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पत्रिका में प्रकाशित आज का अग्रलेख- लोक विरोधी तंत्र

ऐसा लगने लगा है कि विधायिका और कार्यपालिका ही तय करेंगी कि न्यायपालिका के आदेश लागू हों या नहीं हों। न्यायपालिका मूक बनी बैठी है। उसके सैकड़ों आदेश धूल चाट रहे हैं, जहां जनहित से ज्यादा कार्यपालिका और विधायिका के हित बड़े हैं। आजकल जयपुर में अतिक्रमण हटाने के नाम पर आतिशी बुलडोजर चल रहे हैं।

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जयपुर

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Kirti Verma

Jun 30, 2024

गुलाब कोठारी
ऐसा लगने लगा है कि विधायिका और कार्यपालिका ही तय करेंगी कि न्यायपालिका के आदेश लागू हों या नहीं हों। न्यायपालिका मूक बनी बैठी है। उसके सैकड़ों आदेश धूल चाट रहे हैं, जहां जनहित से ज्यादा कार्यपालिका और विधायिका के हित बड़े हैं। आजकल जयपुर में अतिक्रमण हटाने के नाम पर आतिशी बुलडोजर चल रहे हैं। अधिकारी, जनता पर गुर्रा रहे हैं। मानो उनकी निजी भूमि किसी ने छीन रखी हो। हाईकोर्ट ने अभी कुछ कार्रवाई रुकवाई।

दूसरी ओर दिल्ली रोड स्थित एक बड़ी होटल का मामला कानून की पालना का अद्भुत उदाहरण बना हुआ है। होटल निर्माण लगभग पूरा हो चुका है, तब अधिकारियों को कानून याद आ रहे हैं। क्या सारा निर्माण ढंककर किया जा रहा था? क्या जो नुकसान होटल को ढहाने से होगा, वह राष्ट्र का नुकसान नहीं होगा? जिन अधिकारियों ने होटल बनते देखा है-मौन रहकर, उन पर कार्रवाई पहले होनी चाहिए। जब होटल बनने की स्वीकृति जारी हुई, तब क्या कानून का उल्लंघन नहीं था? हाईकोर्ट ने 72 घंटे के नोटिस की शर्त लगा दी। कार्रवाई के आदेश दबे पड़े रहे।

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जेडीए को भेजे ही नहीं गए। शायद कुछ हाथ लग जाए। वन विभाग अपनी भूमि पर कार्रवाई करने में कितना चाक-चौबन्द है इसका उदाहरण सरिस्का बाघ अभयारण्य है। मीडिया में लगातार समाचार छपने के बावजूद एक भी रिसोर्ट नहीं टूटा। क्यों? अफसरों का था ना? सवाईमाधोपुर अभयारण्य के भीतर स्व. फतेहसिंह ने पक्के निर्माण करवा लिए, होटल बन गए, किसी ने तोड़ने के लिए आज तक कोई कदम उठाए? जयपुर में पहाड़ों पर बसी कॉलोनियों को छूट किस

कानून में मिली हुई है?
राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ऐसे मामलों की भरमार है जिनमें अदालतों के आदेश की अवहेलना हो रही है। यहां बानगी के तौर पर राजस्थान के कुछ ऐसे मामलों का जिक्र करना चाहूंगा जिनमें लगता है कि अफसर चाहें तो अवैध को वैध करने का काम आसानी से किया जा सकता है।

सच यह है कि अधिकारी, कानून का डर दिखा दिखाकर आम आदमी पर बुलडोजर चलाते हैं। बड़े नेता और वोटर इनके देवता है। जयपुर के पास रामगढ़ बांध के जल ग्रहण क्षेत्र में कितने अधिकारियों/नेताओं ने जमीनें दबा रखी हैं। कितने अवैध एनिकट बने हुए है।

शुद्धिकरण का समय
बांध की जमीन में पक्के निर्माण और खेती क्या कानून पालने वालों की बेहयाई और दादागिरी नहीं है? क्या इनको जेलों में नहीं होना चाहिए? तब इनको शहरों में बुलडोजर चलाने का क्या अधिकार है?

क्या झालाना बाईपास की 200 फीट जमीन पर 100 फीट तक के पक्के अतिक्रमण बुलडोजर को न्यौता नहीं देते? पहले उन पर चले। बरसों से आदेशों की धज्जियां उड़ रही हैं। नेताओं के नाम तक छप चुके हैं। न्यायालय की कमेटियां कई बार अपनी रिपोर्ट दे चुकी हैं। जब तक वहां बुलडोजर नहीं चले, नए आदेशों की पालना में विभाग को कही भी निर्माण ध्वस्त करने का नैतिक अधिकार नहीं है।

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जयपुर के आगरा रोड पर सैक्टर 34-35 (खो-नागोरियान तथा जामडोली के मध्य) का 1222.93 हैक्टर एरिया इकॉलोजिकल जोन में है। पूर्व स्थिति बनाए रखने के हाईकोर्ट के आदेश भी हैं। हो उल्टा रहा है। हाईकोर्ट मौन क्यों है अपनी अवमानना पर? वही जाने। यहां सड़कें बन रही हैं, सीवरेज-पेयजल लाइनें डल रही हैं, आबादी बसाने का काम हो रहा है। अवमानना करने वाले के विरुद्ध नामजद कार्रवाई होनी चाहिए।

बाईस गोदाम से मालपुरा रोड तक 13.6 किलोमीटर सड़क, 100 फीट चौड़ी होनी चाहिए। बाद में विधायक, अधिकारियों ने मिलकर इसकी चौड़ाई 40-60-80 फीट कर दी। किसी ने तोड़ने की चर्चा तक नहीं की। इस प्रकरण में निर्माण यथास्थिति में बनाए रखने के आदेश हाईकोर्ट ने दिए हैं। आज सब कुछ अनदेखी हो रही है।

कोटा में श्रीनाथपुरम में सड़क पर कब्जा करके एक बाहुबली पूर्व विधायक ने निर्माण करा लिया। कोर्ट के आदेशों के बावजूद अफसर इस बाहुबली की ही सेवा कर रहे हैं, कानून की नहीं। कोर्ट का स्टे भी अब नहीं है। कोटा में ही पुराने तालाब की भूमि, भूखण्ड काटकर बेची जा रही है। सूरसागर बस्ती के पास की जमीन का मामला है जिसमें कोर्ट यूआइटी सचिव तक को तलब कर चुका है। कोई अवमानना का मामला नहीं बना।

जयपुर में तो अतिक्रमणों की बौछारें हैं। परकोटा हो, प्रतिबन्धित/सीमित निर्माण क्षेत्र हों, हाल ही चुनावों में अफसरों ने जो चांदी कूटी है, उसका अनुमान एसीबी भी नहीं लगा पाएगी। कोर्ट के आदेशों की पालना में दिखावटी नोटिस जारी हो जाते हैं। जैसे- मानसरोवर मध्यम मार्ग में व्यापारिक गतिविधियों को लेकर हुए। लोगों को कोर्ट से स्टे लाने का समय देते गए। विचाराधीन मामलों में निर्माण हो सकता है, रोक बेअसर है। पूरे शहर में नेताओं/अधिकारियों ने मिलकर जो रावण का आसुरी ताण्डव दिखा रखा है, कोर्ट जिस प्रकार अतिक्रमण क्षेत्र में स्टे दे रहे हैं, आदेशों को जारी करके अनुपालना पर आंखें मूदे बैठे होते हैं, वह लोकतंत्र की बदनुमा तस्वीर ही कही जा सकती है। ऐसे मामलों में बड़ा उदाहरण है हुदेश कुमार शर्मा (अभी राज्य मानवधिकार आयोग में सचिव) का जिनको सरकारी सेवा में रहते कई साल तक कोर्ट का वारंट तामील नहीं हो पाया। दूसरा उदाहरण है सी- स्कीम की शकुन होटल को सरकारी स्तर पर अवैध को वैध करने का। इसकी जांच की फाइल तत्कालीन नगरीय विकास मंत्री शाति धारीवाल लेकर घूमते रहे। सरकार जाने तक उनको कार्रवाई करने के 'ऊपर से' आदेश नहीं मिल पाए।

अब नई सरकार और नए मुख्यमंत्री से यह उम्मीद की जाती है कि पुराने मामलों का शुद्धिकरण होगा, अफसरों नेताओं के विरुद्ध कार्रवाईयां होंगी। बुलडोजर प्रभावी क्षेत्रों पर पहले चलेंगे, आम जनता पर बाद में। सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट के आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित होगी। तब लोकतंत्र का सुख सरकार के साथ-साथ जनता भी भोग पाएगी।