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करगिल विजय दिवस: बीस साल बाद

करगिल समीक्षा समिति की सिफारिशों के अनुसार हमने तैयारी की है। संचार तंत्र बेहतर हुए हैं और निगरानी में ड्रोन जैसे आधुनिक साधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
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जयपुर

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Dilip Chaturvedi

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Updated: 26 Jul 2019, 1:14 PM IST

Kargil Vijay Diwas opinion

Kargil Vijay Diwas opinion

करगिल विजय दिवस से एक दिन पहले सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने एकदम ठीक कहा कि बीस साल पहले हमने ऐसा मुंहतोड़ जवाब दिया कि पाकिस्तान अब वैसी हिमाकत दोहराने की जुर्रत नहीं करेगा। दरअसल बीस साल पहले भी पाकिस्तान ऐसी जुर्रत इसलिए कर सका था कि तब हम थोड़े निश्चिंत थे। जोजिला से लेह तक की 300 किमी नियंत्रण रेखा (एलओसी) की सुरक्षा के लिए हमारी सेना की सिर्फ एक ब्रिगेड तैनात थी, जिसकी तीन यूनिटों में सिर्फ 2500 सैनिक थे। इसकी एक यूनिट के पास 100 किमी लंबी सीमा की जिम्मेदारी थी । यह एक असंभव टास्क था, जिसे पूरा करने में हमारी सेना बहादुरी से डटी थी। दुर्गम जोजिला से लेकर दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र सिचायिन तक की भौगोलिक कठिनाइयों को देखते हुए यहां कई गुना ज्यादा ताकत की जरूरत थी। तब हमने इसकी जरूरत महसूस नहीं की थी। इलाके में जीवन बचाए रखने की मुश्किलों को देखते हुए दोनों देश सर्दियों में बर्फबारी शुरू होने से पहले 14-18 हजार फुट ऊंचे पर्वत शिखरों से अपनी सैन्य टुकडिय़ों को नीचे बुला लेते थे। यह सिलसिला वर्षों से चल रहा था जिसका पाकिस्तानी सेना ने फायदा उठाना चाहा और 4-10 किमी तक भारतीय क्षेत्र में घुस आई।

उसने हमारी खाली चौकियों पर कब्जा जमा लिया, जिसकी जानकारी भी हमें बाद में चरवाहों की सजगता से हुई थी। कुछ अर्ध-प्रशिक्षित आतंकियों की हरकत समझकर हमारी सेना उन्हें खदेडऩे गई तो सबसे पहले कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच बहादुर साथियों को शहादत देनी पड़ी, क्योंकि ऊंचाई पर पाकिस्तान की प्रशिक्षित सेना पूरी तैयारी से मौजूद थी। इसके बाद जो हुआ वह भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। आज बीस साल बाद हम पाते हैं कि हमारी सैन्य ताकत, तैयारी और राजनीतिक नेतृत्व की सोच में काफी बदलाव आ चुका है। पुलवामा में सुरक्षा बलों के काफिले पर आतंकी हमले के बाद बालाकोट को निशाना बनाकर, हमने न सिर्फ पाकिस्तान, बल्कि पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि अपनी सुरक्षा के लिए हम उस हद तक भी जा सकते हैं, जिससे पहले परहेज करते थे।

एलओसी पर अब तीन गुना ज्यादा तैनाती है। बर्फबारी के दौरान भी हमारी चौकियां खाली नहीं रहती हैं। सुरक्षा के लिए जरूरी मूलभूत संरचनाएं तैयार कर ली गई हैं। जिन इलाकों से घुसपैठ हो सकती है, उनकी पहचान करते हुए सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए जा चुके हैं और अग्रिम पंक्तियों में सैन्य टुकडिय़ां हमेशा चौकस हैं। करगिल समीक्षा समिति की सिफारिशों के अनुसार हमने तैयारी की है। संचार तंत्र पहले से बेहतर हुए हैं और निगरानी में ड्रोन जैसे आधुनिक साधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके विपरीत, ऐसी सूचना मिल रही है कि सीमा के उस पार काफी बुरी स्थिति है। करगिल विजय का एक सबक यह भी है कि बुरे इरादों से बेहतर मुकाम हासिल नहीं किए जा सकते।