
नई दिल्ली। एक जमाना था, जब भारत में खेल का मतलब बस क्रिकेट को समझा जाता था। लेकिन अब वो दिन लद चुके है। अब क्रिेकेट के साथ-साथ बैडमिंटन, हॉकी, कुश्ती, बॉक्सिंग जैसे खेल भी लोकप्रियता के सातवें शिखर पर आ चुके हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा योगदान उन खिलाड़ियों का है, जिन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों मेें भी खुद को साबित कर दिखाया। बात अगर बैडमिंटन की करें तो इसमें भारतीय शटलर चीन के दबदबे को समाप्त कर चुके है। असंभव से दिखने वाले इस काम को संभव और सच करने में एक बड़ी भूमिका निभाई भारतीय बैडमिंटन की प्रिंसेस पीवी सिंधु ने। ये वही सिंधु हैं, जो बचपन में मात्र 8-9 साल की उम्र में रोजाना 56 किलोमीटर की दूरी तय कर बैडमिंटन कैंप में ट्रेनिंग लेने जाती थीं। रियो ओलंपिक-2016 में सिल्वर मेडल जीतकर ऐसा करने वाली किसी भी खेल की पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं सिंधु ने अपने अथक मेहनत से न केवल अपना बल्कि पूरी दुनिया में भारत का मान बढ़ाया है।
विरासत में मिली थी खेल के साथ एक बड़ी जिम्मेबारी
रियो ओलपिंक में भारत के लिए सिल्वर मेडल जीतने वाली सिंधु के संघर्ष की कहानी आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरक है। पांच जुलाई 1995 को आंध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद में सिंधु का जन्म हुआ था। सिंधु के माता-पिता पी. विजया और पीवी रमन्ना भी वॉलीबॉल के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रहे हैं। सिंधु के पिता पीवी रमन्ना को खेल में किए उल्लेखनीय योगदान के लिए साल 2002 में अर्जुन पुरस्कार मिला था। इस नाते सिंधु को खेल विरासत में मिला। लेकिन इस विरासत के साथ बड़ी जिम्मेवारी भी मिली, खेल की दुनिया में अपने माता-पिता से भी बड़ा चमकता हुआ सितारा बनाने की। जिसे सिंधु ने बखूबी से अंजाम भी दिया है।
वॉलीबॉल नहीं बैडमिंटन का किया था चयन
सिंधु को अन्य लड़कियों की तरह सजने-संवरने का शौक बचपन से ही नहीं था बल्कि वे बचपन से ही खेल के प्रति आकर्षित थी। लेकिन उन्होंने वॉलीबॉल के टीम गेम में दूसरे खिलाड़ियों के खेल पर आश्रित होने के बजाय अकेले दम पर सफलता दिलाने की चुनौती वाले बैडमिंटन को अपनाया। सिंधु के बैडमिंटन चयन के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। सिंधु ने 2001 के 'ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियन' बने पुलेला गोपीचंद से प्रभावित होकर बैडमिंटन को चुना। आज वे गोपीचंद के मार्गदर्शन में हीं दिनोंदिन आगे बढ़ रही है। गुरु गोपीचंद अपने करियर में जिन उपलब्धियों को हासिल करने में कामयाब नहीं हो सके, वो आज अपने शिष्यों के माध्यम से हासिल कर रहे है। सिंधु ने महज आठ साल की उम्र से बैडमिंटन खेलना शुरू किया।
महबूब अली थे पहले गुरु
पीवी सिंधु के पहले गुरु महबूब अली थे। अली से सिंधु ने बैडमिंटन की बुनियादी बातों को सीखा। महज आठ साल की उम्र में सिंधु सिकंदराबाद में इंडियन रेलवे सिग्नल इंजीनियरिंग और दूर संचार विभाग के बैडमिंटन कोर्ट खेला करती थी। यहां से बुनियादी बातों को सीखने के बाद सिंधु पुलेला गोपीचंद के अकादमी में शामिल हो गई। जहां से उनके एक उदीयमान खिलाड़ी बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। आगे चलकर सिंधु ने मेहदीपट्टनम से इंटररमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की।
गजब का समर्पण भाव था सिंधु में
बैडमिंटन को लेकर सिंधु किस कदर समर्पित थीं, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वे बचपन में रोज 56 किलोमीटर तक की दूरी अपने घर से कोचिंग कैंप आने तक के लिए तय करती थीं। पीवी सिंधु रोजाना सुबह एकेडमी जाने के लिए 3 बजे उठती थीं, क्योंकि एकेडमी में सेशन 4.30 शुरू होता था। वे वापस आते ही 8.30 पर स्कूल जाती थीं और वहां से आते ही फिर से एकेडमी अभ्यास के लिए जाना होता था। आज सिंधु एकेडमी से 5 मिनट ड्राइव की दूरी पर हैदराबाद के गाउची बाउली में रहती हैं, लेकिन जरा सोचिए कि तब उनका घर एकेडमी से 56 किलोमीटर दूर था। ऐसे में नाजुक सी बच्ची की मेहनत का अंदाजा आपको हो जाएगा। द हिंदु अखबार की एक रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है। जब अखबार में ये स्टोरी छपी, तब सिंधु सातवीं कक्षा में पढ़ती थीं और घर से दूरी होने के बावजूद समय पर कोचिंग कैंप पहुंचना उनकी आदतों में शुमार था। पुलेला गोपीचंद ने तरह तरह से कभी मैदान पर चिल्लाने के लिए कहकर तो किसी और तरीके से परीक्षा लेकर सिंधु को परखा, हर परीक्षा में पास होने वाली सिंधु को पुलेला ने ऐसा तराशा कि आज सिंधु भारत की स्टार बैडमिंटन क्वीन बन चुकी हैं ।
विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में कांस्य पदक ने दिलाई पहचान
पांच फुट साढ़े 10 इंच लंबी पीवी सिंधु तब सुर्खियों में आई, जब उन्होंने साल 2013 में ग्वांग्झू चीन में आयोजित विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। वो विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी बनी। इसके बाद सिंधु ने इसी कामयाबी को अगले ही साल 2014 में कोपेनहागेन में भी दोहरा दिया। उन्होंने लगातार दूसरे साल विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर बैडमिंटन पंडितों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। साल 2013 में ही उन्होंने मलेशिया ओपन और मकाऊ ओपन का ख़िताब भी जीता। विश्व चैंपियनशिप के इन दो कांस्य को इस साल यानि 2017 में उन्होंने सिल्वर मेडल में बदल दिया है। सिंधु का कहना है कि वे अगले साल इसे गोल्ड में बदलने के लिए उतरेंगी।
चार महीने बिना फोन और बिना चॉकलेट खाए रहने के समर्पण से मिला ओलंपिक मेडल
रियो ओलंपिक सिंधु के लिए करियर की सबसे बड़ी चुनौती थी, जो उन्हें कोच गोपीचंद की तरफ से दी गई थी। सिंधु बताती हैं कि कड़ा इम्तहान था तो शर्तें भी कड़ी थीं। गोपीचंद ने उनका मोबाइल फोन ले लिया और चॉकलेट खाने पर पाबंदी लगा दी। बता दें कि चॉकलेट सिंधु के लिए फेवरेट चीज है, जो वे आज भी मैच के दौरान खाती दिखाई दे सकती हैं। लेकिन तब बात थी फिटनेस को 100 के बजाय 150 परसेंट के लेवल पर लेकर जाने की, इसलिए कोच ने ये बैन लगा दिए। सिंधु बताती हैं कि चार महीने पहले शुरू हुुए इन प्रतिबंधों ने उन्हें जीत के लिए और ज्यादा जुनून दिया और नतीजा आखिर में रियो में सिल्वर मेडल से आया। हालांकि सिंधु कहती हैं कि उन्हें लगता है कि वे कैरोलिना मारिन को हराकर गोल्ड जीत सकती थीं, इसलिए उन्हें फाइनल हारने का अफसोस होता है। लेकिन इससे टोक्यो ओलंपिक-2020 के लिए प्रेरणा भी मिलती है, जहां गोल्ड जीतना अब उनका सबसे बड़ा सपना है।
Published on:
17 Nov 2017 05:43 pm
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