
कांग्रेस। (फाइल फोटो)
बिहार कांग्रेस में नए जिला अध्यक्षों की घोषणा के बाद विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में घोषित 53 जिला अध्यक्षों में से 24 सवर्ण हैं। लिस्ट जारी होने के बाद कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया है। उनका कहना है कि कांग्रेस हिस्सेदारी के आधार पर भागीदारी की बात करती है, लेकिन संगठन में इसे सही ढंग से लागू नहीं किया जा रहा। पार्टी ने नए नेताओं को अधिक महत्व दिया है—53 में से 43 नए चेहरे हैं, जबकि 10 पुराने जिलाध्यक्षों को फिर से मौका मिला है।
बिहार में कांग्रेस की नई जिलाध्यक्षों की सूची में ब्राह्मण और यादवों का दबदबा है। 53 में से सबसे अधिक 10-10 जिलाध्यक्ष ब्राह्मण और यादव जाति से बनाए गए हैं। कांग्रेस का फैसला पंरपरागत वोट बैंकों को अपने साथ जोड़ने को लेकर देखा जा रहा है। क्योंकि लंबे समय तक ब्राह्मण कांग्रेस के परंपरागत वोटर रहे हैं, लेकिन आरजेडी के साथ कांग्रेस के गठबंधन की वजह से वे धीरे-धीरे बीजपी की ओर शिफ्ट कर गए थे।। इस बार कांग्रेस ने यादवों पर भी दांव खेला है। यादव शुरू में कांग्रेस के साथ थे, लेकिन 1990 के बाद वे आरजेडी के साथ चले गए थे और कांग्रेस ने उन्हें वापस जोड़ने का कम प्रयास किया है। इस बार कांग्रेस ने यादवों को भी अहम पद दिए हैं। इसके अलावा, पार्टी ने 7 भूमिहार, 5 राजपूत और 2 कायस्थ को जिलाध्यक्ष बनाया है, साथ ही 7 मुसलमान और 1 सिख को भी यह जिम्मेदारी दी गई है।
कांग्रेस की नई लिस्ट में पिछड़ा वर्ग में यादवों का दबदबा है। 53 जिलाध्यक्षों में से 10 पद यादवों को दिए गए हैं। अनुसूचित जाति (दलित) से 7 और कुशवाहा जाति से 3 लोगों को जिलाध्यक्ष बनाया गया है। कांग्रेस इससे प्रदेश में लव-कुश समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद कांग्रेस ने 'संगठन सृजन अभियान' के तहत यह बदलाव किया है। AICC के पर्यवेक्षकों ने जिलों का दौरा कर रिपोर्ट तैयार की और इसके आधार पर नए जिलाध्यक्षों को जिम्मेदारी सौंपी गई। हालांकि, इस रिपोर्ट पर सवाल भी उठ रहे हैं। कांग्रेस के सीनियर नेताओं का कहना है कि अति पिछड़ा वर्ग को जिलाध्यक्ष नियुक्तियों में पर्याप्त महत्व नहीं मिला, जबकि बिहार में ईबीसी वर्ग की कुल आबादी 36 फीसदी है।
कांग्रेस ने अपने 10 यादव कार्यकर्ताओं को जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है, जिसे लेकर काफी चर्चा हो रही है। इस फैसले को आरजेडी के वोट बैंक में सेंधमारी के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा, 7-7 मुस्लिम, दलित और भूमिहार नेताओं को भी जिलाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि 5 पद राजपूत समुदाय के नेताओं को दिए गए हैं। कांग्रेस ने इस बार पुराने वोट बैंक को जोड़ने के लिए कुल 38 जिलों में सवर्ण, दलित और मुस्लिम नेताओं को कमान सौंपी है।
सूची जारी होने के बाद पार्टी में विवाद खड़ा हो गया है। कुछ नेता और कार्यकर्ता इसके समर्थक हैं, जबकि कुछ इसका विरोध कर रहे हैं। पार्टी के आला कमान के समर्थकों का कहना है कि कई जिलों में सवर्ण नेताओं की मजबूत पकड़ है और वे लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं, इसलिए उनके अनुभव और संगठन क्षमता के आधार पर उन्हें जिम्मेदारी देना सही है। वहीं, विरोधियों का तर्क है कि यह सामाजिक संतुलन के खिलाफ है और इससे पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक में नाराजगी बढ़ सकती है।
Updated on:
03 Apr 2026 09:36 am
Published on:
03 Apr 2026 09:36 am
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