
शराब की दुकान। फाइल फोटो- पत्रिका
Bihar Liquor Ban थिंक-टैंक की हालिया स्टडी में बिहार में शराबबंदी खत्म करने की सलाह दिए जाने के बाद राज्य में सियासी तापमान बढ़ गया है। थिंक-टैंक की रिपोर्ट में शराबबंदी के कारण राज्य को होने वाले भारी राजस्व नुकसान और महिलाओं के खिलाफ अपराधों को रोकने में इसकी कथित विफलता का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों में कहा गया है कि शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने में सफल नहीं रही, जबकि अप्रैल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसी उद्देश्य से राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी।
रिपोर्ट सामने आने के बाद पटना के राजनीतिक हलकों में इस बात को लेकर चर्चा तेज हो गई है कि क्या बिहार की शराबबंदी नीति पर एक बार फिर विचार किया जाना चाहिए। इस मुद्दे ने विपक्षी पार्टी आरजेडी को बीजेपी पर शराबबंदी को प्रभावी तरीके से लागू नहीं कर पाने का आरोप लगाने का मौका दे दिया है। वहीं, एनडीए के सहयोगी दलों में भी इस नीति को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ नेता शराबबंदी को और सख्ती से लागू करने की मांग कर रहे हैं, जबकि जेडीयू के कम से कम एक वरिष्ठ नेता ने इसकी समीक्षा की जरूरत बताई है।
सत्तारूढ़ बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, अगर बिहार में शराब की बिक्री दोबारा शुरू होती है तो राज्य के राजस्व में बड़ा इजाफा हो सकता है। हालांकि, पार्टी फिलहाल शराबबंदी की नीति में किसी तरह के बदलाव से बचना चाहती है। माना जा रहा है कि इस नीति में बदलाव से पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भावनाएं आहत हो सकती हैं। यही वजह है कि बीजेपी इस मुद्दे पर फिलहाल किसी तरह की जल्दबाजी के पक्ष में नहीं है।
अप्रैल 2026 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए 10 साल पूरे हो गए। पिछले सप्ताह इंडिया पॉलिसी फोरम की ओर से प्रकाशित नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की एक शोध रिपोर्ट में राज्य सरकार को पूर्ण शराबबंदी समाप्त करने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों में कहा गया है कि शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने में सफल नहीं रही। हालांकि, अप्रैल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं की सुरक्षा समेत सामाजिक कारणों को ध्यान में रखते हुए राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी।
रिपोर्ट सामने आने के बाद आरजेडी प्रवक्ता चितरंजन गगन ने सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट राज्य सरकार की ‘पूर्ण विफलता’ को उजागर करती है। उन्होंने कहा कि अब मामला सिर्फ हर साल होने वाले राजस्व नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि शराबबंदी के कारण राज्य में एक समानांतर अवैध अर्थव्यवस्था भी खड़ी हो गई है। उनका कहना है कि ऐसी रिपोर्टें संकेत देती हैं कि राज्य सरकार भविष्य में आंशिक या पूर्ण रूप से शराबबंदी से बाहर निकलने का रास्ता तलाश सकती है।
जेडीयू भले ही अभी भी शराबबंदी के समर्थन में है, लेकिन सीतामढ़ी से सांसद देवेश चंद्र ठाकुर का मानना है कि इस नीति की समीक्षा होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “शराबबंदी कहीं भी सफल नहीं हुई है।”
वहीं, लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने कहा कि यह सही है कि शराबबंदी से राज्य सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है। सरकार को राजस्व बढ़ाने के लिए दूसरे विकल्प तलाशने चाहिए। केवल राजस्व बढ़ाने के लिए शराबबंदी हटाना उचित नहीं होगा।
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का मानना है कि बिहार में भी गुजरात मॉडल की तर्ज पर शराबबंदी को और सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। इससे पहले बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी स्पष्ट कर चुके हैं कि राज्य सरकार फिलहाल अपनी शराब नीति की समीक्षा नहीं करेगी।
हालांकि, शराबबंदी को लेकर बहस सिर्फ राजस्व तक सीमित नहीं है। आलोचकों का दावा है कि शराबबंदी के बाद बिहार में अवैध नशीले पदार्थों के इस्तेमाल में तेजी आई है और समानांतर अवैध शराब का कारोबार भी खड़ा हो गया है। उनका यह भी तर्क है कि अगर बिहार में होटल और पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देना है तो कम से कम आंशिक रूप से शराब की बिक्री की अनुमति देने पर विचार करना होगा।
Updated on:
12 Aug 2026 03:03 pm
Published on:
12 Aug 2026 03:03 pm
