
सबल सिंह भाटी . देरी से न्याय मिलने में विधि विज्ञान प्रयोगशालाएं और उनमें खाली पड़े आधे से अधिक पद भी जिम्मेदार हैं। हालात ये हैं कि प्रदेश की सभी सातों प्रयोगशालाओं में 2014 की जांचें भी लम्बित हैं। साल दर साल 12 से 13 हजार जांचें पेंडिंग रह जाती है। इसका असर न्यायिक प्रक्रिया पर पड़ता है और तारीख पर तारीख लेने की नौबत आती रहती है। पुलिस समय पर चालान पेश नहीं कर पाती है। न्यायशास्त्र के अनुसार देरी से मिलने वाला न्याय भी अन्याय से कम नहीं है। विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं की स्थापना का लक्ष्य अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से अपराध के अकाट्य साक्ष्य उपलब्ध करवाकर आपराधिक न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना था, लेकिन राजस्थान सरकार की उदासीनता के चलते वैज्ञानिक संवर्ग के आधे पद रिक्त होने से एफ.एस.एल. का परीक्षण समय पर नहीं हो पाता है।
इन मामलों की ऐसी जांचें
हत्या, बलात्कार, संदिग्ध हालत में मौत, डकैती जैसे संगीन आपराधिक मामलों व आर्थिक अपराध के प्रमुख सबूतों जैसे विसरा, खून, फिंगर प्रिंट, हैंड राइटिंग आदि सबूतों को परीक्षण के लिए इन सात विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है।
यहां हैं विधि विज्ञान प्रयोगशाला
प्रदेश में राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला जयपुर में वर्ष 1959 से है। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशालाएं जोधपुर एवं उदयपुर में वर्ष 1997 से, कोटा में वर्ष 2007 से, बीकानेर में वर्ष 2009 से, अजमेर में वर्ष 2012 से एवं भरतपुर में वर्ष 2015 से हैं।
स्वीकृत पदों में से आधे पद रिक्त
वैज्ञानिक एवं तकनीकी संवर्ग के 418 पदों में से 203 पद रिक्त हैं। मुख्यत: अतिरिक्त निदेशक के स्वीकृत चार पद, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी के 74 में से 47, वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के 43 में से 25, कनिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के 92 में से 58 व प्रयोगशाला सहायक के स्वीकृत सभी 10 पद रिक्त हंै। मंत्रालयिक एवं लेखा संवर्ग के 85 पदों में 21 पद रिक्त हंै।
यह है जांच की प्रगति रिपोर्ट
वर्ष पूर्व वर्ष की इस वर्ष में लंबित जाँच आई जाँच
2012 15054 25565
2013 13772 25091
2014 12907 27615
2015 12746 31346
जनवरी 2016 को 10840 प्रकरणों में जांच के लिए लंबित हंै।
मुख्यत: गम्भीर प्रकृति व आर्थिक अपराधों के मामलों एफ..एस.एल. रिपोर्ट मंगाई जाती है। रिपोर्ट समय पर नहीं आने के कारण न्याय प्रक्रिया अटक जाती है और पीडि़त पक्ष को समय पर न्याय नहीं मिल पाता है।
गुलाबसिंह भाटी, अधिवक्ता, राजस्थान उच्च न्यायालय
स्टाफ की कमी से काम का दबाव तो रहता ही है। एफएसएल रिपोर्ट कई प्रकार की होती है और सभी के अनुसंधान की प्रक्रिया अलग अलग होती है।
डॉ. वी.बी. अरोरा, निदेशक, राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला जयपुर
Published on:
25 May 2016 01:43 pm
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