भारतीय नेताओं और भारतीयों को अनावश्यक भावुकता से बचना चाहिए। जब हम इससे बचेंगे, तभी सुधार का सही संदेश दे पाएंगे।
भारत में नवजोत सिंह सिद्धू की पाकिस्तान यात्रा पर हुआ विवाद जितना चिंताजनक है, उतना ही विचारणीय भी है। सिद्धू पंजाब में कांग्रेस सरकार में मंत्री हैं, उन्हीं के राज्य और उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सिद्धू की निंदा करके विवाद को बढ़ा दिया है। सिद्धू की यात्रा में विशेष रूप से तीन बातें ऐसी हुई हैं, जो वर्षों तक चर्चा में रहेंगी। इन तीनों ही बातों से न केवल सिद्धू, बल्कि हमें भी शिक्षा लेनी चाहिए। पहली बड़ी बात यह हुई कि सिद्धू ने पाकिस्तान में सेना प्रमुख बाजवा को गले लगा लिया। आश्चर्य नहीं, स्वयं कांग्रेस के मुख्यमंत्री को यह गलत लगा।
यह आपत्ति वाजिब है, क्योंकि पाक सेना का भारत विरोधी आतंकी अभियान जगजाहिर है। क्या बाजवा से किसी भी भारतीय को गले मिलना चाहिए? इस पर सिद्धू की जो सफाई है, वह उसी अनावश्यक भावुकता से प्रेरित है, जिसका शिकार यह भाव-विभोर देश सदा से होता आया है। गुरुनानक देव की जयंती पर भारत-पाक बीच नया द्वार खोलने के पाक जनरल के विचार से ही सिद्धू गदगद हो गए। सिद्धू की सदिच्छा अपनी जगह है, लेकिन स्वयं उनकी पार्टी इसे समझ नहीं पाई, विरोधियों को छोड़ दीजिए। भावुकता में एक विवाद उनके साथ हमेशा के लिए जुड़ गया।
दूसरा विवाद सिद्धू के पाक अधिकृत कश्मीर के राष्ट्रपति के बगल में बैठने को लेकर है। बैठाने वालों ने बड़ी धूर्तता के साथ सिद्धू का ऐसा पड़ोसी चुना, ताकि भारत की दुखती रग को दबाया जा सके। यहां सिद्धू पड़ोसी नहीं बदल सकते थे, पर किसी भारतीय मेहमान के साथ यह पाकिस्तानी व्यवहार चकित नहीं करता। एक नकारात्मक फोटो सिद्धू के विरोधियों और पाकिस्तान के पास हमेशा के लिए सुरक्षित हो गई है। हम भारत के लोग भावुकता में भूल जाते हैं कि पाकिस्तान के बहुत सारे लोग भारत को दुश्मन मानते हैं।
पाकिस्तान से अमन और दोस्ती के लिए ही इंदिरा गांधी ने १९६५ में जीती हुई जमीन को लौटाया और १९७१ की लड़ाई के बाद करीब ९२,००० पाकिस्तानी सैनिकों को कैद से मुक्त किया था। वर्ष १९९९ में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए। वर्ष २००१ में जनरल मुशर्रफ को आगरा समिट के लिए बुलाया। वर्ष २०१५ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इतने भावुक-प्रेरित हुए कि अचानक पाकिस्तान पहुंचकर नवाज शरीफ से पारिवारिकता निभाने की कोशिश की। इतिहास गवाह है, हर बार भारत को धोखा मिला है, लेकिन हम बार-बार भूल जाते हैं। गले लगाते हैं, साड़ी, शॉल भेंट करते हैं।
नतीजा सामने है - सिद्धू बड़े प्रेम से पाक प्रधानमंत्री इमरान खान को शॉल ओढ़ा रहे हैं और इमरान में इतनी सदाशयता भी नहीं कि सिद्धू की ओर देख लें। खुली झप्पी और हास्य सिद्धू की खूबी होगी, पर जरूरी नहीं कि पाकिस्तान उसे समझे। सिद्धू की सदाशयता भुला देने लायक है, लेकिन इससे हमें जो सबक मिले हैं, वो हमारे व्यवहार में स्थायी रहने चाहिए। पाकिस्तान में सत्ता पर काबिज होने वालों को साड़ी, शॉल ओढ़ाने की संस्कृति तब समझ आएगी, जब वे वहां कफन और कत्ल के बाजार को समेटेंगे। बेशक, जब तक वे न सुधरें, तब तक हमें अपनी शॉल सुरक्षित रखनी चाहिए।