
शास्त्रीय गायक वसंतराव देशपांडे
विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक
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पंडित भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व और लता मंगेशकर को समर्पित एक फिल्म और उसके आरंभिक दृश्य में उस्ताद जाकिर हुसैन मंच पर अपनी ही रौ में। सामने श्रोताओ की तालियां और अनवरत वाह वाह। ग्रीन रूम में बैठा एक शांत चित्त कलाकार। मंच से झांककर लौटा एक साथी कहता है - लगता है बारिश होने वाली है। कलाकार धीरे-से मुस्कुराते हुए कहता है द्ग ‘बारिश तो हो रही है, अंदर..., सुनिए।’ यह कलाकार और कोई नहीं, भारतीय शास्त्रीय संगीत के विलक्षण पुरोधा वसंतराव देशपांडे हैं। परदे पर तारीख भी दिखती है 3 फरवरी 1983। फिल्म में यह मंच प्रस्तुति वसंतराव देशपांडे की अंतिम प्रस्तुति के रूप में याद की गई, क्योंकि इसके करीब 6 माह बाद 30 जुलाई 1983 को भारतीय संगीत को नई पहचान देने वाली यह आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई थी।
बायोपिक की भीड़ में, लीक से हटकर काम करने वाले शास्त्रीय गायक पर तीन घंटे से भी अधिक की मराठी फिल्म ‘मी वसंतराव’ विस्मित करती है, और उम्मीद भी देती है कि हिंदी न सही, क्षेत्रीय सिनेमा अब एंटरटेनमेंट को व्यापक अर्थों में स्वीकारने के लिए तैयार है।
वसंतराव ने जिस कुशलता से शास्त्रीय गीत गाए, उतने ही प्रेम से नारदी और नाट्य संगीत में भी योगदान दिया। उन्होंने दुपट्टा ओढ़ कर मराठी लावणी भी गाए, गजल भी, ठुमरी भी। शास्त्रीय संगीत में शुचिता का आग्रह रखने वाले आलोचक वसंतराव को कहते हैं, गायकी का एक अलिखित नियम होता है, पर तुम्हारी गायकी निर्बंध है। वसंतराव कहते हैं, ‘मैं स्वत:स्फूर्त गाता हूं। मुझे नियम पसंद नहीं।’ जब कोई टोकता है द्ग तुम अपने को तानसेन समझते हो। वसंतराव मुस्कुराते हैं- नहीं, मी वसंतराव।
फिल्म ‘मी वसंतराव’ एक शास्त्रीय गायक के जीवन संघर्ष को रेखांकित करने के बहाने संगीत और कला के विविध पहलुओं को भी ईमानदारी और संवेदना के साथ कुरेदने की कोशिश करती है। निर्देशक निपुण अविनाश धर्माधिकारी कुशलता से समय और सुर को पकड़ते हुए दर्शकों को वसंतराव के साथ, वसंतराव के समय में विचरने का अवसर देते हैं। कहानी 2 मई 1920 से शुरू होती है, जब वंसतराव का जन्म होता है। अपनी गायिकी के साथ बड़े हो रहे वसंतराव की मुलाकात दीनानाथ मंगेशकर से होती है। स्वाधीनता आंदोलन के उस दौर में महाराष्ट्र में जिनकी लोकप्रियता आज के किसी सितारे से कम नहीं थी। निर्देशक दीनानाथ के बहाने कला में लोकप्रियता के संकट को भी रेखांकित करता है, वसंतराव के साथ दीनानाथ अपनी पीड़ा बांटते हैं। दारिद्रय सिर्फ वस्तु का नहीं होता, दारिद्रय तो वह भी है कि आप गाना कुछ और चाहते हैं, पर लोगों के दवाब में आपको गाना कुछ और होता है।
वसंतराव बेहतर भविष्य की तलाश में मामा के साथ लाहौर चले जाते हैं। संगीत की भूख और गुरु की तलाश उन्हें बेचैन कर देती है। पर जहां भी वे जाते हैं, पहला सवाल आता है कि किस ‘घराने’ से हो। यह सवाल उनका पीछा नहीं छोड़ता। वे कहते हैं, मेरा घराना मेरे से शुरू होता है। फिल्म में कलाकार की इस विडंबना से भी हम रू-ब-रू होते हैं जब विवाह के बाद अपने परिवार के भरण पोषण के लिए वसंतराव को अपने संगीत को छोड़ कर फौज में अकाउंटेंट की नौकरी करनी पड़ती है। ‘मी वसंतराव’ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि एक कलाकार के वैविध्य को प्रस्तुत करती है, बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण है कि कला, खास कर संगीत की दुनिया में प्रवेश का अवसर देती है, संगीत को समझने, जानने और महसूस करने के लिए तैयार करती है।
Published on:
23 Jul 2023 09:40 pm
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