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उन्नाव रेप कांड : न्याय पर भरोसा

सुप्रीम कोर्ट का संभवत: यही संदेश है कि राजनीतिक रसूख के आगे निष्क्रिय तंत्र को झकझोरने के लिए न्याय की मूर्ति को कभी-कभी आंखों से पट्टी भी हटानी चाहिए
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जयपुर

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Dilip Chaturvedi

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Updated: 2 Aug 2019, 9:08 PM IST

justice in india

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भारतीय न्याय तंत्र का मानवीय चेहरा एक बार फिर सामने आया है। इसे देखकर कानून के राज पर भरोसे को मजबूती मिली है। इस बार यह चेहरा देश में उन्नाव रेप कांड से चर्चित मामले में तब दिखा जब प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने हर तरह से हताश हो चुकी रेप पीडि़ता के पत्र पर संज्ञान लेते हुए सख्ती दिखाई। सीजेआइ ने न सिर्फ पूरे सरकारी तंत्र पर रसूख के असर को झकझोर दिया बल्कि अपनी रजिस्ट्री की खामियों को उजागर करने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। रसूखदारों के आगे बौना साबित हो रहे सरकारी तंत्र को यह बताना जरूरी था कि हमेशा वही नहीं जीत सकते। नतीजा यह हुआ कि जिस मामले में पिछले दो साल से सुनवाई ही नहीं हुई थी, उस पर अब 45 दिनों में फैसला करना होगा। इससे संबंधित तमाम बाधाओं को दूर करने के लिए अदालत ने जिस ते जी से निर्णय लिए, अपने आप में मिसाल है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से अब यह भरोसा हो रहा है कि सत्ताधारी विधायक से जुड़े मामले में अब त्वरित न्याय होगा।

सीजेआइ की सक्रियता के बाद सत्तारूढ़ भाजपा ने भी उत्तर प्रदेश के उन्नाव के बांगरमऊ से विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को पार्टी से निष्कासित कर दिया, जबकि मामला चर्चित होने के बाद भी अब तक उसे सिर्फ निलंबित ही रखा गया था। दरअसल यह पूरा प्रकरण रविवार को उस समय एक बार फिर चर्चा में आ गया था जब विधायक पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली लडक़ी, उसका परिवार और वकील एक सडक़ हादसे का शिकार हो गए। हादसे में लडक़ी की मौसी व चाची की मौत हो गई और पीडि़ता व वकील गंभीर रूप से घायल हैं। उन्नाव कांड शुरू से ही चर्चा में रहा है।

विधायक सेंगर पर बलात्कार का आरोप लगने के बाद से ही समझौते के लिए पीडि़ता को हर तरह से परेशान किया जाने लगा। पुलिस ने उसके पिता को ही गिरफ्तार किया और हिरासत में ही उनकी मौत हो गई। पीडि़ता के चाचा को एक मामले में जेल में डाल दिया गया। जब मामला सुर्खियों में आया तब विधायक पर कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। फिलहाल वह जेल में है। मामला कछुआ गति से आगे बढ़ रहा था और समझौते का दबाव डाला जा रहा था। पीडि़ता ने आखिरी उम्मीद के तौर पर प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखा था जो समय रहते उनके सामने नहीं आ सका।

मीडिया से इस पत्र की जानकारी होने पर सीजेआइ ने सख्ती दिखाते हुए उन्नाव कांड से जुड़े सभी मामले दिल्ली की अदालत में स्थानांतरित कर दिए। पीडि़ता को सीआरपीएफ की सुरक्षा में भेज दिया और सीबीआइ को 7 दिन में जांच पूरी करते हुए ट्रायल कोर्ट को 45 दिन में फैसला करने का निर्देश भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों के प्रतिनिधित्व के बिना एक्पर्ट ऑर्डर पारित करते हुए संभवत: यही बताना चाहा है कि राजनीतिक रसूख के आगे निष्क्रिय हो चुके तंत्र को झकझोरने के लिए न्याय की मूर्ति को कभी-कभी आंखों से पट्टी हटाकर भी देखना ही चाहिए।