विश्व एथलेटिक्स डे विशेष : गरीबी, पुरुष होने का आरोप सबकुछ झेल चुकी हैं भारत की यह स्टार एथलीट

  • महिला न होने के आरोप में लगभग खत्म हो गया था करियर
  • लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर की ट्रैक पर वापसी
  • काफी गरीब था दुतीचंद का परिवार, पिता बुनकर थे

Mazkoor Alam

May, 0707:05 AM

नई दिल्ली : एशियाई खेलों में दो पदक जीतने वाली और रियो ओलंपिक 2016 में 100 मीटर फर्राटा दौड़ में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी भारतीय महिला एथलीट दुती चंद ने पिछले महीने की 24 तारीख को 23वीं एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप के 200 मीटर दौड़ में में कांस्य पदक जीतकर एक बार फिर भारत का सिर ऊंचा किया। वह पहली ऐसी महिला एथलीट हैं, जिन्होंने पीटी ऊषा के बाद 100 मीटर की दौड़ में ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। दुती ने 2016 में ऐसा मौका भारत को 36 साल बाद दिलाया था। सुनने में एक भारतीय महिला एथलीट के लिहाज से यह उपलब्धियां काफी बड़ी लगती हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर बहुत आसान नहीं रहा है। इसके लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है। निजी जीवन में गरीबी के कारण किए गए संघर्ष और एथलीट बनने के बाद जेंडर विवाद के कारण उन्हें कोर्ट-कचहरी तक के चक्कर काटने पड़े। लेकिन वह हिम्मत नहीं हारी। अब वह टोक्यो ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीतना चाहती हैं। इसके लिए वह तैयारी में जुटी हैं। हालांकि उन्होंने अभी तक क्वालिफाई नहीं किया है।

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बेहद गरीबी में पली-बढ़ीं

ओडिशा की एथलीट दुती चंद बेहद गरीब परिवार से आती हैं। उनका जन्म गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवार में 3 फरवरी 1996 को ओडिशा के चाका गोपालपुर गांव में हुआ। उनके पिता एक बुनकर थे और रोजाना 10 से 20 रुपए की उनकी आमदनी थी। इस पर से उनका परिवार काफी बड़ा था। मां-पिता समेत कुल नौ लोग इस परिवार के सदस्य थे। दुती का एक भाई और 6 बहने हैं। इन सारे लोगों का खर्च चलाना उनके पिता के लिए भारी पड़ता था। इसके बावजूद दुती ने महज 4 साल की उम्र में दौड़ना शुरू कर दिया था। शुरुआत में वह नदी किनारे नंगे पांव दौड़ा करती थीं। शुरुआती दौर में उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह अपने लिए जूते खरीद पाती। इसके बावजूद उनके जज्बे में कोई कमी नहीं आई। दुती ने अपने संघर्ष के बारे में बात करते हुए एक बार कहा था कि उनके परिवार ने गरीबी की वजह काफी कुछ झेला है। इस कारण उनके भाई-बहनों की पढ़ाई नहीं हो पा रही थी, लेकिन उनके खेल में आने के बाद काफी कुछ बदला है। दुती का गांव भी ऐसा है, जहां अक्सर बाढ़ आ जाता है और बाढ़ आने के बाद वह मुख्य धारा से पूरी तरह कट जाता है।

गरीबी से भी बड़ी अभिशाप साबित हुई थी जेंडर संबंधी विवाद

एथलेटिक्स में अपनी पहचान बनाने के बाद भी दुती की परेशानियां कम नहीं हुईं। 2014 में राष्ट्रमंडल खेल से मात्र तीन दिन पहले उन्हें इस आरोप में निलंबित कर दिया गया कि वह लड़की नहीं है। इस वजह से वह राष्ट्रमंडल खेल में भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाईं। आईएएएफ की हाइपर एंड्रोजीनिज्म नीति के तहत उन्हें निलंबित किया गया था। आईएएफ के अनुसार, उनके स्वास्थ्य जांच में यह पता चला था कि उनके शरीर में निर्धारित स्तर से कहीं अधिक मात्रा में पुरुषों में पाया जाने वाला हार्मोन है। इसके बाद दुती ने आईएएफ की हाइपर एंड्रोजीनिज्म नीति को सीएएस में चुनौती दी। उनकी इस लड़ाई में भारतीय एथलेटिक्स महासंघ (एएफआई) ने भी काफी मदद की। महासंघ की मदद से उन्होंने एक लंबी लड़ाई जीतकर एथलेटिक्‍स ट्रैक पर वापसी की।

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रियो ओलंपिक जाने के लिए अच्छे जूते तक नहीं थे

दुती के पास रियो ओलिंपिक में दौड़ने के लिए अच्छे जूते और ट्रैक सूट नहीं थे। एक बार किसी तरह से उन्होंने जो उन्होंने खरीदा था, वह फट गए थे और वह काफी महंगे आते थे और दुती के पास उन्हें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। तब उनकी मदद के लिए राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक आगे आए थे।

इन्होंने ने भी की काफी मदद

दुती चंद अपनी बड़ी बहन सरस्वती को अपना आदर्श मानती हैं। बता दें कि सरस्वती खुद भी एक एथलीट थीं और वह खुद दुती को प्रैक्टिस कराती थीं। इसके अलावा जब दुती चंद के निलंबन झेल रही थीं, तब बैडमिंटन के महान खिलाड़ी और कोच गोपीचंद ने उनकी काफी मदद की थी। निलंबन के दौरान गोपीचंद बैडमिंटन एकेडमी ने दुती चंद के अभ्यास का सारा खर्च उठाया था।

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