
बिहार के टनकपुर से आकर पाली में विराजी माता पुनागर
पाली के निकट पुनागर भाखरी पर स्थित पुनागर माता का मंदिर तीन हजार साल पुराना ऐतिहासिक शक्तिपीठ है। इस मंदिर पर जाने के लिए 570 सीढिय़ां चढऩी पड़ती है। चढ़ाव के पहाड़ी मार्ग में कई जगह श्रद्धालुओं के लिए बैठकर आराम करने की व्यवस्था भी की गई है। इस मंदिर के महंत अभयपुरी महाराज बताते हैं कि यह स्थान महात्माओं की तपोस्थली रही है।
यहां महात्मा ऋषिकेश पुरी तपस्या करते थे। वो अपनी योग क्रिया के बल पर बिहार के टनकपुर में विराजमान माता पुन्यागिरी के पास आते-जाते थे। एक बार माता ने महात्मा ऋषिकेश पुरी महाराज को स्वपन में आकर अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई। दूसरे दिन महात्मा अपने योग के बल पर माता के पास पहुंचे तो माता पुन्यागिरी महात्मा के साथ आकर यहां विराजमान हो गई। उनका नाम पुन्यागिरी से पुनागर माता हो गया। ये पीठ महात्मा शंकराचार्य से संबधित पीठ है। यहां आस्था के वशीभूत सैंकड़ो की संख्या में रोजाना श्रद्धालु पहुंचते है।
महंत अभयपुरी महाराज ने बताया कि यहां पहले से नाभि पूजा होती है। देवी पूजा तो अब होने लगी है। इसलिए यहां मुख्य पूजा नाभि पूजा है। यहां हर धर्म के सैंकड़ों श्रद्धालु चाहे मूर्ति पूजक हो या चाहे ना हो, यहां आकर माता की पूजा-अर्चना जरूर करते है।
कई सालों से चल रही दो अखंड ज्योत
स्थापना के समय से ही माता के मंदिर में घी व तेल की दो अखंड ज्योत चल रही है। इसके लिए किसी से ना तो पैसे लिए जाते है, ना ही कोई अन्य सामान लिया जाता है।
मंदिर के पास पहाड़ी पर कई गुफाएं है। यहां मुख्य गुफा भंवरा माता की गुफा है। इस गुफा में माता भंवरा विराजमान है। मान्यता है कि गुफा का द्वार गाजनगढ़, चोटिला, सोजत सहित कई माताओं के स्थानों पर भी है। माता इन गुफाओं से अन्य स्थानों पर आती-जाती रहती है। इस गुफा में सैंकड़ों की संख्या में चमगादड़ रहती है व भंवरा मधुमक्खियों के छत्ते है। मान्यता है कि इस गुफा में गलत भावना से प्रवेश करने वाले लोगों के पीछे भंवरा मधु मक्खियां पड़ जाती है। जब तक वो लोग स्थान नही छोड़ देते तब तक वो उनका पीछा नही छोड़ती है। इस लिए इस माता का नाम भंवरा माता पड़ा।
कई सालों पहले यहां युद्ध होने पर माता ने पल्लीवालों के हजारों योद्धाओं व लोगों को मरने से बचाया था व उन्हें पहाड़ी पर शरण देकर सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाई थी। पल्लीवालों ने माता को अपनी कुलदेवी माना।
कहा जाता है कि महात्मा पुरुषोतमपुरी ने एक साथ 12 जगहों पर जिंदा समाधि लेकर भक्तों को चमत्कार दिखाएं। उन्होंने लोगो द्वारा मोरों को मारकर पकाने के दौरान ही वहां पहुंचकर उन मोरों को जिंदा कर दिया तो लोग डर कर वहां से भाग गए। उसके बाद महात्मा के लेने के बाद उनकी समाधि पर श्रद्धालुओं ने शिवलिंग बनाया जो आज भी है।
एक गाय पहाड़ी पर चढकऱ माता के मंदिर पर 25 सालों तक रही। गाय के चारे पानी की व्यवस्था भी महात्मा किया करते थे। उसकी मौत पर गाय को समाधि दी गई। समाधि पर गाय की मुर्ति की भी प्रतिष्ठा की गई। जहां उसकी पूजा की जाती है।
Published on:
17 Apr 2021 08:32 pm
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