
- तृप्ति पांडेय, पर्यटन और संस्कृति विशेषज्ञ
नीति निर्माता किस तरह के अव्यावहारिक निर्णय लेते हैं, इसके उदाहरण देशभर में अक्सर सामने आते रहते हैं। अभी हाल ही राजस्थान सरकार की कैबिनेट मीटिंग में बिना किसी साक्षात्कार के छह हजार गाइडों की ट्रेनिंग का निर्णय किया गया। इतनी बड़ी संख्या में गाइडों को लाइसेंस देने का निर्णय बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए किया गया। सबको पता है कि ये गाइड लाइसेंस जादू की ऐसी छड़ी नहीं हैं, जिनसे तुरंत रोजगार मिल ही जाएगा। असल में ऐसे निर्णय हां में हां मिलाने की अफसरों की प्रवृत्ति के कारण होते हैं। यदि इस तरह के निर्णय कहीं कोर्ट कचहरी में पहुंच जाते हैं, तो मुंबई हाईकोर्ट की तरह से अफसरों से पूछा जा सकता है कि आप क्यों नहीं बोले ... क्यों आपने ये नहीं सोचा की छह हजार लाइसेंस पाने वाले गाइड रोजगार कहां से पाएंगे? फिर आपने उनके व्यक्तित्व को देखा परखा तक भी नहीं? यह तो ठीक वैसे ही हुआ जैसे बिना ड्राइविंग टेस्ट के ड्राइविंग लाइसेंस दे देना।
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एक बार ये तो सोचिए कि गाइड का काम और भूमिका क्या है। जी हां, गाइड हमारा राजदूत यानी एंबेसेडर है। उसका ज्ञान, आचार - विचार, भाषा पर पकड़ बिना साक्षात्कार के कैसे परख सकते हैं? यदि छह हजार लाइसेंस दे भी दिए, तो आप कोरोनाकाल में उन्हें रोजगार कैसे देंगे? आप ट्रैवल एजेन्सी और पर्यटकों पर अपने तरीके से बनाए गए गाइड इस्तेमाल करने का दबाव नहीं डाल सकते। अब जब टेक्नोलॉजी स्मार्टफोन बन कर पर्यटक की जेब में पहुंच गई है और ऐतिहासिक इमारतों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए ऑडियो गाइड लगाए जा रहे हैं, तो वे छह हजार लाइसेंसी गाइड कहां जाएंगे? क्या सरकार ने एक बार फील्ड की तरफ नजर डाली है?
इस बात को समझना होगा कि बेरोजगारी की समस्या का समाधान इस तरह के लाइसेंसों से नहीं होगा। कृपया, सपने मत बेचिए। बतौर लेक्चरर मुझे केंद्र और राज्य स्तर पर गाइड ट्रेनिंग के लिए आमंत्रित किया गया था। इस दौरान कई गाइडों के साथ बातचीत हुई। आज भी उनमें से कुछ गाइड अचानक जब मिल जाते हैं, तो उनसे जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है। कुछ तो गाइड का काम करने की बजाय हैंडीक्राफ्ट की दुकानों पर काम कर रहे हैं। उनका लाइसेंस खरीदार को पकडऩे में मदद करता है। इससे इन लाइसेंस गाइडों की स्थिति का पता चलता है।गौर करने की बात यह है कि छह हजार गाइडों की ट्रेनिंग का निर्णय तब हुआ है, जब कोरोना संक्रमण फैला हुआ है। यह ऐसा समय है, जब लोगों से घरों में रहने के लिए ही कहा जा रहा है। अपेक्षा की जा रही है कि लोग
अनावश्यक रूप से घूमने न जाएं। स्थितियां ऐसी हैं कि जिन लोगों के पास गाइड का लाइसेंस है, वे भी काम के लिए बेचैन हैं। अब आप किसी भी बेहतर गाइड का चयन साक्षात्कार किए बिना नहीं कर सकते। यानी सिर्फ खाली लेखन परीक्षा से काम नहीं चलेगा।
इस बात को भी समझना होगा कि यह नौकरी नहीं है। फिर इस तरह के कार्यक्रमों में आरक्षण के प्रावधानों का क्या काम? जहां तक राज्य के बाहर स्थित पर्यटन कार्यालयों की बात है, तो सिवाय दिल्ली के कोई भी कार्यालय राज्य पर्यटन की आवश्यकता नहीं है। यदि कुछ अच्छा करना है, तो अपने मुख्य कार्यालय और क्षेत्रीय कार्यालयों को और मजबूत बनाएं और उनका कार्य क्षेत्र बढ़ाएं और वहां युवाओं को रोजगार दें। जयपुर एअरपोर्ट और कुछ रेलवे स्टेशनों पर स्वागत केंद्र उपयोगी होंगे, पर तब ही जब वहां सारी तकनीकी व्यवस्था उबलब्ध हो और वहां जवाब देने वाला अधिकारी मौजूद रहे।
यदि पर्यटन को उद्योग मानते हैं, तो होटलों की बिजली दर को कम करने की मांग को देखें। साथ ही फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को याद दिलाएं कि अभी कोरोना गया नहीं है। सफारी की दर कम कराएं। वेबसाइट को बेहतर बनाना भी आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोरोना को देखते हुए ही नीतियां बनाई जानी चाहिए और जबरदस्ती के मार्केटिंग के आयोजनों से बचा जाना चाहिए।
Published on:
08 Apr 2021 09:53 am
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