
शेफ गौतम कुमार (फोटो-गौतम कुमार फ़ेसबुक)
बिहार के एक छोटे से शहर जमालपुर के रेलवे ट्रैक, वर्कशॉप और सीमित माहौल से निकलकर एक युवा ने ग्लोबल फूड वर्ल्ड में भारतीय परंपराओं, आयुर्वेद और देसी अनाजों को पहचान दिलाई है। यह कहानी है शेफ गौतम कुमार की, जिन्हें अपने स्कूल के दिनों में हर दिन अपने गांव से सेंट्रल स्कूल जमालपुर तक कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
वह कहते हैं, "मुझे हमेशा अधूरापन महसूस होता था, ऐसा लगता था कि मैं कहीं फिट नहीं बैठता। यह आसान नहीं था, कभी नहीं था।" जमालपुर आमतौर पर ऐसी जगह नहीं है जहां से कोई फाइव-स्टार किचन, प्रीमियम डाइनिंग या इंटरनेशनल डिप्लोमेसी की टेबल तक का सफर शुरू करे, लेकिन यहीं से शुरू हुआ गौतम कुमार का सफर।
गौतम के लिए खाना बनाना खुद को एक्सप्रेस करने का एक तरीका था, लेकिन उस समय यह फैसला आसान नहीं था। किचन में करियर बनाना लड़कों के लिए 'सही' नहीं माना जाता था और खाना बनाने को अक्सर महिलाओं का काम कहकर छोटा समझा जाता था। एक रूढ़िवादी सोच में जो स्थिर नौकरियों और पारंपरिक करियर को महत्व देती थी, शेफ बनना जोखिम और अस्थिरता का दूसरा नाम था। फिर भी, गौतम ने एक अलग रास्ता चुना।
जब गौतम ने बिहार के बाहर प्रोफेशनल किचन में कदम रखा, तो दुनिया बड़ी और कठोर थी। उनके लहजे, उनकी यादों और उनके खाने की संस्कृति की वजह से उन्हें तुरंत 'बिहारी' का टैग मिल गया। कभी मजाक में, कभी ताने के तौर पर और कभी सीधे-सीधे अपमान के रूप में। बड़े होटलों की दुनिया में, बिहारी खाने को 'देहाती' या 'बेसिक' कहकर खारिज कर दिया जाता था। फिट होने के लिए, लंबे समय तक उन्होंने वही पकाया जो उनसे उम्मीद की जाती थी, कॉन्टिनेंटल क्लासिक्स, इंटरनेशनल प्लेटिंग और विदेशी तकनीकें। प्रोफेशनल सफलता उनके रास्ते में आ रही थी, लेकिन अंदरूनी बेचैनी बनी रही। वह अपनी जड़ों को छिपाकर आगे बढ़ रहे थे।
यह बदलाव रातों-रात नहीं हुआ। सालों के अनुभव से धैर्य और आत्मविश्वास आया। गौतम ने भारत के प्रतिष्ठित होटल और हॉस्पिटैलिटी ग्रुप्स शांगरी-ला नई दिल्ली, द इंपीरियल, ग्रैंड हयात दिल्ली, रैडिसन होटल्स, मेफेयर होटल्स एंड रिसॉर्ट्स और एपिक्यूरियन हॉस्पिटैलिटी सर्विसेज के साथ काम किया। बाद में, उन्होंने मोक्ष हिमालय स्पा रिज़ॉर्ट में एग्जीक्यूटिव शेफ के तौर पर काम किया। इन अनुभवों ने उन्हें स्केल, अनुशासन, तकनीक और लीडरशिप दी। इस अनुभव ने उन्हें अपनी असली फूड फिलॉसफी पर लौटने की विश्वसनीयता दी।
नए आत्मविश्वास के साथ, गौतम ने एक ऐसा सवाल उठाया जिसे लग्जरी डाइनिंग स्पेस में किसी ने छूने की हिम्मत नहीं की थी। गौतम कहते हैं, “हमारे पूर्वजों के खाने को कमतर क्यों माना जाता है, जबकि वही खाना पोषण, सस्टेनेबिलिटी और वैज्ञानिक ज्ञान के मामले में बेहतर है?” इस मोड़ पर, उनकी बिहारी जड़ें और भारतीय पहचान एक बोझ नहीं, बल्कि एक संपत्ति बन गईं। बाजरा, देसी अनाज, सात्विक खाना, कम मसालों के साथ स्वाद निकालने की परंपरा और आयुर्वेदिक खाने का ज्ञान उन्हें परिभाषित करने लगा।
2023 में, समीर एस. गोगिया (डायरेक्टर, सॉल्ट कैटरिंग) के साथ काम करते हुए, गौतम ने बड़े इवेंट्स के लिए खाने को पूरी तरह से फिर से परिभाषित करना शुरू किया। जहां पहले इवेंट मेन्यू तेल, क्रीम और भारी पकवानों से भरे होते थे, वहीं गौतम ने समकालीन फाइन-डाइनिंग स्टाइल में सात्विक आयुर्वेदिक खाना पेश किया। यह खाना सादगी के बारे में नहीं था, बल्कि बुद्धिमत्ता के बारे में था, स्वाद, विज्ञान और संतुलन एक ही प्लेट पर एक साथ।
गौतम अपने सिग्नेचर ‘आयुर्वेद छौंका’ को सिर्फ मसालों का आखिरी तड़का नहीं, बल्कि एक औषधीय प्रक्रिया मानते हैं। घी, मसाले, तापमान, बीजों का चटकना और टाइमिंग, सब कुछ प्लानिंग और मकसद के साथ किया जाता है। यहां, स्वाद और स्वास्थ्य विरोधी ताकतें नहीं, बल्कि सहयोगी हैं।
इस फिलॉसफी को 2023 P20 समिट में एक ग्लोबल प्लेटफॉर्म मिला, जब गौतम ने यशोभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और G20 प्रतिनिधियों को बाजरा-आधारित मेन्यू परोसा। उनके लिए, यह पल बहुत पर्सनल भी था। बाजरा, जिसे कभी ‘गरीब आदमी का खाना’ माना जाता था, अब इंटरनेशनल डिप्लोमेसी का हिस्सा बन गया था। यह एक शांत लेकिन बहुत प्रभावशाली जीत थी, जो बिना किसी शोर-शराबे के हासिल की गई।
इसके बाद, गौतम अपनी बाजरे पर आधारित कुजीन को IIFA सिल्वर जुबली (2025, जयपुर) में ले गए, जहां एक ग्लैमरस और ग्लोबल ऑडियंस के सामने पारंपरिक राजस्थानी थाली को एक नए अंदाज में पेश किया गया। उन्होंने देश की कुछ सबसे हाई-प्रोफाइल शादियों में भी अपना सात्विक और आयुर्वेदिक पवेलियन लगाया, मुंबई में अंबानी की शादी और उदयपुर में मंटेना की शादी, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप जूनियर भी शामिल हुए थे। इन इवेंट्स में उनका खाना दिखावटी नहीं था, बल्कि सोच-समझकर बनाया गया था और यही उसकी असली पहचान बन गई।
आज गौतम ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय लग्जरी का भविष्य विदेशी इंपोर्ट में नहीं, बल्कि हमारी अपनी सांस्कृतिक समझ में है। उनके लिए, लग्जरी का मतलब है "अपनी संस्कृति पर भरोसा"। उन्होंने यह भी साबित कर दिया है कि "बिहारी" होना कभी कोई नुकसान नहीं था, लेकिन दुनिया को यह दिखाने के लिए कड़ी मेहनत और समय लगा।
Updated on:
13 Jan 2026 07:38 am
Published on:
13 Jan 2026 07:37 am
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