
स्वतंत्रता क्या होती है, यह एक काफ़िर ही बेहतर जान सकता है। सरहद पर खड़ा एक सैनिक जान पाता है या वह जान पाता है जिसने अपनी उम्र के 36 वसंत खोए हों।
आज़ादी के सही मायने, जब हम स्वयं समझ जाएँगे और हमारे नौनिहालों को समझा पाएँगे तभी इस दिन की सार्थकता है। ‘नौनिहाल’ लिखते हुए उँगलियाँ हांफ़ गयी हैं, प्राणवायु की ही कमी की मानिंद थम गई हैं.. किसी शेल्टर होम पर साँस अटक गई है, पर......। जाने कितनी आहें, पर, किंतु, परन्तु अभी भी बचे हैं ना! जिन पर विजय प्राप्त करनी बाक़ी है। स्वतंत्रता क्या होती है, यह एक काफ़िर ही बेहतर जान सकता है। सरहद पर खड़ा एक सैनिक जान पाता है या वह जान पाता है जिसने अपनी उम्र के 36 वसंत खोए हों।
हाँ! यह उन्मुक्त गगन और सुरक्षित सरहदें इसी स्वतंत्रता के ही मानी है। पर हम गर यह सोचकर किसी तसल्लीबख्श एहसास की ओर रुख़ करते हैं कि यह हमारा जन्मजात हक़ है तो हम मूर्ख हैं। हर नागरिक को इसे अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। यह सोचते हुए मन फिर किसी ‘पर’ पर ठिठक जाता है, कि सरहदों और सुरक्षा जैसे शब्दों की आवश्यकता ही क्यों हुई भला। क्यों हम वसुधैव कुटुम्बकम् की धारणा को अब तक चरितार्थ नहीं कर पाए। इस सफ़र में बहुत से शब्द अपने अर्थ खो चुके और कईयों पर धूल की परतें जम गई हैं। उन्हें हटाना हमें ही होगा।
भावनाओं में रम कर नहीं कह रही पर ये उत्सव विशेष एक रोमांच और दुख मिश्रित सिहरन पैदा करते हैं। बहुत कुछ है जो किया जाना है इसलिए उस एक नन्हें, अतिमहत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक क़दम के बाद का सफ़र जारी रखना होगा। हमें वंदेमातरम् और जय हिंद कहने की योग्यता अर्जित करनी होगी तथा सतत जागरूक रह तमाम सीमाओं के पार उतरना होगा। तभी वास्तविक आज़ादी के मानी हम समझ पाएंगे , है ना।
गुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उस की धूप
क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बाद
#कैफ़ी_आज़मी
हर मन, हर वर्ग एक रंग में रंगा हो, इतना अधिक कि ***** और भेद की तमाम सरहदें मिट जाए।
इस पर्व का उल्लास सभी चुनौतियों , अतिरेक, ईर्ष्याओं, वर्जनाओं और कुचेष्टाओं पर भारी रहे, क्योंकि-
न जाने दुनिया में कितने लोग हैं
जो अपना वतन खोज रहे हैं
या वतन में बेवतन होकर बैठे हैं।
#अमृता
यही प्रार्थना कि हर तन और मन मानवीय रंगों से रंगा रहे!
- विमलेश शर्मा
Published on:
16 Aug 2018 03:26 pm
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