा देने जुटने वाली भीड़ को संभाले रखने के साथ-साथ कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन को एक तरह से पंजों पर खड़ा होना पड़ता है। उससे भी बड़ी चुनौती परीक्षाओं में नकल रोकने की है। कारण यह भी है कि संचार क्रांति के कारण इंटरनेट के माध्यम से नकल के नित नए तरीके सामने आने लगे हैं। आए दिन नकल गिरोह पकड़े जा रहे हैं इससे भी इस समस्या के विकराल स्वरूप को समझा जा सकता है।
यह बात सही है कि निष्पक्ष परीक्षाएं कराना प्रशासन का दायित्व है। सबसे अहम सवाल यह है कि क्या इस दायित्व के निर्वहन में आम नागरिक के अधिकारों का हनन किया जा सकता है? संचार क्रांति के इस दौर में हर व्यक्ति के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल दैनिक आवश्यकता हो गई है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मोबाइल पर इंटरनेट सुविधा के लिए भुगतान करता है। इस सुविधा से उसे जब तक वंचित नहीं किया जा सकता जब तक कि वह भुगतान में डिफॉल्टर न हो। पिछले दिनों से यह देखा जा रहा है कि जिन शहरों में प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन होता है वहां प्रशासनिक आदेश मात्र से ‘इंटरनेट कफ्र्यूू’ लगा दिया जाता है। इस प्रकार के आदेश को जनहित में कतई नहीं माना जा सकता। परीक्षा में नकल की रोकथाम के नाम पर सम्पूर्ण शहर को इस तरह से ‘लकवाग्रस्त’ नहीं किया जा सकता।
मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों के संगठन ‘सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसियेशन ऑफ इंडिया’ ने पिछले दिनों भारत सरकार के दूरसंचार मंत्रालय को भी पत्र लिखा है। पत्र में इस बात पर चिंता जताई गई है कि राज्य सरकारें इंटरनेट को अस्थायी बाधित करने की प्रवृत्ति को बढ़ा रही है। खास तौर से राजस्थान के बारे में कहा गया है कि सरकार ने पहले गृह सचिव को ही प्राप्त शक्तियों को जिला कलक्टर व पुलिस अधीक्षकों को हस्तांतरित कर दिया है जिससे वे भी अब इंटरनेट सुविधा पर अस्थायी रोक लगा सकेंगे।
किसी निश्चित अवधि तक इंटरनेट बंद करने के आदेश स्वेच्छाचारी होने के कारण संविधान के अनुच्छेद १४ के प्रतिकूल है। यह आम नागरिक के दैनिक जीवन को प्रभावित कर अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन करता है। परीक्षा केन्द्रों पर जेमर लगा इंटरनेट का सीमित इस्तेमाल इस समस्या का समाधान जरूर हो सकता है।

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