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Patrika Opinion: अदालत तक क्यों जाएं सदन के मामले

Patrika Opinion: मत-मतान्तर होना लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन उसके लिए सदन को बाधित करना सही नहीं है और न ही एक लंबे समय के लिए सदन से किसी को निलंबित करके दंडित करना। सदन की व्यवस्था के मामले सुप्रीम कोर्ट में पहुंचना भी दुर्भाग्यपूर्ण है। जिन मसलों को विधानसभा अध्यक्ष, सरकार और विपक्ष को साथ बैठकर निपटाना चाहिए, वे अदालत में जा रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है।
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नई दिल्ली

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Giriraj Sharma

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Updated: 20 Jan 2022, 10:53 PM IST

आपकी बात, दलबदल की प्रवृत्ति क्यों बढ़ती जा रही है?

आपकी बात, दलबदल की प्रवृत्ति क्यों बढ़ती जा रही है?

Patrika Opinion: सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र विधानसभा से एक साल के लिए निलंबित किए गए भाजपा के 12 विधायकों की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट ने बुधवार को इस मामले पर सुनवाई पूरी कर ली। कोर्ट अब अपना फैसला सुनाएगा। इस बीच सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 190(4) का हवाला दिया और कहा कि संबंधित नियमों के तहत विधानसभा को किसी सदस्य को 60 दिनों से अधिक के लिए निलंबित करने का कोई अधिकार नहीं है। इसमें यह भी कहा गया है कि जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 151 ए के तहत एक निर्वाचन क्षेत्र ६ महीने से अधिक समय तक बिना प्रतिनिधित्व के नहीं रह सकता है।

दरअसल, महाराष्ट्र के विधानसभा अध्यक्ष ने पिछले साल 5 जुलाई को सदन से 12 भाजपा विधायकों का निलंबन एक साल के लिए कर दिया था। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि सदन से निष्कासन की स्थिति में संबंधित सीट को भरने की संवैधानिक व्यवस्था है और चुनाव आयोग संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव करवाता है, लेकिन निलंबन की अवस्था में चुनाव नहीं कराए जाते।

एक साल का निलंबन सदन में संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पूरी तरह से साफ करती है कि इस तरह के फैसलों में दूरगामी प्रभाव को नजरअंदाज किया गया। बहुमत के प्रभाव की वजह से कई राज्यों में ऐसे फैसले सामान्य हो गए हैं। देश में संवैधानिक व्यवस्था है।

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बहुमत की आड़ में विपक्ष की आवाज को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए। सदन एक ऐसी जगह है, जहां पर सत्ता पक्ष और विपक्ष साथ आकर राज्य और देश की व्यवस्था को आगे बढ़ाते हैं। मत-मतान्तर होना लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन उसके लिए सदन को बाधित करना भी सही नहीं कहा जा सकता है। साथ ही इसको भी सही नहीं ठहराया जा सकता है कि एक लंबे समय के लिए सदन से किसी को निलंबित करके दंडित किया जाए।

सदन की व्यवस्था के मामले सुप्रीम कोर्ट में पहुंचना भी दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। जिन मसलों को विधानसभा अध्यक्ष, सरकार और विपक्ष को साथ बैठकर निपटाना चाहिए, वे अदालत में जा रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक ही कही जाएगी। हालांकि, किसी भी संस्था को मनमाने ढंग से निर्णय लेने की छूट नहीं हो सकती है। अगर बार-बार ऐसा होता है, तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

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