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योद्धाओं का साहस देख बोले थे शेरशाह सूरी, मुट्ठी भर बाजरे के लिए खो देता मैं दिल्ली की सल्तनत

- दिल्ली के 80 हजार सैनिकों पर भारी पड़े मारवाड़ के 8600 सपूत Sacrifice day will be organized in Giri Sumel of Pali district :- 35 हजार सैनिकों को उतार दिया था मौत के घाट-1544 में हुआ था गिरी सुमेल का ऐतिहासिक युद्ध

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पाली

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Suresh Hemnani

Jan 04, 2020

योद्धाओं का साहस देख बोले थे शेरशाह सूरी, मुट्ठी भर बाजरे के लिए खो देता मैं दिल्ली की सल्तनत

योद्धाओं का साहस देख बोले थे शेरशाह सूरी, मुट्ठी भर बाजरे के लिए खो देता मैं दिल्ली की सल्तनत

पाली/रायपुर मारवाड़। Sacrifice day will be organized in Giri Sumel of Pali district : राजस्थान की धन्यधरा के स्वाभिमान एवं गौरव रक्षा के लिए कई युद्ध साक्षी है। इन युद्धों में गिरी सुमेल का युद्ध [ War of giri sumel ] इतिहास के पन्नों पर आज भी अलग पहचान रखता है। वजह भी है कि इस युद्ध में मारवाड़ के उन सपूतों की संघर्षमयी कहानी का चित्रण है जिसे सुनने मात्र से ही मारवाड़ के लोगों की आंखों में गौरव की चमक उभर आती है।

विक्रम संवत 1600 यानि 5 जनवरी 1544 में जोधपुर मारवाड़ के महाप्रतापी राजा रावमालदेव के सेनानायक जैताजी व कूपाजी के नेतृत्व की सेना ने दिल्ली के बादशाह शेरशाह सूरी के मध्य गिरी सुमेल का युद्ध हुआ था। शेरशाह सूरी की करीब 80 हजार की सेना ने सुमेल व बाबरा के पास डेरा जमाया था। इस सशस्त्र सेना की संख्या देख मालदेव युद्ध से पीछे हटने का निर्णय करते हुए अपनी सेना को लेकर जोधपुर के लिए रवाना हो गए। गिरी पहुंचने पर मालदेव के सेनानायक जैताजी व कूपाजी ने मारवाड़ के स्वाभिमान का तर्क देते हुए युद्ध से पीछे हटने से इनकार कर दिया। मालदेव को काफी समझाया गया लेकिन वे टस से मस नहीं हुए और इस युद्ध को लडने से इनकार करते हुए जोधपुर निकल गए। लेकिन जैताजी व कूपाजी स्वाभिमान की रक्षा के लिए गिरी ही रुके। मालदेव के साथ कुछ सैनिक चले गए लेकिन कुछ सैनिक जैताजी व कूपाजी के पास ही रुके।

36 कौम के सैनिकों का मिला समर्थन
जैताजी व कूपाजी ने बचे हुए सैनिकों के साथ मंत्रणा की। जिसमें राजपूत सहित 36 कौम के सैनिकों ने इस युद्ध का समर्थन किया। युद्ध में जैताजी कूपाजी सहित 36 कौम के 8600 सैनिकों ने संघर्ष करते हुए शेरशाह के 35 हजार सैनिकों को मार गिराया। जैताजी और कूपाजी का अदम्य साहस देख शेरशाह सूरी को ये कहना पड़ा कि वह मुट्ठी भर बाजरे के लिए दिल्ली की सल्तनत खो देता। इस युद्ध में जैताजी कूपाजी सहित 36 कौम के सैनिक वीर गति को प्राप्त हुए। गिरी नदी किनारे इन वीरों का अंतिम संस्कार किया गया। रणस्थली पर स्मारक बनाए गए। जहां प्रतिवर्ष पांच जनवरी को बलिदान दिवस मनाया जाता है। इस दिन वीरों को श्रद्धासुमन अर्पित कर उनके साहस व बलिदान को याद करने के साथ ही उनके आदर्शमय जीवन के अनुसरण की शपथ ली जाती है।

इतिहास से हुए अवगत
गिरी रणस्थली विकास समिति द्वारा बलिदान दिवस का आयोजन किया जाने लगा। जिसमें जिले भर से बड़ी संख्या में राजपूत समाज के लोग हिस्सा लेने लगे। इस बार समिति के संयोजक इन्द्रसिंह बागावास व अध्यक्ष हनुमानसिंह भैंसाणा ने 36 कौम के लोगों को इतिहास से रूबरू कराया। जिससे प्रभावित हुए लोगों ने बलिदान दिवस कार्यक्रम में हिस्सा लेकर अपने पूर्वजों द्वारा आत्म सम्मान के लिए लड़े गए युद्ध पर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करने का निर्णय किया। ऐसे में इस बार के समारोह में 36 कौम के लोग एक साथ हिस्सा लेंगे।