
Travellog Budher Moyla Top
संजय शेफर्ड
(ट्रैवल ब्लॉगर)
मुझे नहीं पता था कि दूर कहीं पहाड़ में परियों का भी कोई मंदिर होगा, पर एक दिन ऐसे ही जब जौनसार बावर के दूरदराज क्षेत्रों में अकेले भटक रहा था, तो किसी ने कहा कि देहरादून से इतनी दूर चकराता आ गए हो तो लोखंडी गांव और बुधेर मोयला टॉप भी जाओ। मैंने पूछा क्या है वहां? कुछ नहीं बस आप जाओ तो। यह बताने वाले ने कहा था। आगे चलकर पता किया, तो वह जगह चकराता से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर थी, जिसमें ढाई तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई भी शामिल थी। यानी कि इस दूरदराज रास्ते को पैदल ट्रैक करके जाना था।
मुझे रास्ता तो कठिन जान पड़ा, पर लोखंडी से थोड़ा आगे बढ़ा, तो उसमें एक अलग ही तरह का सम्मोहन था। मैं जंगल, पहाड़ और प्रकृति के साथ बंधता चला गया और वह रास्ता धीरे-धीरे मेरे पैरों में सिमटने लगा। तकरीबन तीन किलोमीटर चलने के बाद फॉरेस्ट डिपार्टमेंट का एक गेस्ट हाउस दिखा, जो तकरीबन डेढ़ दो सौ साल पुराना था और इसी में छुपा था इस जगह यानी कि मोयला टॉप का संपूर्ण इतिहास।
इस जगह के बारे में कहा जाता है कि इसे एक बोथर नामक ब्रिटिश वन्यजीव प्रेमी ने अपनी महिला मित्र मिओला के साथ मिलकर एक वन्य जीव जंतु के चारागाह के रूप में ढूंढा था, जिसके टॉप तक बेहद खूबसूरत बुग्याल व चारापत्ती के वृक्ष थे। उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम बुधेर मोयला टॉप पड़ा है।
मोयला टॉप के खूबसूरत बुग्याल के बीचोंबीच बना एक मंदिरनुमा स्थान है। इसके भीतर कोई देवमूर्ति नहीं है। बाहर पहरेदार के रूप में एक लकड़ी की मूर्ति दिखाई देती है, जिसे लोग इस मंदिर का द्वारपाल मानते हैं। खैर, थोड़ा सा थकते-थकाते ऊपर पहुंचा, तो मेरी आंखें खुली रह गईं।
सामने जो नजारा था वह सारी थकान, सारी दुर्गमता और सारी मुश्किलों को छूमंतर कर देता है। यह जगह एशिया के सबसे घने देवदार के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों से घिरी हुई है और बीच में एक बहुत ही खूबसूरत घास का मैदान है, जहां से आप हिमालय की तमाम ऊंची ऊंची चोटियों को देख सकते हैं।
मोयला के पास बुधेर गुफा, एक प्राचीन मंदिर और दो सुन्दर झीलें भी स्थित हैं। इस जगह पर पहुंचने के लिए तकरीबन डेढ़ से दो घंटे की पैदल यात्रा करनी होती है। पूरा रास्ता हरे-भरे पेड़ों से होकर गुजरता है। जब खत्म हुआ तो सामने घास का एक बहुत बड़ा मैदान था और सामने परियों का मन्दिर।
मैं देर तक उन्हीं घास के मैदानों में घूमता रहा। सचमुच, यह जगह किसी परीलोक की तरह थी। बाद में मैं उस मंदिर भी गया जिसे आछरी या परियों का मंदिर कहा जाता है।
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Updated on:
18 Jan 2022 10:46 pm
Published on:
18 Jan 2022 12:14 pm
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