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शरीर ही ब्रह्माण्ड: कामना ही बन्धन

अभ्यास काल में संकल्प मन को बांधने के लिए उपयोगी हो सकता है। कृष्ण कहते हैं कि जो धीर मनुष्य सुख-दु:ख में सम तथा अपने स्वरूप में स्थित रहता है। जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है- वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

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Gulab Kothari

Jul 10, 2021

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- गुलाब कोठारी

गीता कर्म का शास्त्र है। गीता के कर्म-ज्ञान एवं भक्ति योग सभी कर्म पर ही आधारित हैं। कृष्ण की देन के रूप में वैराग्य बुद्धियोग माना गया है,जो स्वयं भी कर्म के स्वरूप पर आधारित है। सारे योगों का आधार ''योग: कर्मसु कौशलम्'' भी कह सकते हैं, ''समत्वं योग उच्यते'' भी कह सकते हैं, तो ''मा फलेषु कदाचन'' को भी माना जा सकता है। कर्म का कोई भी स्वरूप देखें, गीता उसको मोक्ष मार्ग का साधन सिद्ध कर देगी। योगी हो अथवा साधारण मनुष्य गीता प्रत्येक अवस्था में अनुकूल कर्म के स्वरूप की व्यवस्था देती है। प्रत्येक वर्ण और आश्रम के लिए गीता ब्रह्माण्ड के संदर्भ में निराकरण प्रस्तुत कर रही है।

जीवन की प्रत्येक यात्रा में कुछ बाधाएं भी अनिवार्य रूप से उपस्थित होती ही हैं। कर्म की यात्रा तो सौ साल की होती है। बाधाओं का एक पूरा संगठित व्यापार दिखाई देता है। हमारा शरीर पंच महाभूतों से बना है। इनकी अपनी भी भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। सभी महाभूत अहर्निश हमारे शरीर के सम्पर्क में रहते हैं और शरीर का पोषण करते हैं। हमारी चर्या का बड़ा भाग इनकी प्राकृतिक व्यवस्था और संतुलन पर आधारित है। प्रत्येक महाभूत एक अंग समूह का पोषक है। पांचों महाभूत एक क्रम में पैदा होते हैं। आकाश से वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी क्रमश: पैदा होते हैं। यदि एक तत्त्व में भी विकार उत्पन्न हो जाए, तो उसके आगे के सभी महाभूतों से जुड़े अवयव रोगग्रस्त हो जाते हैं।

पंच महाभूतों से पांचों ज्ञानेन्द्रियां जुड़ी हुई हैं। सबकी अपनी शक्ति-तन्मात्रा है। इनके भी अपने-अपने विषय है। आकाश की तन्मात्रा नाद है, इन्द्रिय श्रोत्र (कर्ण) है। विषय ध्वनि है। अब ध्वनि के स्वरूप तो सृष्टि में अनन्त हैं। एक ओर अनाहत नाद है, तो दूसरी ओर मेघगर्जन और समुद्री तूफान की ध्वनि है। अब तो एटम बम जैसी ध्वनियां भी उपलब्ध हंै। इसी प्रकार प्रत्येक महाभूत की शक्तियां, इन्द्रियां और अनन्त विषय हैं। महाभूत स्वयं में तटस्थ हैं, इद्रियां भी तटस्थ हैं, किन्तु इनका उपयोग करने वाला मन तटस्थ नहीं है। इस पर त्रिगुण के आवरण होते हैं। उन्हीं के अनुरूप विषय दृष्टिगोचर होते हैं। यह सारा माया भाव मिथ्या दृष्टि पैदा करता है। मिथ्या दृष्टि पैदा होती है प्रकृति के त्रिगुण भाव से। भले ही सतोगुणी ही क्यों न हो। उसमें भी रज-तम तो साथ रहता ही है। सत्व में भी सुख और ज्ञान का अभिमान तो रहता ही है। यह अभिमान भी आवरण तो है ही। रजोगुण तो कर्मों का मूल ही है। कर्मों में न केवल प्रवृत्त करता है अपितु फलाशा भी साथ रहती है।

'रज' शब्द ही अग्निबीज-'रँ'-से बनता है। अग्नि यहां कर्म-प्रवृत्ति तथा कर्मफलों से दग्ध (जलाता) करता है। लोभ का द्वार खोलकर रखता है, ये नरक के तीन द्वारों में से एक है। अन्य दो द्वार काम-क्रोध हैं। लोभ तथा काम्य कर्मों के कारण बार-बार अग्नि प्रज्ज्वलित होता रहता है। फलाशा का एक अर्थ स्पष्ट ही है-याचक भाव। अभावग्रस्त मानसिकता। वेदों ने भी यज्ञादि कर्मों के माध्यम से देवों को प्रसन्न करके कुछ न कुछ मांगना ही सिखाया है। तब व्यक्ति त्रिगुण के बाहर कैसे जाएगा? गीता इन सबके स्वरूप की गहन चर्चा करके समत्व दृष्टि से आगे बढऩे का मार्ग प्रशस्त करती है।

यज्ञादि कर्मों का आरंभ ही संकल्प से होता है। संकल्प पूरा करना धर्म बन जाता है। इसी दृष्टि से धर्म संकल्प के बन्धन में अपने स्वरूप से च्युत हो जाता हैं। धर्म तो मुक्ति कारक होता है। अभ्यास काल में संकल्प मन को बांधने के लिए उपयोगी हो सकता है। कृष्ण कहते हैं कि जो धीर मनुष्य सुख-दु:ख में सम तथा अपने स्वरूप में स्थित रहता है। जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है- वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते।।'' गीता 14.25

जब सत्वगुण में ही फलाशा नहीं छूटती, तब रज-तम में कैसे छूट सकती है। इसके लिए कहा है-''आरंभ कर्माणं संन्यासे कर्मसङ्गयो।'' आपने एक पेड़ लगाया। फल आने में कुछ काल तो लगेगा। क्या हमें इस काल में बैठकर फल की प्रतीक्षा करनी चाहिए अथवा दूसरा-तीसरा पेड़ लगाते रहना चाहिए? फल आते रहेंगे। नहीं भी आएं। कुछ कर्म फल तो कई जन्मों के बाद आते हैं, जिनमें कोई अन्य आत्माओं का ऋणानुबन्ध जुड़ा हो।

यह भी सब कुछ क्या सीधा-साधा है? नहीं। प्रत्येक वर्ण इन तीनों गुणों से ही आवृत्त रहता है। ब्राह्मण में तीनों गुणों का प्रभाव भिन्न कर्म उत्पन्न करेंगे, क्षत्र्-विङ् वर्णों में इनका प्रभाव भिन्न होगा। सतोगुणी ब्राह्मण तथा तमोगुणी वैश्य के कर्मों का झुकाव एक पक्षीय हो जाएगा। इन्हीं सब कारणों से कर्म आरंभ किए जाते हैं। गीता कुछ और ही कहती है कि हे पाण्डव प्रकाश! प्रवृत्ति तथा मोह-ये सभी अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जाए तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता। और ये सभी निवृत्त हो जाएं तो इनकी इच्छा नहीं करता।

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।।गीता 14.22

जो सत्वगुण के कार्यरूप प्रकाश को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह को प्राप्त होने पर न द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर आकांक्षा रखता है, साक्षीभाव रखता है, वह कभी विचलित नहीं होता।

कर्म में प्रवृत्ति फल रूप होती है। उसको भोग लेना बुद्धिमानी है। वहां प्रतिक्रिया दिखाना तो नए कर्म फल पैदा करना हो जाएगा। फल अच्छे भी लग सकते हैं, नहीं भी लग सकते। अच्छे लगने पर उनकी पुनरावृत्ति की कामना/स्पृहा व्यक्ति को निश्चित ही प्रकृति के जाल में फंसाकर रखेगी। आत्मा के आवरण घने होते जाएंगे। क्षेत्र का ज्ञान और भूमिका की जानकारी ही व्यक्ति को क्षेत्रज्ञ रूप में प्रकट कर सकती है। प्रकृति के प्रभाव में ज्ञान और ज्ञाता भिन्न ही बने रहते हैं।

कर्म को लेकर गीता का एक ही उद्घोष रहता है कि कर्तव्यकर्म करने में ही तेरा अधिकार है फलों में कभी नहीं। अत: तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो-''कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन''। इसमें जो 'फल' शब्द है, यही प्रकृति का प्रभाव है। माया कर्म का आधार है, प्रकृति आवरण है। प्रकृति से मुक्त होने पर ही माया से परिचय होगा। चौरासी लाख योनियों के जाल को तोड़ पाएंगे। तब माया मेरी इच्छा रह जाएगी। 'मैं' भी नहीं रहा तो केवल ब्रह्म की इच्छा रह जाएगी। इच्छापूर्ण नहीं भी हो सकती। यदि स्वयं की होगी, प्रकृति के कारण। ईश्वरीय इच्छा में व्यक्ति अनासक्त हो जाता है। ईश्वर किसी का अहित नहीं करता। ईश्वर की इच्छापूर्ण होते ही माया भाव भी तिरोहित हो जाता है।

कर्म की बात और भी गंभीर है। शरीर, मन, बुद्धि के कर्म कहने से भी काम नहीं चलता। क्योंकि शरीर भी तीन होते हैं। हमारे ही नहीं, प्रत्येक महाभूत के भी। आकाश के तीन शरीर, आकाश से वायु बना-उसके भी तीन शरीर। वायु के भीतर आकाश भी रहता है-उसके तीन शरीर। पृथ्वी में शेष चारों महाभूत भी रहते हैं। अर्थात् पन्द्रह शरीर। मन भी चार, बुद्धि, प्रज्ञा, विज्ञानात्मा, अहंकार (बुद्धि का जनक) अलग। इस प्रकार कर्म का स्वयं का ब्रह्माण्ड है। अमृत-मत्र्य भाव के कर्म अलग हैं। ज्ञान-इच्छा-क्रिया-फल की अनन्त शृंखलाओं की सृष्टि है। यहां तक कि गीता के कृष्ण को भी तीन शरीरों के अनुरूप मानते हुए उनके उपदेशों की भी तीन श्रेणियां बना दी हैं। गीता का एक अंश वासुदेव कृष्ण बोल रहे हैं, एक अंश दिव्य/गीता कृष्ण के द्वारा कहा गया है। तीसरा अंश विष्णु अवतार रूप-अव्यय कृष्ण ने कहा है। इसी प्रकार गीता के स्वरूप को भी अधिदैव, अधिभूत और अध्यात्म में देखने से कर्म का नया चित्र उभरकर सामने आता है।

क्रमश:

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