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शरीर ही ब्रह्माण्ड : फलाशा ही कर्ता भाव

कृष्ण ने गीता में तीन योगों का वर्णन किया है— कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग। भगवान ने इन तीनों योगों का कोई विरोध नहीं किया। व्यक्ति को ही तय करना है कि कौन-सा मार्ग उसके लिए उचित रहेगा और क्यों।
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Gulab Kothari

•

Aug 07, 2021

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- गुलाब कोठारी

संकुचन और प्रसार ही सृष्टि का क्रम है। इसी को बंध और मोक्ष अथवा नर्क और स्वर्ग कहते हैं। यही माया के स्पन्दन का कार्य भी है। यही कारण है कि शरीर में बंधा हुआ जीव स्वतंत्रता के लिए छटपटाता है। जो जहां से निकलता है, वहीं जाकर मिलना चाहता है। स्वतंत्रता का तो एक ही रूप होता है जिसे सत्य कहते हैं। बंध के तो नाना रूप होते हैं। चौरासी लाख योनियां भी इसी बंध के रूप हैं।

बंध केवल यही नहीं है। जीवनपर्यन्त हम बंध से जूझते रहते हैं। कई बार हमको पता भी नहीं चलता। एक सूत्र है कि जीवन, मुक्त भाव से जीना चाहिए जबकि हम उसे बांधने का प्रयास करते रहते हैं। बंधने से दु:खी होता है जीवन। कई नियम-कायदों में स्वयं को बांध रखा है। दिनचर्या को भी कठोरता से घड़ी के साथ बांध रखा है। हर इन्द्रिय के लिए अच्छे और बुरे की परिभाषा तय कर रखी है। 'यह करूंगा-यह नहीं करूंगा' जैसे संकल्प मन में पाल रखे हैं। सही और गलत के बोझ को मन में ढोते जा रहे हैं आदि-आदि। ये कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जो हमारे बंध की सूचना देते हैं। बंधन व्यक्ति की शक्तियों का सीमिति करता है।

बंधन का जनक व्यक्ति का अहंकार ही होता है। इसी से कत्र्ता भाव दृढ़तर होता जाता है। जो अपने कर्मों में फल की कामना नहीं रखता और 'अहं करोमि' मैं करता हूं और इसका फल भी मुझे ही मिलेगा। इस प्रकार के संकल्प का जिसके हृदय में कभी उदय नहीं होता उसके पूर्व अर्जित कर्म भी ज्ञानरूप अग्नि से जल जाते हैं। विज्ञ लोग उसी को पण्डित कहते हैं।

यस्य सर्वे समारम्भा: कामसङ्कल्पवर्जिता:।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:।। गीता 4.19

कहते हैं, जीवन कर्मों का बन्धन है। रोज नए कर्म अर्जित करता है, पुरानों को भोगता है। मुक्ति के मार्ग की एकमात्र रुकावट कर्म ही है, जबकि मुक्ति के लिए कर्म करना आवश्यक होता है। बिना कर्म के जीना भी मुश्किल है। केवल ज्ञान के सहारे भी नहीं जीया जा सकता। कर्म के बिना भाग्य भी नहीं बदल सकता। संन्यास ले लेने पर भी कर्म से मुक्ति नहीं है।

कर्म करना भी है और कर्म, बन्धन का कारक भी है, फिर मुक्ति कैसे संभव है? आज तक जिन्हें भी मुक्ति मिली है, क्या वह बिना कर्म के ही मिली है? उन्होंने भी कुछ न कुछ तो किया ही होगा। कर्म अच्छा करो अथवा बुरा, दोनों ही बन्धन के कारक हैं। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि अच्छा कर्म स्वर्ग का सुख दे दे, किन्तु बन्धन-मुक्त तो नहीं कर सकता।

व्यक्ति जो कुछ करता है, उसे यदि कर्म मानकर ही करे तो सही होगा। जैसे ही कर्म के साथ अपने भावों को जोडऩे का प्रयास करता है, तब कर्म उसका बन जाता है। उस कर्म की प्रतिक्रिया उसकी बुद्धि और उसके मन में होने लग जाती है। उसका कत्र्ता भाव बन जाता है। कृष्ण कहते हैं कि कत्र्ता भाव न रखना ही मुक्ति का मार्ग है। स्वयं का उदाहरण देकर कहते हैं कि चारों वर्णों को बनाने वाला होकर भी मैं अकत्र्ता नहीं हूं। मुझ पर कर्मों का लेप नहीं होता क्योंकि कर्मों के फल में मेरी लालसा नहीं होती। कर्म स्वयं आत्मा पर लेप करने वाला अथवा आत्मा का बन्धन करने वाला नहीं है। मनुष्य की बुद्धि में जो राग-द्वेष होते हैं वे ही बुद्धि पर बन्धन करने वाले है। मनुष्य का राग या द्वेष, फल के प्रति ही होता है। ईश्वर को न फल की इच्छा होती है न उनके फल में राग-द्वेष है।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।। गीता 4.14

गीता में कहा है 'आरंभे कर्मणाम् संन्यासे कर्म संगयो।' कर्म की शुरुआत लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही की जाएगी, किन्तु कर्म की समाप्ति के साथ फल की आसक्ति भी छूट जानी चाहिए। इसका केन्द्र होता है- मन। मन में उठने वाली इच्छा। इच्छा ही तो सब कर्मों का मूल कारण है। इसमें कोई कर्म नहीं होता। इसके साथ जब मन के भाव जुड़ते हैं, बुद्धि का आकलन जुड़ता है, तब इच्छा को पूर्ण करने या न करने का निर्णय होता है। इस निर्णय में प्रकृति कार्य करती है। यदि इसे प्रकृति की भूमिका समझी जाए तो इच्छापूर्ति की दिशा बदल सकती है। इच्छापूर्ति के साथ भी इस प्रकृति को देखते जाना पड़ेगा। तब हम तामसी और राजसी प्रवृत्तियों को न्यूनतम रखते हुए सात्विक प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं। कुछ काल बाद हमारी इच्छाएं स्वत: ही सात्विक रूप लेने लग जाएंगी। हमारा कर्म सत्व प्रधान होता चला जाएगा। इसी से भावशुद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा। इसी से भावी कर्मों के प्रति नई जागरुकता पैदा होगी।

कृष्ण ने गीता में तीन योगों का वर्णन किया है— कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग। भगवान ने इन तीनों योगों का कोई विरोध नहीं किया। साथ ही बताया है कि इन तीनों योगों में बुद्धियोग का सन्निवेश करते हुए यदि किसी भी योग का आश्रय लिया जाता है तो वह मानव को बन्धनमुक्त करता हुआ ब्रह्म भाव में अवश्य ले जाएगा। ये सब कर्म के ही रूप हैं। व्यक्ति को ही तय करना है कि कौन-सा मार्ग उसके लिए उचित रहेगा और क्यों। हर मार्ग की कुछ अच्छाइयां हैं तो कुछ कठिनाइयां भी। लेकिन, एक तथ्य तो स्पष्ट है कि शरीर का कर्म श्रम है, बुद्धि जुड़ती है तब भावनात्मक क्षेत्र बनता है। कर्म के साथ मनोयोग उसे कला का रूप देता है। आत्मयोग (ज्ञानयोग) से श्रद्धा का प्रादुर्भाव होता है। श्रद्धा भक्ति में बदल जाती है।

प्रश्न उठता है—क्या भक्ति को ऐसा कर्म मान लेना चाहिए कि जो निश्चित रूप में बन्धनमुक्त कर देगी? मैं रोज ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि मुझे सुखी रखे। मेरे परिवार को सुखी रखे। घर में सदा समृद्धि बनी रहे। ईश्वर में पूरी आस्था भी रखता हूं। ईश्वर मेरी सुनता भी है। मनचाहा देता भी है। भक्ति उस प्रकार का सम्बन्ध है, जो कार में बैठे मनुष्य का कार से होता है। वह कार का ही अंग बन जाता है। शास्त्रीय भाषा में अंग-अंगी भाव को ही भक्ति कहते हैं। एक मांगने वाला - एक देने वाला।

मैं नित्य अपनी इच्छाओं के साथ बंधता चला जा रहा हूं। बुद्धियोग का 'कर्मण्ये वाऽधिकारस्ते...' तो मुझे याद ही नहीं आता। मैंने ईश्वर से कभी नहीं कहा कि तू मुझे अपने पास बुला ले या तू मेरे हृदय में आकर बस जा। फिर, मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। मैं कर्म कर भी रहा हूं और मुझे कुछ चाहिए भी नहीं। किसी भी फल के साथ मेरा कर्म बंधा हुआ नहीं है। ऐसा कर्म ही मुक्त करने वाला है। जहां फल से मन बंधा होता है, वहां बन्धन है। मन को फल से मुक्त किया कि व्यक्ति कर्मफल से मुक्त हुआ। जब फल ही नहीं होगा तो कर्म किसके साथ बंधेगा? इस सारी प्रक्रिया को बुद्धियोग कहते हैं। यही एकमात्र मार्ग है जो व्यक्ति को बन्धन से छुड़ा सकता है।

क्रमश:

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