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सुविधाएं मिली तो बढ़ा एथलीटों का हौसला, भारत के ज्यादातर पदकवीर गांव-कस्बों से, पढ़ें ये रिपोर्ट

भारत ने टोक्यो ओलंपिक 2021 और एशियन गेम्स 2023 में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। खास बात यह है कि ज्यादातर पदक जीतने वाले एथलीट बड़े शहरों और संपन्न परिवार से नहीं थे, बल्कि वे गांव और कस्बों के रहने वाले और गरीबी से संघर्ष करके चमके थे।

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भारतीय एथलीटों ने चीन के हांगझू एशियन गेम्स 2023 में इतिहास रचते हुए पहली बार 100 पदकों का आंकड़ा पार करके इतिहास रच दिया था। खास बात यह है कि ज्यादातर पदक जीतने वाले एथलीट बड़े शहरों और संपन्न परिवार से नहीं थे, बल्कि वे गांव और कस्बों के रहने वाले और गरीबी से संघर्ष करके चमके थे। पदक जीतने वाले सर्वाधिक एथलीट किसान परिवार से थे। दूसरे सबसे ज्यादा पदक विजेताओं में सेना में नौकरी करने वाले एथलीट थे।


256 एथलीटों पर सर्वे का निष्कर्ष

- लिंगानुपात अनुपात घटा: पदक विजेताओं में महिला-पुरुष का अनुपात 43:57 प्रतिशत का रहा। दो दशक पूर्व यह अनुपात 36:64 प्रतिशत था। 2018 में यह अंतर 40:60 प्रतिशत था।

- गांवों का वर्चस्व: 256 में से 68 देश के शीर्ष 25 शहरों से आते हैं, जबकि पदक विजेताओं में एक तिहाई खिलाड़ी ग्रामीण क्षेत्रों से हैं।

- जागरूकता बढ़ी: इनमें 40 पदक विजेता ऐसे परिवारों से हैं, जिनके मुखिया दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि अस्थिर आय वाले माता-पिता भी अपने बच्चों को खेलों में आगे बढ़ने में पूरा सहयोग कर रहे हैं।

- खेल अब भी विकल्प नहीं: इनमें से 33 पदक विजेता स्थिर आय वाले और स्थायी नौकरी वाले परिवारों से हैं। इससे स्पष्ट है कि इस वर्ग के लिए खेल अब भी करियर का विकल्प नहीं है।

- किसान व सेना का दबदबा: 62 पदक विजेता किसान परिवार से, जबकि करीब एक दर्जन से अधिक पदक विजेता सेना में कार्यरत हैं। 44 पदक विजेता ऐसे परिवारों से हैं, जिनका अपना व्यवसाय है।

- एकेडमी से शुरू हुआ सफर: 48 महिला पदक विजेता हैं, जिन्होंने एकेडमी में चयन के बाद खुद को निखारा। 50 पुरुष खिलाड़ी एकेडमियों से ही आगे बढ़ने में सफल रहे।

- खेल व पढ़ाई में संतुलन: 20 व उससे अधिक उम्र के 232 एथलीटों में से 135 कॉलेज ग्रेजुएट थे, जबकि 21 ने पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है। हालांकि इनमें से कम से कम 55 स्नातक एथलीटों के माता-पिता ने 12वीं कक्षा से आगे पढ़ाई नहीं की।

कुछ चिंताएं भी...

- अधिकांश एथलीटों ने कहा है कि खेल के बाद करियर के बारे में नहीं सोचा है।

- लगभग एक चौथाई पदक विजेताओं के पास कोई नौकरी नहीं थी।

- केवल 13 एथलीटों को ही निजी कंपनियों में नौकरी मिल पाई है।

- क्रिकेट की स्वर्ण विजेता पुरुष व महिला टीम में आठ खिलाड़ी ऐसे हैं, जिन्होंने 10वीं व 12वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी।

- कबड्डी व शतरंज में भी खिलाड़ी खेल पर फोकस करने के लिए 10वीं व 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं।

एथलीटों को जागरूक करना जरूरी

ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा का कहना है कि एथलीटों के लिए बुनियादी शिक्षा बहुत जरूरी है। यदि आप पश्चिमी देशों को देखें तो वहां बहुत कम एथलीट ऐसे हैं, जो अपना पूरा दिन खेलने में व्यतीत करते हैं। हमें वास्तव में खेल में दोहरे करियर के पहलू पर ध्यान देने की जरूरत है। एथलीटों को जागरूक करना जरूरी है कि वे खेल के साथ-साथ दूसरे करियर पर भी फोकस करें।

फैक्‍ट फाइल

सरकार ने दी सबसे ज्यादा नौकरी

96- सरकारी नौकरी, 52- पुरुष, 44 महिला

43- सुरक्षा बलों में, 36 पुरुष, 7 महिला

13- निजी क्षेत्र में, 9- पुरुष, 4 महिला

78- बेरोजगार, 35 पुरुष, 43 महिला

परिवार का आर्थिक आधार

कृषि- 62 (पुरुष-38, महिला- 24)

सेना- 16 (पुरुष-10, महिला- 6)

दिहाड़ी- 40 (पुरुष-21, महिला- 19)

सरकारी- 35 (पुरुष-14, महिला- 21)

व्यापार- 44 (पुरुष-27, महिला- 17)

अन्य पेशा- 56 (पुरुष-34, महिला- 22)