
जय प्रकाश नारायण और शिवानंद तिवारी
JP movement Bihar: बिहार की सियासत में जब भी 1974 के छात्र आंदोलन और समाजवाद का जिक्र होता है, तो कई ऐसे अनसुने और दिलचस्प किस्से सामने आते हैं जो आज की पीढ़ी को हैरान कर देते हैं। वरिष्ठ समाजवादी नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने सोशल मीडिया पर जेपी आंदोलन के दौर का एक ऐसा ही एक किस्सा शेयर किया है। उन्होंने बताया कि कैसे लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने एक गलतफहमी के कारण उन्हें डांटकर अपने कमरे से बाहर निकाल दिया था, लेकिन बाद में सच्चाई का पता चलने पर लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे युवा नेताओं की मौजूदगी में भरी सभा में हाथ जोड़कर उनसे माफी मांग ली थी।
शिवानंद तिवारी ने अपने संस्मरण की शुरुआत आज की राजनीतिक स्थिति पर तंज कसते हुए की। उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि उन्होंने राजनीति की शुरुआत एक लोहियावादी के रूप में की थी, लेकिन उनकी पीढ़ी के जितने भी लोग आज बिहार की राजनीति के शीर्ष पर हैं या लंबे समय तक कायम रहे, उन सबको जेपी आंदोलन ने ही नेता बनाया था।
शिवानंद तिवारी ने लिखा, 'बिहार की राजनीति में जो सड़ांध दिखाई दे रही है, उसके पीछे यह भी एक कारण है कि पिछले पचास वर्षों से जन सवालों पर कोई व्यापक जन संघर्ष नहीं हुआ। इसलिए राजनीति की सफ़ाई नहीं हुईं। पचास सालों से बिहार की राजनीति एक ही पटरी पर चल रही है। यही कारण है कि यहां की राजनीति में अनेक विकृतियां पैदा होती चली गईं।' इसके बाद उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया और जेपी के व्यक्तित्व की तुलना करते हुए जेपी की महानता का वह ऐतिहासिक किस्सा सुनाया।
यह वाकया 19 मार्च 1974 का है। आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी और 18 मार्च की रात गिरफ्तारी के डर से कुछ आंदोलनकारी साथी शिवानंद तिवारी के श्रीकृष्ण पुरी स्थित घर पर सोए थे। सुबह भूदान यज्ञ कमिटी के सचिव भवेश चंद्र प्रसाद उन लोगों को लेकर राजेंद्र नगर में जयप्रकाश जी से मिलाने ले गए। भवेश जी वहां जेपी से सबका परिचय करा रहे थे। जब शिवानंद तिवारी की बारी आई तो उन्होंने घरेलू आत्मीयता के कारण सीधे भोजपुरी में कहा, 'हम शिवानंद हईं।' दरअसल, शिवानंद के पिता को समाजवाद की दीक्षा देने वाले खुद जेपी ही थे, इसलिए शिवानंद उन्हें अपने घर का बुजुर्ग मानते थे।
लेकिन नाम सुनते ही जेपी की भौंहें तन गईं। उन्होंने दोबारा पूछा तो शिवानंद ने फिर से अपना परिचय दिया। इस पर जेपी ने भोजपुरी में ही सवाल किया, 'तूं एह लोग के साथे कईसे?' जेपी के इस रुख से शिवानंद तिवारी भीतर से बेहद अपमानित महसूस करने लगे। उन्होंने संभलकर जवाब दिया कि आपकी तबीयत खराब होने की खबर सुनी थी, इसलिए देखने चला आया। जेपी ने तुरंत कहा, 'हमार तबीयत ठीक बा, अब जा।' जेपी ने एक तरह से शिवानंद को कमरे से बाहर निकाल दिया। शिवानंद बाहर आकर बाकी साथियों का इंतजार करने लगे और इस सोच में डूब गए कि आखिर जेपी ने उनके साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया।
इस अपमान के बाद सोशलिस्ट नेता ओमप्रकाश दीपक की सलाह पर शिवानंद तिवारी ने पटना शहर के अलग-अलग मोहल्लों में घूमकर आंदोलन की कमेटियां बनानी शुरू कर दीं। वे सुबह जाकर घोषणा करते और शाम को मीटिंग में 50 से 100 लोग जमा हो जाते। धीरे-धीरे आंदोलन में शिवानंद तिवारी की सक्रियता और जमीन पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत हो गई।
उस समय आंदोलन की छात्र संचालन समिति की कमान लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी जैसे युवा नेताओं के हाथों में थी। शिवानंद की बढ़ती लोकप्रियता और ऊर्जा को देखते हुए इन नेताओं ने उन्हें भी संचालन समिति में को-ऑप्ट (मनोनीत) सदस्य के रूप में शामिल कर लिया।
ट्विस्ट तब आया जब संचालन समिति के सदस्य के रूप में शिवानंद तिवारी अपनी पहली बैठक में शामिल होने महिला चरखा समिति (जो जेपी का आवास भी था) पहुंचे। बैठक वाले हॉल में लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी समेत तमाम युवा और दिग्गज नेता मौजूद थे। सभी के बैठ जाने के बाद लोकनायक जयप्रकाश नारायण कमरे में दाखिल हुए और अपनी कुर्सी पर बैठे।
कुर्सी पर बैठते ही जेपी की नजर सीधे शिवानंद तिवारी पर पड़ी। जेपी ने पूरी सभा के सामने देखते हुए कहा, 'सबसे पहले हम शिवानंद से माफी मांगना चाहेंगे।' यह कहते हुए देश के उस समय के सबसे बड़े नायक ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।
लालू यादव और नीतीश कुमार समेत वहां मौजूद तमाम युवा नेता इस दृश्य को चकित भाव से देख रहे थे कि जिस जेपी के सामने देश की हुकूमत झुकती है, वो एक नौजवान के सामने हाथ जोड़कर खड़े हैं। शिवानंद तिवारी लिखते हैं कि उस समय उनकी जो स्थिति हुई, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उन्होंने भी तुरंत हाथ जोड़े और उनके मुंह से भोजपुरी में निकला, 'अइसन मत करीं, हमरा पाप लागी। रउआ के अधिकार बा हमरा के बोले के, डांटे के।'
तब जेपी ने वहां मौजूद लालू, नीतीश और अन्य नेताओं के सामने अपनी उस दिन की डांट का कारण स्पष्ट करते हुए कहा, 'हम क्या करें? इसके पिताजी ही आकर कहते थे कि उनका बेटा बिगड़ गया है। लेकिन लोगों ने हमें बताया कि तुम किस तरह काम कर रहे हो। इस तरह की ऊर्जा वाले लोग जब सही दिशा में लगते हैं तो बहुत काम के साबित होते हैं।' शिवानंद तिवारी ने इस संस्मरण का अंत करते हुए लिखा कि यह जेपी की महानता का उनका पहला अनुभव था। वे एक ऐसे विराट व्यक्तित्व के धनी थे कि उनके पास जाने वाला कोई भी साधारण व्यक्ति खुद को महत्वपूर्ण महसूस करने लगता था।
Published on:
21 May 2026 06:17 pm
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