
राजनीतिक दावों-प्रतिदावों की औपचारिकता से परे सच यही है कि उपचुनाव में राजग उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन की जीत में कोई संदेह था ही नहीं, पर हार-जीत का उम्मीद से अधिक अंतर और भी बहुत कुछ कहता है। उपराष्ट्रपति चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्यों वाला निर्वाचक मंडल मतदान करता है। इसलिए चुनाव से पहले ही समीकरण समझ पाना मुश्किल नहीं होता। फिर भी चुनाव परिणाम की घोषणा तक दिलचस्पी बनी रहती है, क्योंकि उपराष्ट्रपति चुनाव में पार्टी व्हिप जारी नहीं होता और अंतर्रात्मा की आवाज पर क्रॉस वोटिंग की संभावनाएं जगाई जाती हैं। इस बार भी ऐसा किया गया। अंतर्रात्मा की आवाज का नारा तो विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की ओर से दिया गया, लेकिन उपलब्ध समर्थन से भी 25 मत ज्यादा राजग उम्मीदवार राधाकृष्णन को मिल गए। निर्वाचक मंडल में राजग के पास 427 वोट थे, लेकिन राधाकृष्णन को 452 वोट मिले। उधर ‘इंडिया’ गठबंधन के पास निर्वाचक मंडल में 315 वोट थे, लेकिन उसके उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी को 300 वोट ही मिले। बेशक 15 वोट अमान्य भी घोषित हुए, लेकिन तय है कि अंतर्रात्मा की आवाज पर, राजग उम्मीदवार को अतिरिक्त वोट मिले, जो कि विपक्षी खेमे में दरारों का स्पष्ट संकेत है।
उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान से पहले सांसदों को वोटिंग प्रक्रिया की बाकायदा मॉक एक्सरसाइज भी करवाई गई थी। उसके बावजूद 15 वोटों का अमान्य घोषित होना अनुत्तरित सवाल खड़े करता है। राधाकृष्णन को 25 वोट अतिरिक्त मिलने तथा 15 वोट अमान्य हो जाने पर टीका-टिप्पणी का सिलसिला अभी चलेगा, लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि सत्तारूढ़ राजग ने बेहतर प्रबंधन का प्रमाण दिया, जबकि इस चुनाव को वैचारिक लड़ाई बताने वाला विपक्ष उसमें सेंध लगाना तो दूर, अपने गठबंधन को भी एकजुट नहीं रख पाया।
आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी ने पहले ही राधाकृष्णन के समर्थन का ऐलान कर दिया था, जिसके 11 सांसद हैं। उन्हें भी जोड़ लें तो राधाकृष्णन को उम्मीद से 14 वोट ज्यादा मिले। इससे विपक्षी खेमे में परस्पर अविश्वास का माहौल है, जिससे आपस में दूरियां बढ़ेंगी। बेशक उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार चयन से दोनों ही गठबंधनों से राजनीतिक बिसात बिछाने की कवायद थी। दक्षिण भारत में अपनी सत्ता का एकमात्र दुर्ग कर्नाटक भी कांग्रेस के हाथों गँवा चुकी भाजपा ने तमिलनाडु के ओबीसी समुदाय से आनेवाले, संघ के स्वयंसेवक, राधाकृष्णन पर दांव लगाया, जबकि विपक्ष ने आंध्र प्रदेश से अलग होकर पृथक राज्य बने तेलंगाना के किसान परिवार में जन्मे सुदर्शन रेड्डी पर। राधाकृष्णन झारखंड के बाद महाराष्ट्र के राज्यपाल रहे, जबकि रेड्डी सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं। राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति बनाने से दक्षिण भारत में भाजपा के समर्थन में कितना माहौल बन पाएगा—यह तो भावी चुनाव ही बताएंगे, लेकिन तमिलनाडु के सत्तारूढ़ द्रमुक गठबंधन में सेंधमारी में उसे सफलता के संकेत नहीं मिलते। बेशक रेड्डी की उम्मीदवारी के जरिए आंध्र प्रदेश से समर्थन जुटाने का ‘इंडिया’ का दांव भी नाकाम रहा। राज्य में भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चला रहे चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम् पार्टी तो छोड़िए, प्रमुख विपक्षी दल वाईएसआरसीपी तक ने रेड्डी को समर्थन नहीं दिया।
मुख्यमंत्री नायडू से जगजाहिर कटुता के बावजूद जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी द्वारा राजग उम्मीदवार का समर्थन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की राजनीतिक प्रबंधन कुशलता का ही एक और प्रमाण है। ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की बीजू जनता दल, तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री केसीआर की भारत राष्ट्र समिति और पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की शिरोमणि अकाली दल के मतदान से अलग रहने को भी राजग के लिए सकारात्मक ही माना जाएगा जबकि ‘इंडिया’ तटस्थ दलों से समर्थन जुटाना तो दूर, अपने गठबंधन को भी एकजुट नहीं रख पाया। राधाकृष्णन को झारखंड और महाराष्ट्र से अतिरिक्त समर्थन मिलने की बात कही जा रही है। वे इन दोनों राज्यों के राज्यपाल रहे हैं। क्रॉस वोटिंग के लिए विपक्षी खेमे में शिवसेना (यूबीटी) और आम आदमी पार्टी पर संदेह किया जा रहा है, लेकिन दोनों ही ऐसा करने से इनकार कर रहे हैं।
हमारे राजनेता हार में भी जीत देखने-दिखाने की कला में माहिर होते हैं। सो, आश्चर्य नहीं कि 152 वोट से अपने उम्मीदवार की हार के बावजूद ‘इंडिया’ ब्लॉक इसे अपनी नैतिक जीत बता रहा है। बेशक विपक्ष का वोट शेयर पिछले उपराष्ट्रपति चुनाव के मुकाबले 26 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत हो गया है, लेकिन 2022 और 2025 के राजनीतिक समीकरणों की तुलना ही अतार्किक है। तब विपक्ष बिखरा हुआ था और कांग्रेस ने अन्य बड़े दलों से सलाह-मशविरा किए बिना ही अपनी नेत्री मार्गरेट अल्वा को उम्मीदवार बना दिया था। तब संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की संख्या भी अब के मुकाबले बहुत कम थी। 2023 में लगभग दो दर्जन दलों ने ‘इंडिया’ गठबंधन बनाया तो पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में विपक्ष की संख्या भी बढ़ी। चुनाव के जरिए चुने जाने वाले लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के पदेन सभापति उपराष्ट्रपति, सत्तापक्ष से ही होते हैं, लेकिन संविधान में उनकी भूमिका सदन के संरक्षक की मानी गई है। हाल के दशकों में उनकी इस भूमिका पर उठते सवाल संविधान और संसदीय लोकतंत्र के लिए सुखद हरगिज़ नहीं हैं। बेशक इस स्थिति के लिए किसी एक पक्ष को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उससे बचने का रास्ता भी दोनों ही पक्षों को खोजना होगा, पर उसकी पहल निश्चय ही नए उपराष्ट्रपति को करनी होगी। अनुभवी राधाकृष्णन की शायद यही बड़ी चुनौती और बड़ी परीक्षा भी होगी।
Published on:
12 Sept 2025 03:30 pm
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