
नई दिल्ली। ''मंज़िलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, सिर्फ पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है,'' शायर अमे एस. भेंडे की ये पंक्तियां देवेंद्र झाझरिया पर बिल्कुल सटीक बैठती है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों आज देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार को हासिल करने वाले झाझरिया का संघर्ष प्रेरणादायी है। 2004 में अर्जुन अवॉर्ड और 2012 में पद्मश्री अवॉर्ड सम्मानित होने वाले देवेंद्र ने अपने मजबूत इरादों से हर मुश्किल को पार किया। आज राजीव गांधी खेल रत्न का पुरस्कार हासिल होने के बाद झाझरिया के नाम पर एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज हो जाएगी।
हादसों से हिम्मत हासिल करने वाला शख्स
झाझरिया के बारे में कहा जा सकता है कि वो हादसों से हिम्मत हासिल करते है। 1981 में राजस्थान के चूरू में पैदा हुए देवेंद्र जब महज आठ साल के थे, तब उनके साथ एक बड़ा हादसा हुआ था। एक पेड़ पर चढ़ते वक्त उन्हें 11000 के वोल्ट का करंट लगा। हादसे के कारण उनका एक हाथ बुरी तरीके जख्मी हो गया। जिसे बाद में डॉक्टरों ने काट कर हटा दिया। यह हादसा झाझरिया के परिवार पर किसी वज्रपात के जैसा था। हालांकि फिर भी झाझरिया ने हिम्मत नहीं हारी।
साधनों के अभाव का रोना नहीं
एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले झाझरिया ने खेलों में अपनी दिलचस्पी को बनाए रखा।
झाझरिया परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे अपने बच्चे को बेहतर प्रशिक्षण दिला सकें। फिर भी झाझरिया लगातार मेहनत करते रहें। साधनों के अभाव में वे शुरू में खेतों से सरकंडे तोड़ा करते थे और उन्हें भाले की तरह फेंक कर अभ्यास किया करते थें।
मेहनत रंग तो लानी ही थी
उम्र बढ़ने के साथ-साथ झाझरिया ने अभ्यास का नया तरीका अपनाया। अब झाझरिया ने खेजड़ी पेड़ की लकड़ियों से भाला बनाकर प्रैक्टिस करनी शुरू की। जब वो 10वीं की कक्षा में थें, तब एक डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट में नॉर्मल बच्चों से प्रतियोगिता करते हुए अपने विशिष्ट कौशल का प्रदर्शन किया। इस प्रतियोगिता में झाझरिया ने
पहली बार गोल्ड मेडल जीता। जिसके बाद वे कभी पीछे मुड़कर नहीं देखें।
पैरा ओलम्पिक में गोल्ड मेडल विजेता
साल 2002 में कोरिया में हुए खेलों में उन्होंने जेवलिन थ्रो में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। फिर 2003 में ब्रिटिश थ्रो, ट्रिपल जंप और शॉटपुट में 3 गोल्ड जीत वह सबकी नजरों में चढ़ गए। इसके बाद 2004 में एथेंस पैरा ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता और 62.15 मीटर जेवलिन फेंक कर विश्व रिकॉर्ड बनाया था। इसके 12 साल बाद रियो पैरालंपिक्स 2016 में देवेंद्र झाझरिया ने भाला फेंक स्पर्धा में अपने ही रिकॉर्ड में सुधार करते हुए 63.97 मीटर का प्रयास कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। अब उन्हें इसका सम्मान मिलने जा रहा है।
‘इच वन इज यूनीक’ नाम की कहानी के नायक
झाझरिया के संघर्ष की कहानियां अब बच्चे अपने स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ रहे हैं। एसआईईआरटी के नए पाठ्यक्रम के मुताबिक राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल ने क्लास फोर की अंग्रेजी की किताब में देवेंद्र की कहानी को शामिल किया है। राजस्थान पाठ्यपुस्तक मंडल की ओर से प्रकाशित चौथी क्लास की अंग्रेजी की किताब में वर्ल्ड रिकॉर्डधारी जेवलिन थ्रोअर देवेंद्र की कहानी ‘इच वन इज यूनीक’ शीर्षक से शामिल की गई है।
Published on:
29 Aug 2017 02:58 pm
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