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CM योगी की मदद से साइकिल का पंचर ठीक करने वाले की बेटी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में जीता गोल्ड मेडल, बदल दिया खेलों का इतिहास

CWG 2026 में त्रिपुरा की 21 वर्षीय अस्मिता डे ने जूडो में भारत को पहला ऐतिहासिक गोल्ड मेडल दिलाया। साइकिल पंचर बनाने वाले पिता के निधन के बाद दुखों से उबरकर अश्मिता ने महिलाओं के 48 किग्रा वर्ग में कनाडा की खिलाड़ी को हराकर यह स्वर्णिम सफलता हासिल की।
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Asmita Dey judo gold medal CWG 2026

अस्मिता डे ने जूडो में भारत को पहला ऐतिहासिक गोल्ड मेडल दिलाया (फोटो- IANS)

Asmita Dey Judo Gold Medal CWG 2026: कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) 2026 में जब जूडो के मुकाबले में भारत की अस्मिता डे मैट पर उतरीं, तो उनकी आँखों के सामने सिर्फ गोल्ड मेडल ही नहीं, बल्कि अब तक का घोर संघर्ष, पिता का बलिदान और माँ का त्याग भी तैर रहा था। मुकाबले के बाद जब रेफरी ने उन्हें विजेता घोषित किया, तो अस्मिता भावुक हो गईं। उनकी यह जीत एक बार फिर साबित करती है कि जिसकी बार-बार हार होती है, उसकी आसमां तक जीत होती है।

अस्मिता डे ने राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में जूडो स्पर्धा में भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलाकर इतिहास रच दिया। उन्होंने महिलाओं के 48 किग्रा वर्ग के फाइनल में कनाडा की हेइडी क्वैच को 2-1 से हराकर यह स्वर्णिम सफलता हासिल की।

अपनी इस ऐतिहासिक जीत के बाद अस्मिता डे ने सबसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार जताया, जिन्होंने उन्हें यूपी पुलिस में नौकरी दी। जीत के तुरंत बाद अस्मिता ने कहा, "मैं स्वर्ण पदक जीतकर बेहद खुश हूँ। यह मेडल उन सभी लोगों के लिए है जिन्होंने हर कदम पर मेरा साथ दिया। मैं विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को धन्यवाद देना चाहती हूँ, जिन्होंने मुझे यूपी पुलिस में सेवा करने का अवसर दिया।"

पिता चलाते थे साइकिल पंचर की दुकान

वर्तमान में वाराणसी में रहने वाली अस्मिता का जन्म 22 मार्च 2003 को दक्षिण त्रिपुरा के जिला मुख्यालय बेलोनिया में हुआ था। बचपन से ही अत्यधिक गरीबी में पली-बढ़ीं अस्मिता के पिता एक साइकिल मैकेनिक थे, जो पंचर बनाकर रोज़ के मुश्किल से 250-300 रुपये कमा पाते थे। इसके बावजूद, जब उन्हें पता चला कि बेटी खेल में करियर बनाना चाहती है, तो उन्होंने आर्थिक तंगी को कभी बेटी के सपनों के आड़े नहीं आने दिया।

पिता के निधन के बाद माँ ने किया प्रेरित

अस्मिता पर दुखों का पहाड़ तब टूटा, जब इस साल की शुरुआत में ब्रेन स्ट्रोक के कारण उनके पिता का निधन हो गया। पिता के अचानक चले जाने से अस्मिता टूट चुकी थीं, लेकिन ऐसे कठिन समय में उनकी माँ ने संबल दिया और उन्हें दोबारा मैट पर लौटने के लिए प्रेरित किया। अस्मिता ने बताया कि पिता को खोने के गम और अंतरराष्ट्रीय स्तर के दबाव के कारण वह ग्लासगो आने से पहले कई रातों तक सो भी नहीं पाई थीं।

वेट कंट्रोल पर रखा खास ध्यान

जूडो के फाइनल में जगह पक्की करने के बाद अस्मिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती वजन (Weight) को नियंत्रित रखने की थी। वह सतर्क थीं कि उनसे पेरिस ओलंपिक में विनेश फोगाट जैसी कोई चूक न हो जाए। गोल्ड मेडल मैच से पहले जब उनका वजन जांचा गया, तो वह तय मानक (48 किग्रा वर्ग) के अनुसार बिल्कुल सही पाया गया।

फाइनल में उन्होंने बिना किसी मानसिक दबाव के शानदार खेल दिखाया और कनाडा की हेइडी क्वैच के खिलाफ मजबूत डिफेंस व सटीक काउंटर-अटैक के दम पर 2-1 से ऐतिहासिक जीत दर्ज की।क न हो जाए। गोल्ड मेडल मैच से पहले जब उनका वजन जांचा गया, तो वह तय मानक (48 किग्रा वर्ग) के अनुसार बिल्कुल सही पाया गया। फाइनल में उन्होंने बिना किसी मानसिक दबाव के शानदार खेल दिखाया और कनाडा की हेइडी क्वैच के खिलाफ मजबूत डिफेंस के साथ सटीक काउंटर-अटैक के दम पर 2-1 से ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

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