
गुरु नानक देव प्रकाश पर्व पर विशेष
अजहर हाशमी
कवि और गीतकार
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आचरण की पवित्रता के पैमाने से ही संत का मूल्यांकन होता है। सदाचार के अभाव में संत की स्थिति उस सितार की तरह है, जिसमें तार नहीं हैं। तारविहीन सितार जिस प्रकार सुमधुर संगीत देने में असमर्थ होता है, उसी प्रकार सदाचार विहीन व्यक्ति समाज को सात्विक संदेश देने में अयोग्य होता है। आचरण की पवित्रता ही संतत्व का प्रमाण-पत्र है। सन् 1469 ई. की कार्तिक पूर्णिमा को पंजाब प्रांत के तलवण्डी (लाहौर से लगभग 30-40 मील दूर) नामक गांव में पिता कालूजी और माता तृप्ताजी के यहां जन्मे गुरु नानकदेव आचरण की पवित्रता के प्रतीक थे और पर्याय भी। गुरु नानक देव के लिए सदाचार होंठों का उच्चारण नहीं, अपितु आत्मा का आचरण था।
सन् 1539 ई. तक यानी जोती-जोत समाने तक संत गुरु नानकदेव सदाचार का ही संदेश देते रहे। उन्होंने कहा, ‘हे मन! यदि पास में कौड़ी न होने से भूखा रहना पड़ता है तो चिंतित होने की बात नहीं। चिंता तो केवल इस बात की करो कि कहीं तुमसे अनैतिक काम न हो जाए।’ संत गुरु नानकदेव ईमानदारी की कमाई पर जोर देते हैं। ईमानदारी सदाचार की नींव है। ईमान से कमाई हुई रोटी दरअसल सदाचार और सात्विकता का प्रतीक है। यही कारण था कि उन्होंने ‘मलिक भागो’ जैसे धनवान लेकिन बेईमान के स्वादिष्ट पकवानों को छूने से भी मना कर दिया लेकिन ‘किरती भाई लाली’ जैसे निर्धन लेकिन ईमानदार की मेहनत की कमाई से बनी हुई बाजरे की रूखी रोटी को ही सात्विक और बेहतर मानकर प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण किया।
इन पंक्तियों के लेखक का भी मत है कि अनैतिक साधनों से कमाया हुआ धन ऐसा कोबरा नाग है जो अंदर ही अंदर आत्मा को डसता रहता है, जिसका जहरीला परिणाम परिवार/पीढिय़ों को भोगना पड़ता है। एक वाक्य में कहूं तो यह कि अनैतिक साधनों से प्राप्त धन पविार को पीडि़त, संतान को संतप्त तथा पीढिय़ों को परेशान करता है। क्योंकि ‘कर्म’ कभी पीछा नहीं छोड़ता। मन की मलिनता तभी दूर होगी जब कमाई ‘खरी’ हो। ‘खोटी’ कमाई से मन भी ‘खोटा’ अर्थात मैला हो जाता है। गुरु नानकदेव ने फरमाया है, ‘तीरथ नाहते क्या करे मन में मैल गुमान’ अर्थात मन मैला है तो तीर्थस्थल पर स्नान से भी क्या होगा? इसका एक अर्थ यह भी है कि मन के मैल को दूर करने के लिए सदाचारी बनो। सदाचाररूपी साबुन से मन का मैल धुल जाएगा यानी आचरण की पवित्रता आएगी तो अपने आप तीर्थ स्नान का फल मिल जाएगा (मन चंगा तो कठौती में गंगा)। संत गुरु नानकदेव ने सदाचार के लिए शांति, सुकर्म, संतोष, श्रद्धा और सत्संग आदि से तन-मन की शुद्धि को आवश्यक बताया है। साहस सदाचार का अलंकरण है तो सद्भाव सदाचार का परिचय-पत्र है। संत गुरु नानकदेव ने सदाचार के बल पर ही साहसपूर्वक बादशाह बाबर के मदिरापान के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और उसके सोने-चांदी के तोहफों को भी अस्वीकार कर दिया। यह संत गुरु नानकदेव जैसी सदाचारी विभूति का ही साहस था कि उन्होंने बाबर से गोहत्या न करने का वचन लिया। यह तो हुआ इसका प्रमाण कि साहस, संत गुरु नानकदेव में कूट-कूट कर भरा हुआ था। तभी तो उन्होंने बाबर से बेबाक बेलाग बात कही।
संत गुरु नानकदेव ने मुसलमानों से कहा, ‘नेक कामों को तू अपना काबा बना। सच्चाई और ईमानदारी को अपना पीर बना। परोपकार को कलमा समझ। खुदा की मर्जी को अपनी तस्बीह (जपमाला) मान, तब खुदा तेरी लाज रखेगा।’ उन्होंने हिंदुओं से कहा, ‘मुझे ऐसा यज्ञोपवीत धारण कराइए जो मेरे साथ परलोक में भी जा सके। इस यज्ञोपवीत की कपास दया है, सूत संतोष है, गांठ संयम है और पूनी सत्व गुण है। ऐसा यज्ञोपवीत न टूटेगा, न जलेगा, न गंदा होगा, न नष्ट होगा।’ तात्पर्य यह है कि गुरु नानकदेव सदाचार को सर्वप्रथम और सर्वोत्तम मानते थे।
Published on:
08 Nov 2022 08:36 pm
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