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बिना अमरीका के जी-20 ने बहुपक्षवाद को नई दिशा दी

शिखर सम्मेलन के निष्कर्ष नई दिल्ली को ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने के लिए एक नया कूटनीतिक अवसर देते हैं।

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के.एस. तोमर, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

जोहान्सबर्ग में हाल ही संपन्न हुआ जी-20 शिखर सम्मेलन वैश्विक राजनीति का एक निर्णायक क्षण बनकर उभरा- इसलिए नहीं कि कौन आया, बल्कि इसलिए कि कौन नहीं आया। अमरीका की अनुपस्थिति के बावजूद बाकी सदस्य देशों ने सम्मेलन की शुरुआत में ही संयुक्त घोषणा पत्र को अपनाकर अप्रत्याशित एकजुटता दिखाई। यह असामान्य कदम दृढ़ता और तात्कालिकता दोनों का संकेत था- यह संदेश कि वैश्विक शासन किसी एक महाशक्ति की प्रतीक्षा में ठहर नहीं सकता। दक्षिण अफ्रीका की कुशल नेतृत्व क्षमता ने संवाद को एकजुटता, न्याय और उन सुधारों की दिशा में मोड़ा जो ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के लिए जरूरी है, खासकर उस समय जब बहुपक्षवाद स्पष्ट दबाव में है। जलवायु परिवर्तन, ऋण स्थिरता और वैश्विक असमानता जैसे मुद्दों पर केंद्रित घोषणा ने उन संरचनात्मक बाधाओं को रेखांकित किया, जो विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को जकड़ी हुई हैं।


फिर भी चुनौतियां गहरी व जटिल हैं। घोषणाओं और वास्तविक कार्रवाई के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। जब तक नए वित्तीय तंत्र और संस्थागत सुधार नहीं होते, जलवायु न्याय और ऋण राहत के लक्ष्य कागज से बाहर नहीं आ पाएंगे। चीन के बढ़ते प्रभाव जैसे भू-राजनीतिक मतभेद भी आम सहमति को कठिन बना सकते हैं। भारत सहित अनेक विकासशील देश रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा और विकास जैसी प्राथमिकताओं को वैश्विक अपेक्षाओं के साथ संतुलित करने की चुनौती झेल रहे हैं। यह संतुलन नई वित्तीय सोच, राजनीतिक इच्छाशक्ति और अनुशासित कूटनीति की मांग करता है। इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत सबसे विशिष्ट स्थिति में है। जोहान्सबर्ग में प्राथमिकता पाए मुद्दे- न्याय, ऋण राहत, जलवायु न्याय और संस्थागत सुधार- भारत की दीर्घकालिक वैश्विक दृष्टि के अनुरूप हैं। भारत वर्षों से विकासशील देशों के लिए मजबूत आवाज उठाता रहा है, बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों में सुधार की मांग करता रहा है और अधिक समावेशी वैश्विक शासन संरचना पर जोर देता रहा है। शिखर सम्मेलन के निष्कर्ष नई दिल्ली को ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने के लिए एक नया कूटनीतिक अवसर देते हैं।


भारत के लिए यह समय अवसर और जिम्मेदारी दोनों लेकर आया है। एशियाई देश अब अधिक संतुलित वैश्विक व्यवस्था की उम्मीद कर रहे हैं और भारत पश्चिमी औद्योगिक शक्तियों तथा विकसित हो रही दुनिया के बीच सेतु की भूमिका निभा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार कहा है 'वसुधैव कुटुम्बकम- दुनिया एक परिवार है'। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि वैश्विक शासन की आधारशिला होनी चाहिए। चीन ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के पुनर्गठन की एक महत्वाकांक्षी दृष्टि प्रस्तुत कर खुद को केंद्र में स्थापित किया। आइएमएफ, विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ में सुधार की उसकी मांग लंबे समय से चली आ रही उस वैश्विक मांग पर आधारित है, जो अधिक लोकतांत्रिक आर्थिक शासन की वकालत करती है।
अमरीका की अनुपस्थिति सम्मेलन पर छाई रही। उसके न आने को व्यापक रूप से बहुपक्षीय दायित्वों से दूरी के रूप में देखा गया, खासकर जलवायु वित्त, ऋण पुनर्गठन और विकास सहायता जैसे क्षेत्रों में। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण उसके सहयोग के बिना वैश्विकप्रतिबद्धताओं को क्रियान्वित करना कठिन होता है। अब बड़ा प्रश्न यह है कि क्या बिना अमरीका की मौजूदगी लिए गए फैसलों को पर्याप्त वित्तीय और राजनीतिक समर्थन मिलेगा।


ऋण-ग्रस्त गरीब देशों पर विशेष ध्यान दिया गया, यह स्वीकार करते हुए कि बढ़ते ऋण बोझ स्वास्थ्य, आधारभूत ढांचे और जलवायु निवेशों को कमजोर कर रहे हैं लेकिन कोई नया ऋण-राहत तंत्र प्रस्तुत न कर पाना बहुपक्षवाद की सीमाओं को सामने ले आया। वर्तमान ढांचे बेहद धीमे और अपर्याप्त हैं, जिससे कई संवेदनशील देशों के पास पुनप्र्राप्ति का वास्तविक मार्ग नहीं बचता। इसी बीच, चीन ने मुक्त व्यापार की सशक्त वकालत की। ऐसे समय में जब संरक्षणवादी नीतियां और एकतरफा आर्थिक कार्रवाइयां बढ़ रही हैं, चीन का यह जोर जी-20 की उस मूल भावना को पुनर्जीवित करने का प्रयास था, जिसमें नियमों पर आधारित, सहयोगी वैश्विक व्यापार व्यवस्था की कल्पना की गई थी।शिखर सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण की बढ़ती आत्मविश्वासपूर्ण भूमिका देखी गई। वैश्विक विकास संस्थान जैसी नई संस्थाओं के प्रस्ताव और अफ्रीका के औद्योगिकीकरण को सशक्त करने की पहलें इस बात का संकेत थीं कि दक्षिण अब वैश्विक एजेंडा सिर्फ स्वीकार नहीं कर रहा, बल्कि उसे आकार भी दे रहा है।


घोषणा पत्र को सम्मेलन की शुरुआत में अपनाना एक प्रतीकात्मक लेकिन शक्तिशाली संदेश था कि अमरीका सहित किसी भी सदस्य के अभाव में जी-20 ठप नहीं होगा। यह बहुपक्षवाद की स्वतंत्रता का संकेत था, जो यह दिखाता है कि वैश्विक सहयोग को आगे बढऩा ही होगा, भले ही पारंपरिक शक्ति केंद्र पीछे हट जाएं। अंतत: जोहान्सबर्ग को शायद उस क्षण के रूप में याद किया जाएगा, जब ग्लोबल साउथ ने स्पष्टता, आत्मविश्वास और सामूहिक दृष्टि के साथ आगे कदम बढ़ाए। जी-20 का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि यह भावना कितनी देर तक टिकती है और सदस्य देश घोषणाओं को वास्तविक कार्रवाई में कितना बदल पाते हैं। यदि जोहान्सबर्ग के वादे सतत प्रयासों में ढलते हैं, तो विश्व एक ऐसे वैश्विक शासन की ओर बढ़ सकता है जिसके केंद्र में साझा जिम्मेदारी और समावेशी विकास हो।

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