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बिहार में CM चेहरे पर BJP का सेफ प्लान: नए प्रयोग से दूरी, जातीय समीकरण और गठबंधन पर फोकस

भारतीय जनता पार्टी आमतौर पर मुख्यमंत्री पद के लिए चौंकाने वाले फैसले उन्हीं राज्यों में करती है, जहां उसका जनाधार पहले से मजबूत होता है या जहां उसे चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिला होता है। बिहार की स्थिति इससे अलग है।

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Nitish Kumar and Amit Shah

नीतीश कुमार और अमित शाह (फोटो- नीतीश कुमार एक्स पोस्ट)

बिहार में नए मुख्यमंत्री के चयन को लेकर काउंटडाउन शुरू हो गया है। नीतीश कुमार 9 अप्रैल को दिल्ली जाएंगे और 10 अप्रैल को राज्य सभा में शपथ लेंगे। इसके बाद 11 अप्रैल को वे पटना लौटेंगे। दिल्ली दौरे के दौरान वे 9 अप्रैल को जदयू की बैठक में भी शामिल होंगे। पटना लौटने के बाद वे एनडीए की विधानमंडल दल की बैठक में भाग लेंगे, जिसमें नए नेता के चयन की औपचारिकता पूरी की जाएगी। यह लगभग तय माना जा रहा है कि नया मुख्यमंत्री भाजपा का होगा, हालांकि पार्टी ने अभी इस पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। सूत्रों के अनुसार, भाजपा अन्य राज्यों की तरह किसी नए चेहरे पर दांव लगाने से बच सकती है और बिहार में स्थिरता, गठबंधन की मजबूती तथा जातीय समीकरणों को प्राथमिकता दे सकती है।

बिहार में BJP का फॉर्मूला

भारतीय जनता पार्टी आमतौर पर मुख्यमंत्री पद के लिए चौंकाने वाले फैसले उन्हीं राज्यों में करती है, जहां उसका जनाधार पहले से मजबूत होता है या जहां उसे चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिला होता है। बिहार की स्थिति इससे अलग है। राज्य में भाजपा का स्वतंत्र जनाधार अपेक्षाकृत सीमित रहा है और लंबे समय के प्रयासों के बावजूद पार्टी अभी तक अकेले सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंच सकी है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा बिहार में किसी नए या अनजान चेहरे पर दांव लगाने से बच सकती है। क्योंकि अपरिचित चेहरे पर प्रयोग करना संगठन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है और गठबंधन की मजबूती को भी प्रभावित कर सकता है। भाजपा की रणनीति को इस तरह समझा जा सकता है—जहां संगठन मजबूत हो, वहां प्रयोग; और जहां स्थिति चुनौतीपूर्ण हो, वहां सतर्कता।

स्पीकर और गृह विभाग पर JDU की नजर

वर्तमान विधानसभा में भाजपा के पास अधिक सीटें होने के कारण पार्टी मुख्यमंत्री पद पर दावा कर रही है। दूसरी ओर जदयू का कहना है कि भले ही मुख्यमंत्री पद भाजपा को मिले, लेकिन सरकार में उसकी भूमिका कमजोर नहीं होनी चाहिए। इसी को लेकर जदयू सम्मानजनक हिस्सेदारी और प्रभावशाली पदों की मांग कर रही है। पार्टी गृह विभाग के साथ-साथ विधानसभा अध्यक्ष पद पर भी दावा जता रही है। दरअसल, स्पीकर का पद सदन की कार्यवाही, विधायकों की सदस्यता और कई अहम निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए जदयू इस पद को अपने पास रखना चाहती है। फिलहाल यह पद भाजपा के पास है और पार्टी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा स्पीकर का पद छोड़ने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि यह सरकार के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।"

मंत्रालयों पर खींचतान

सरकार गठन में दूसरा बड़ा मुद्दा महत्वपूर्ण मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर है। जदयू चाहती है कि वित्त, गृह, ग्रामीण विकास, ऊर्जा, शिक्षा और जल संसाधन जैसे अहम विभाग उसके पास बने रहें, ताकि इन मंत्रालयों के जरिए वह अपनी योजनाओं को सीधे जनता तक पहुंचाकर अपने वोटर आधार को मजबूत कर सके। वहीं, भाजपा की नजर गृह, पथ निर्माण, स्वास्थ्य और उद्योग जैसे प्रमुख विभागों पर है। ये मंत्रालय कानून-व्यवस्था और विकास की छवि से जुड़े होते हैं, इसलिए भाजपा इन पर नियंत्रण बनाकर जनता के बीच मजबूत संदेश देना चाहती है।