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जब घड़ी या मोबाइल नहीं थे तब मंदिर का घंटा बताता था समय! जानें पन्ना की इस ऐतिहासिक धरोहर का रहस्य

Shri Prannath Temple : 1864 में लंदन से आया था विशाल घंटा, समय बताने से लेकर धार्मिक चेतना जगाने तक जुड़ा है इसका गौरवशाली इतिहास। 350 साल से गूंज रही आस्था की ध्वनि। श्री प्राणनाथ मंदिर के घंटे से बदलता था पहर।
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Shri Prannath Temple

महामति श्री प्राणनाथ जी मंदिर और 350 किलों का घंटा (फोटो सोर्स: Patrika)

Panna News :मध्य प्रदेश में स्थित बुंदेलखंड की ऐतिहासिक धरा पन्ना सिर्फ अपने भव्य मंदिरों और धार्मिक आस्था के लिए ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी अनूठी परंपराओं के लिए भी खास पहचान रखती है। यहां मौजूद महामति श्री प्राणनाथ जी मंदिर में घंटा बजाने की परंपरा करीब 350 सालों से चली आ रही है। कभी इस घंटे की गूंज पूरे शहर और आसपास के गांवों तक लोगों को समय का बोध कराती थी तो आज इसकी ध्वनि श्रद्धा, आध्यात्मिक चेतना और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाती है। आधुनिक समय में घड़ी और मोबाइल ने समय जानने के पुराने साधनों की जगह ले ली है, लेकिन मंदिर में घंटा बजाने की परंपरा आज भी लगातार जारी है।

प्रणामी संप्रदाय के प्रमुख आस्था केंद्र श्री प्राणनाथ जी मंदिर में देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। विशेष रूप से शरद पूर्णिमा महोत्सव के दौरान हजारों सुंदरसाथ मंदिर पहुंचकर महामति श्री प्राणनाथ जी के दर्शन करते हैं और आध्यात्मिक वातावरण में स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। मंदिर की परंपराएं इस धाम की ऐतिहासिक और धार्मिक विशिष्टता को और भी बढ़ाती हैं।

घंटे की गूंज से मिलता था समय और पहर का बोध

पुराने समय में जब आम लोगों के पास घड़ियां और समय मापने के आधुनिक साधन नहीं थे, तब मंदिर के गुंबद में लगे विशाल घंटे की ध्वनि लोगों के लिए समय जानने का प्रमुख जरिया थी। घंटे की आवाज पूरे पन्ना शहर में गूंजती थी। रात के सन्नाटे में इसकी आवाज आसपास के गांवों तक सुनाई दिया करती थी। लोग घंटे की आवाज के अनुसार अपनी दिनचर्या तय करते थे। करीब चार दशक पहले तक इसका इसी तरह इस्तेमाल होता रहा।

दिन और रात के 8 पहर

प्रणामी समाज के प्रतिष्ठित साहित्यकार अश्वनी दुबे का कहना है कि, मंदिर के घंटे से समय के साथ-साथ प्रहर बदलने का भी संकेत मिलता था। हिंदू परंपरा में दिन-रात को आठ पहरों में बांटा गया है और हर पहर 3 घंटे का माना जाता है। पहर बदलने पर मंदिर का घंटा दो बार बजाया जाता था। देश के कई प्राचीन मंदिरों में भी बड़े घंटे बजाने की परंपरा रही है।

1864 में लंदन से पन्ना पहुंचा था विशाल घंटा

श्री प्राणनाथ जी मंदिर ट्रस्ट के पूर्व सचिव राकेश कुमार शर्मा का कहना है कि, साल 1864 में अष्टधातु से बने कई विशाल घंटे लंदन से भारत लाए गए थे। इनमें से एक घंटा पन्ना के श्री प्राणनाथ जी मंदिर में भी स्थापित किया गया था। कई दशकों तक इसकी गूंज लोगों को समय का बोध कराती रही। बाद में इसमें दरार आने से आवाज बदल गई। इसकी मरम्मत के प्रयास किए गए, लेकिन पुरानी ध्वनि वापस नहीं आ सकी। इसके बाद मंदिर ट्रस्ट ने भारत में निर्मित एक नया विशाल घंटा यहां स्थापित कराया, जिससे ये परंपरा आज भी निभाई जा रही है।

मंदिर की घंटी का भी आध्यात्मिक महत्व

मंदिर में आते समय बजाई जाने वाली घंटी का भी अपना आध्यात्मिक महत्व है। मान्यता है कि, इसकी आवाज मन को एकाग्र कर विचारों की चंचलता कम करने में मददगार होती है। इससे पूजा और आराधना के समय शांति और आनंद की अनुभूति होती है। आज श्री प्राणनाथ जी मंदिर में गूंजता घंटा सिर्फ समय का संकेत नहीं देता, बल्कि पन्ना की 350 साल पुरानी धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक गौरव और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का जीवंत प्रतीक है।