
आख्यान : संस्कार तय करते हैं परिस्थिति विशेष में व्यक्ति का निर्णय
सर्वेश तिवारी श्रीमुख, (पौराणिक पात्रों और कथानकों पर लेखन)
त्रेता युग में एक बार अंग देश में सूखा पड़ गया। कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। खेती चौपट हो गई, लोग भूख से मरने लगे। तब अंग नरेश रोमपाद ने राज्य भर के विद्वानों की एक बैठक बुलाई और इस अकाल से मुक्ति का उपाय पूछा। विद्वानों ने बताया कि सुदूर गहन वन में महर्षि विभाण्डक के पुत्र ऋषि ऋष्यश्रृंग रहते हैं। वे समस्त शास्त्रों में पारंगत हैं, उनके कारण ही वनक्षेत्र में जल की कोई कमी नहीं है। उस वन में आवश्यक वर्षा होती रहती है। किन्तु वे कभी वन से बाहर नहीं आते। यदि ऋषि किसी तरह नगर में आ जाएं तो इधर भी वर्षा हो जाएगी।
चिंता में डूबे नरेश को उनके पुरोहित ने बताया, 'ऋष्यश्रृंग ने अपने जीवन में कभी स्त्री को नहीं देखा, वे बाल्यकाल से ही निर्जन वन में रह कर अध्ययन करते हैं। वे किसी स्त्री के स्नेह में बंध कर आ सकते हैं।' नरेश ने मंत्रियों से विचार कर के नगर से कुछ रूपवती वेश्याओं को ऋषि के पास वन में भेजा। वेश्याओं ने वन के बाहरी हिस्से में पड़ाव डाला और अगले दिन सज-धज कर ऋषि की कुटिया तक गईं। ऋषि अकेले थे। उन्होंने जब उन सुंदर स्त्रियों को देखा तो आश्चर्य में पड़ गए। सोचा, 'स्त्री क्या इतनी सुंदर होती है? यह तो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है।' उनके हृदय में स्नेह उत्पन्न हो गया। किन्तु यह स्नेह भी अलग भाव में उपजा था। उसमें काम या मोह का अंश नहीं था, श्रद्धा थी। उन्होंने उन वेश्याओं से उनकी पूजा करने की आज्ञा मांगी और पुष्प-अघ्र्य से उनकी विधिवत पूजा की। प्रसन्न वेश्याएं अपने स्थान पर लौट गईं।
व्यक्ति के संस्कार तय करते हैं कि किस परिस्थिति में उसका निर्णय क्या होगा। सुंदर वेश्याओं को देख कर ऋष्यश्रृंग के अंदर श्रद्धा भाव उपजा, यह उनके संस्कारों का प्रभाव था। अगले दिन वेश्याएं पुन: ऋषि के पास पहुंची। ऋषि प्रसन्न हो गए, उनके मन में उन सुंदर शरीरों के प्रति स्नेह उत्पन्न हो गया था। वेश्याओं ने उन्हें निमंत्रण दिया कि वन के बाहरी भाग में स्थित उनके शिविर तक चलें। स्नेह में बंधे ऋषि वन के बाहर आए तो पूरे राज्य में वर्षा हुई। नरेश समझ गए कि ऋष्यश्रृंग नगर में प्रवेश कर गए। वे राज्य के समस्त विद्वत समाज को ले कर उनकी आगवानी को गए और उनसे प्रार्थना कर के उन्हें राजधानी ले आए। फिर राजा रोमपाद ने अपनी पुत्री शांता का विवाह ऋष्यश्रृंग से कर दिया। अंग नरेश रोमपाद अयोध्या नरेश दशरथ के मित्र थे, इसी नाते शांता को दशरथ अपनी पुत्री और ऋष्यश्रृंग को अपना जमाता मानते थे। महाराज दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ इन्हीं ऋष्यश्रृंग ने सम्पन्न कराया था।
Published on:
07 Jul 2021 08:37 am
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