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शरीर ही ब्रह्माण्ड: जीवन का यात्रा-मार्ग

सर्वेन्द्रिय मन बाहरी जगत के सम्पर्क में रहता है, वही महन्मन भीतर का मन कहलाता है। मन सदा इच्छा के साथ पैदा होता है। हृदय में रहा करता है। कामना पूर्ति के साथ मन भी मर जाता है। हृदय चक्र स्थायी भाव है।
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Gulab Kothari

Aug 28, 2021

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- गुलाब कोठारी

'यथाण्डे तथा ब्रह्माण्डे' के सिद्धान्त के अनुसार हमारे शरीर में भी सात लोक हैं। यहां अन्तरिक्ष भी लोक के रूप में ही है। ये हैं सात चक्र-भू-भुव: से लेकर सत्यम् तक। मूलाधार से सहस्रार तक होते हैं। इनके कार्य भी ब्रह्माण्ड के सातों लोकों के अनुरूप ही होते हैं। भू: पृथ्वी है। हम पार्थिव प्राणी हैं। भू का निर्माण जल से होता है। भुव: स्वाधिष्ठान- जल का क्षेत्र है। भुव: चन्द्रमा से प्रभावित क्षेत्र है। स्व: नाभि केन्द्र तेजोलक्षणा सूर्य केन्द्र है। सम्पूर्ण शरीर में अन्न एवं ऊर्जा का वितरण यहां से होता है। गर्भस्थ शिशु को तो वाक्-स्पन्दन तक यहां से प्राप्त होते हैं। भू:-भुव:-स्व: ये तीनों केन्द्र ही वैश्वानर अग्नि के स्थान हैं।

''अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित:।
प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।'' गीता 15/14

नाभि को मणिपूर कहते हैं। इसके ऊपर हृदय चक्र है। यह सृष्टि का मह:लोक है। अव्यय पुरुष मह:लोक में ही सृष्टि का बीजारोपण करते हैं-

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत।। गीता 14.3

महद् ब्रह्माण्ड की योनि है । सारी सृष्टि का उद्भव स्थल है। यहीं पर अव्यय का प्रतिबिम्ब, अहंकृति-प्रकृति-आकृति की भूमिका बनती है। मन की कामना ही सृष्टि है। नित नई कामना, नित नई सृष्टि। यही तो व्यक्ति का संसार है।

मन ''केन्द्र'' का लोक है। इसके ऊपर तीन लोक अमृत रूप, नीचे तीन लोक मृत्यु रूप हैं। मन दोनों दिशाओं में गति करता है। ऊपर सोम प्रधान क्षेत्र है तथा नीचे अग्नि प्रधान। भोग प्रधान सौम्य प्रकृति के लोक नीचे ही गिरते हैं। मन स्वयं सौम्य होता है, कामनाओं का क्षीर सागर है। स्थूल शरीर की कामनाओं का प्रतिनिधि है इन्द्रिय मन (क्षर)-

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। गीता 15.7

इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर (अक्षर पुरुष) का मन सर्वेन्द्रिय मन कहलाता है। इसी को अतिनिन्द्र/अनिन्द्रिय मन भी कहा जाता है। इसी मन के कारण सुषुप्ति दशा में इन्द्रियां कार्य नहीं करतीं। इस मन की शक्ति चन्द्रमा है। इन्द्रिय मन की शक्ति अन्तरिक्ष सोम है। इसी प्रज्ञान मन का बुद्धि से सम्बन्ध होता है। इन्द्रियां विषय इसी मन पर लाती हैं, जिनको मन, बुद्धि तक पहुंचाता है। यही मन संस्कारों का केन्द्र है।

इसके आगे महन्मन-सूक्ष्म शरीर का मन। सुषुप्ति में इन्द्रियां सुप्त हो जाती हैं, मन-बुद्धि के प्रज्ञान-विज्ञान क्रम शान्त रहते है, तब भी अहंकृति (मैं हूं) का क्रम जारी रहता है। अहंकृति मूलत: महन्मन में ही प्रकृति और आकृति के साथ उत्पन्न होती है। यह मन सतोगुणी होने से सत्वमन भी कहलाता है। इस मन में उठने वाली इच्छाएं ईश्वर की ही होती हैं।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता।। गीता 14.4

इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि अव्यय पुरुष का मन-श्वोवसीयस मन- जो अपनी इच्छा का गर्भाधान महन्मन में करता है, वह भी स्वयंभू तथा परमेष्ठी के योग से यहीं प्रतिष्ठित रहता है। श्वोवसीयस मन सृष्टि पुरुष का मन है। यही पुरुष संपूर्ण सृष्टि का पिता बनता है।

सर्वेन्द्रिय मन बाहरी जगत के सम्पर्क में रहता है, वही महन्मन भीतर का मन कहलाता है। मन सदा इच्छा के साथ पैदा होता है। हृदय में रहा करता है। कामना पूर्ति के साथ मन भी मर जाता है। हृदय चक्र स्थायी भाव है। वह इच्छा के अनुसार ऊध्र्वगामी/अधोगामी स्वरूप धारण करके प्राणों को प्रेरित करता है। सृष्टि कर्ता बनता है।

मह:लोक सूर्य के ठीक ऊपर परमेष्ठी का हिस्सा है। यहीं से सोम सूर्य में आहूत होता है। सोम का वायु, जल को अलग करके बादल रूप तैयार करता है। जल अग्नि का शत्रु है। दूर तो करना ही है। यही बादल बरसकर पृथ्वी पर गर्भ धारण करवाते हैं। प्राणी-वनस्पति-औषधि पैदा करते हैं। इसी से भूतसृष्टि (लक्ष्मी) आगे बढ़ती है। लक्ष्मी/सरस्वती कार्य रूप लेती है- परमेष्ठी में ही। परमेष्ठी लोक भृगु-अंगिरा तत्व ही क्रमश: लक्ष्मी/सरस्वती के मूल आधार होते हैं। हृदय और मन दोनों मिलकर जीवन की सभी गतिविधियों के कारक बनते हैं। हृदय में ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र तीनों अक्षर प्राण तथा इनकी तीनों शक्तियां रहते हैं। ये जीवन की गति-आगति-स्थिति के नियन्ता हैं। अक्षर एक ओर अव्यय पर अवलम्बित हैं, दूसरी ओर क्षर का संचालन करते हैं। नाभि के ऊपर भी अश्वत्थ की सृष्टि है और नीचे भी विस्तार है। यहीं पर त्रिगुणी कामना पैदा होती है तथा उसी के अनुरूप ज्ञान ग्रहण किया जाता है। यहीं हमारे सुख-दु:ख, स्वप्न, अच्छे-बुरे आदि की अनुभूतियां रहती हैं। भक्ति योग और मोक्ष के मार्ग यहीं से होकर जाते हैं।

यहां एक तथ्य और भी ध्यान में रखना चाहिए कि जिस प्रकार अश्वत्थ का फैलाव नीचे-ऊपर होता है, उसी प्रकार हमारे चक्रों की ऊर्जाएं भी बाहर-भीतर कार्य करती हैं। सभी चक्र सामने की ओर गति रूप तथा पीठ की ओर मात्रात्मक भेद से कार्य करते हैं। मूलाधार/सहस्रार ऊपर-नीचे की ओर।

हृदय का ब्रह्मा ही श्वोवसीयस मन है। उसके भीतर आनन्द और विज्ञानमय कोश (भ्रू-मध्य तथा सहस्रार चक्र) होते हैं। बाहर प्राणमय/वाङ्मय-अन्नमय शरीर होते हैं। ये पांचों अव्यय पुुरुष की पांच कलाएं हैं। शरीर रूपी अग्नि में आकाशीय सोम निरन्तर बरसता रहता है।

सृष्टि मह:लोक के आगे अमृत/मत्र्य रूप दो भागों में बंट जाती हैं। अक्षर-क्षर के भी दो रूप हो जाते हैं-अमृत/मत्र्य/हृदय के ऊपरी भाग में (मुक्तिसाक्षी) अमृत कलाएं तथा नीचे (सृष्टि साक्षी) में मत्र्य कलाएं प्रधान रहती हैं । सूर्य का नीचे का अद्र्ध गोलाद्र्ध, छाया भाग होने से, मत्र्य भाग है। अत: इसके आगे मृत्यु लोक ही है।

सूर्य से पृथ्वी तक वैश्वानर का क्षेत्र है। हमारा नाभि क्षेत्र सूर्य केन्द्र है। जन्म/पालन का प्रधान क्षेत्र है। हमारा अन्न यहीं जठराग्नि में आहूत होता है। शरीर की सप्त धातुओं का निर्माण करता है। इसी से सृष्टि विस्तार के बीजों का निर्माण होता है। अत: सूर्य ही सृष्टि का पिता कहलाता है। सूर्य किरणें ही जल सोखकर ऊपर ले जाती हैं। बादल बनते हैं। विद्युत के योग से बरसते हैं। इसी यज्ञ से अन्न पैदा होता है।

हृदय का एक नाम 'अनाहत' भी है। जब प्रयास करके शरीर-मन के सारे व्यापारों को रोक दिया जाता है, तब भी हृदय के स्पन्दन की गति बिना किसी प्रयास के बनी रहती है। इसे धड़कन कहते हैं। यह तीनों हृद्-प्राणों के स्पन्दन की गति है।

भ्रू-मध्य हमारा विज्ञानमय कोश है। जन:लोक, परमेष्ठी लोक। इसका निर्माण स्वयंभू लोक द्वारा होता है। स्वयंभू और परमेष्ठी (अग्नि सोम) के योग से ही सृष्टि में सूर्य का प्रादुर्भाव होता है। परमेष्ठी ''भृगु-अंगिरा'' प्राणों का लोक है। अत्रिप्राणों का लोक है। अत्रि पारदर्शिता को रोककर प्रतिबिम्ब तैयार करता है। भृगु सोम रूप पदार्थ (लक्ष्मी) की सृष्टि करता है। सम्पूर्ण पदार्थ-पृथ्वी-धातुएं, रत्नादि जल के ही विकसित स्वरूप हैं। अत: लोक भाषा में 'मिट्टी' ही माने जाते हैं। इसी प्रकार हमारा शरीर भी जल-निर्मित होने से मिट्टी का कहा गया है। यह मिट्टी में ही मिल जाता है।

अंगिरा प्राणों से सरस्वती की शब्द-सृष्टि आगे बढ़ती है। अर्थ और शब्द वाक् के सिद्धान्त समान होने से एक के सहारे दूसरे को समझना संभव है। इसीलिए बहनें भी हैं, सृष्टा होने से शक्तिरूपा भी है। ''अ-ह'' तक सम्पूर्ण सृष्टि की अधिष्ठात्री देवियां हैं। गीता में तो-

प्रयाणकाले मनसाऽचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भु्रवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।। गीता 8.10

अर्थात्-वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम परमात्मा को ही प्राप्त होता है।

आप यदि परमेष्ठी में पहुंच गए, तो वहीं पर स्वयंभू भू-सहस्रार युक्त है। एकाकाश ही हैं। अव्यय मन तक पहुंच गए। वह आप स्वयं ही तो हैं। अव्यय से ही आपके कर्म-शरीर की यात्रा शुरू हुई थी। गीता आपको कर्मों में निपुण बनाती हुई पुन: अपने अंशी तक पहुंचाने का मार्ग देती है।

क्रमश:

शरीर : मैं नहीं, मेरा साधन

शरीर ही ब्रह्माण्ड : ब्रह्माण्ड का एक ही बीज