
नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी (फाइल फोटो )
Bihar Politics समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की राजनीतिक भूमिका पर तीखी टिप्पणी की है। सोशल मीडिया पर लिखे अपने लेख में उन्होंने लालू प्रसाद को व्यक्तिवाद और अहंकार से जोड़ते हुए कहा कि उनकी राजनीति समाजवादी मूल्यों और लोहिया के विचारों के अनुरूप सामाजिक परिवर्तन नहीं कर सकी। तिवारी के अनुसार, नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा में लगातार विरोधाभास देखने को मिला है। उन्होंने लालू यादव के साथ कई बार गठबंधन किया, फिर अलग हुए, ‘संघ मुक्त भारत’ जैसे नारे दिए और बाद में बीजेपी के साथ भी सत्ता साझा की। उन्होंने 2013 के घटनाक्रम का भी उल्लेख किया, जिसमें उनके अनुसार नरेंद्र मोदी को लेकर मतभेद के बाद उन्हें राज्यसभा से दोबारा नामित नहीं किया गया और पार्टी से बाहर कर दिया गया।
मंडल आयोग और आडवाणी जी की गिरफ्तारी के बाद लालू यादव का प्रभाव और आत्मविश्वास काफी बढ़ गया था। 2004 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में समता पार्टी का गठन हुआ। उस समय मैं बिहार नागरिक परिषद का उपाध्यक्ष था। इस पद पर मेरी नियुक्ति लालू यादव ने ही की थी। यह एक मंत्री स्तर का पद था, जिसमें मुझे सरकारी आवास, वाहन और अन्य सभी सुविधाएं प्राप्त थीं, जो एक मंत्री को मिलती हैं। मेरे जीवन का वह दौर ऐसा था, जब पहली बार मुझे आर्थिक दृष्टि से कुछ राहत और स्थिरता का अनुभव हुआ।
हालांकि, मंडल आंदोलन और आडवाणी जी की गिरफ्तारी के बाद लालू यादव को राजनीतिक रूप से काफी शक्ति मिली, लेकिन उस शक्ति का उपयोग वे सामाजिक परिवर्तन के लक्ष्य के लिए नहीं कर सके। डॉ. राममनोहर लोहिया ने जिस समाज की परिकल्पना की थी। जहां पिछड़े वर्गों के जागरण से जाति व्यवस्था की जकड़न टूटे और एक समता आधारित नया समाज बने- उस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी, बल्कि कई मायनों में स्थिति उसके विपरीत दिखाई दी। इसी स्थिति को चुनौती देने के लिए हमने नीतीश कुमार के नेतृत्व में वैकल्पिक राजनीतिक दिशा तैयार करने का प्रयास किया।
नीतीश कुमार तैयार तो हुए, लेकिन इसमें काफी समय लगा। दरअसल, उनमें जोखिम लेने का साहस हमेशा से सीमित रहा है। इस संपूर्ण घटनाक्रम के गवाह ललन सिंह रहे हैं, और सरयू राय भी इससे भली-भांति परिचित हैं। जब हम लोग लालू यादव से अलग हुए, उस समय मैं दिल्ली में था। जिस दिन लालू यादव से अलग होने की घोषणा हुई, उसी दिन पोलो रोड स्थित सरकारी आवास को मेरी अनुपस्थिति में ही खाली करा दिया गया। उस समय मेरे परिवार की स्थिति क्या है, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी।
पटना लौटने पर पता चला कि कुछ मित्रों और समर्थकों ने हमारे परिवार को डॉ. बी. भट्टाचार्य के मकान के पास स्थित एक किराए के दो कमरों के मकान में आश्रय दिलाया था। उस समय नीतीश कुमार लोकसभा सदस्य थे, इसलिए इस राजनीतिक बदलाव का उन पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा। वे संसद सदस्य थे, लेकिन मेरे चार बच्चों वाले परिवार की स्थिति और उनके जीवन-यापन की चिंता किसी ने नहीं की। मुझे यह अनुभव हुआ कि नीतीश कुमार अक्सर यह मानते हैं कि अन्य लोग उनके लिए कार्य करें, लेकिन दूसरों के प्रति उनकी जिम्मेदारी और दायित्व की भावना अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
नीतीश कुमार तैयार तो हुए, लेकिन इसमें काफी समय लगा। दरअसल, उनमें जोखिम लेने का साहस हमेशा सीमित रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के गवाह ललन सिंह रहे हैं और सरयू राय भी इससे भली-भांति परिचित हैं। जब हम लोग लालू यादव से अलग हुए, उस समय मैं दिल्ली में था। जिस दिन लालू यादव से अलग होने की घोषणा हुई, उसी दिन पोलो रोड स्थित सरकारी आवास को मेरी अनुपस्थिति में ही खाली करा दिया गया।
उस समय मेरे परिवार की स्थिति क्या है, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी। पटना लौटने पर पता चला कि कुछ मित्रों और समर्थकों ने हमारे परिवार को डॉ. बी. भट्टाचार्य के मकान के पास स्थित किराए के दो कमरों के मकान में आश्रय दिलाया था। उस समय नीतीश कुमार लोकसभा सदस्य थे, इसलिए इस राजनीतिक बदलाव का उन पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा। वे संसद सदस्य थे, लेकिन मेरे चार बच्चों वाले परिवार की स्थिति और उनके जीवन-यापन की किसी ने कोई चिंता नहीं की। मुझे यह अनुभव हुआ कि नीतीश कुमार अक्सर यह मानते हैं कि अन्य लोग उनके लिए कार्य करें, जबकि दूसरों के प्रति उनकी जिम्मेदारी और दायित्व की भावना अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
उनका बीजेपी से कोई विशेष परहेज नहीं था। उनका मानना था कि यदि भारतीय जनता पार्टी लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में आगे रखकर चुनाव लड़ती है, तो वे उसके साथ रह सकते हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी के नाम को लेकर उनकी स्पष्ट आपत्ति थी। मुझे याद है, और यह बात कई लोगों को भी याद होगी, कि 2013 में मैं राज्यसभा में था। उस समय नीतीश कुमार ने स्वयं मेरे पास आकर मुझे राज्यसभा भेजने का प्रस्ताव दिया था। 2013 में राजगीर में पार्टी का शिविर आयोजित हुआ था।
उसी समय यह लगभग स्पष्ट हो चुका था कि भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाएगी। उस शिविर में मैंने नीतीश कुमार को यह चेतावनी दी थी कि नरेंद्र मोदी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। एक चाय बेचने वाले व्यक्ति का प्रधानमंत्री पद के लिए इतना मजबूत दावेदार बनकर उभरना और वह भी एक पिछड़े वर्ग से होना, राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत था, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मेरी इसी टिप्पणी के बाद न केवल मुझे दोबारा राज्यसभा के लिए नामित नहीं किया गया, बल्कि मुझे पार्टी से भी निकाल दिया गया।
उसके बाद नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा पर नजर डालें तो कई महत्वपूर्ण और विरोधाभासी मोड़ दिखाई देते हैं। वे लालू यादव के साथ दो बार आए और अलग हुए। विधानसभा में उन्होंने ‘संघ मुक्त भारत’ का संकल्प भी व्यक्त किया और ‘इंडिया गठबंधन’ के गठन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सत्ता का संचालन भी किया। सबसे अधिक चर्चा का विषय तब बना जब सार्वजनिक मंच पर उनका नरेंद्र मोदी का पैर छूने का दृश्य सामने आया। यह भी सवाल उठता है कि ललन सिंह या संजय झा जैसे लोग, जो लगातार उनके निकट रहे हैं, इन परिस्थितियों को किस तरह स्वीकार करते हैं।
ऐसे लोग, जो नीतीश कुमार के सहारे राजनीतिक रूप से आगे बढ़े हैं, उनके लिए उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का क्या महत्व रह जाता है। वहीं, जिन लोगों ने नीतीश कुमार को राजनीतिक रूप से स्थापित करने और आगे बढ़ाने में योगदान दिया, वे इस पूरे घटनाक्रम से निराश और असहज महसूस करते हैं। जिस व्यक्ति के जीवन में इतने राजनीतिक उतार-चढ़ाव और अंतर्विरोध रहे हों, उसकी राजनीतिक स्थिरता पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। ललन सिंह और संजय झा जैसे नेता, जो उनके निकट माने जाते हैं, आज उनकी राजनीतिक छत्रछाया में महत्वपूर्ण भूमिकाओं तक पहुंच चुके हैं। कई सामान्य पृष्ठभूमि के लोग भी नीतीश कुमार के प्रभाव से देश की नीति-निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बन गए हैं।
Updated on:
19 Jun 2026 10:41 pm
Published on:
19 Jun 2026 08:45 pm
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