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जहां जंगलों ने सालों तक सच छुपाए रखा, वहां अब खुली विकास की राह… अबूझमाड़ के कोड़ेनार में बनी पहली सड़क

Narayanpur News: पहली बार पहाड़ों को काटकर बनी सड़क सिर्फ पत्थर और मिट्टी की नहीं, बल्कि भय से मुक्ति और भविष्य की उम्मीद की राह बनकर उभरी है। यह वही इलाका है, जहां कभी आम नागरिक की पहुंच लगभग असंभव मानी जाती थी।

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विकास की ओर बढ़ता कोड़ेनार (फोटो सोर्स- पत्रिका)

विकास की ओर बढ़ता कोड़ेनार (फोटो सोर्स- पत्रिका)

CG News: घने जंगलों, ऊंची-ऊंची पहाड़ियों और वर्षों की खामोशी के बीच छिपा है अबूझमाड से करीब 55 किमी दूर बसा गांव कोड़ेनार। यह एक ऐसा नाम, जो कभी नक्सल दहशत का पर्याय रहा। इसी अबूझमाड़ के कोड़ेनार गांव, जहां अब तक विकास की किरणें नहीं पहुंच पाई थीं, आज इतिहास के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।

यहां पहली बार पहाड़ों को काटकर बनी सड़क सिर्फ पत्थर और मिट्टी की नहीं, बल्कि भय से मुक्ति और भविष्य की उम्मीद की राह बनकर उभरी है। यह वही इलाका है, जहां कभी आम नागरिक की पहुंच लगभग असंभव मानी जाती थी। वर्षों तक दुर्गमता नक्सलियों के लिए सुरक्षा कवच बनी रही। लेकिन अब बीएसएफ और स्थानीय पुलिस के संयुक्त अभियान ने तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है।

सड़क और सुरक्षा से जगी विकास की उम्मीद

ग्रामीण मानते हैं कि सड़क और सुरक्षा कैंप सिर्फ शुरुआत हैं। उन्हें उम्मीद है कि अब राशन कार्ड, पेंशन, स्वास्थ्य जांच, स्कूल और रोजगार योजनाएं भी गांव तक पहुंचेंगी। एक बुजुर्ग महिला के शब्दों में- ‘‘अब डर कम हुआ है, शायद हमारे बच्चों का भविष्य बेहतर हो।’’

पहली बार सामने आईं अंदर की तस्वीरें

पत्रिका टीम ने इस दुर्गम और संवेदनशील इलाके से पहली बार एक्सक्लूसिव तस्वीरें सामने लाई हैं। इनमें कुपोषित बच्चे, इलाज के अभाव में जूझती महिलाएं, घास-फूस की झोपडिय़ां और नंगे पांव बच्चे नजर आते हैं। ये तस्वीरें बताती हैं कि आजादी के 75 साल बाद भी कोड़ेनार तक बिजली, पक्की सडक़, स्कूल, आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्र जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाईं।

न आंगनबाड़ी, न स्कूल कई पीढ़ियां अंधेरे में

गांव में न आंगनबाड़ी केंद्र है और न ही प्राथमिक विद्यालय। बच्चों की पढ़ाई का मतलब कई किलोमीटर पैदल चलकर जंगल पार करना है, जो अक्सर संभव नहीं हो पाता। नतीजतन, पीढ़ी दर पीढ़ी अशिक्षा यहां की नियति बन गई है। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है। गंभीर मरीजों को खाट पर लादकर घंटों पैदल ले जाना पड़ता है।

दुर्गमता से मुख्यधारा की ओर

कोड़ेनार तक पहुंचना कभी किसी साहसिक अभियान से कम नहीं था। कच्चे जंगल रास्ते, खड़ी चढ़ाइयां और हर कदम पर नक्सली खतरा- यही गांव की पहचान थी। अब पहाड़ काटकर बनाई गई सड़क ने न केवल दूरी घटाई है, बल्कि दशकों से कटे इस गांव को मुख्यधारा से जोडऩे की नींव रखी है। ग्रामीणों का कहना है कि यह सड़क आजादी के बाद उनका पहला वास्तविक संपर्क मार्ग है। इसी रास्ते से अब स्वास्थ्य सेवाएं, राशन, शिक्षा और प्रशासनिक निगरानी गांव तक पहुंचने की उम्मीद जगी है। सुरक्षा बलों के अनुसार, यह सड़क रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम है।

जंगल ही जीवन का सहारा

कोड़ेनार में रोजगार का कोई स्थायी साधन नहीं है। ग्रामीणों का जीवन पूरी तरह जंगल और वन उपज पर निर्भर है। तेंदूपत्ता, कंद-मूल और अन्य उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में ही उनका दिन निकल जाता है। सरकारी रोजगार योजनाएं अब तक यहां नहीं पहुंच सकीं।

सुरक्षा व जन सुविधा कैंप: भरोसे का संदेश

कोड़ेनार में स्थापित सुरक्षा व जन सुविधा कैंप इस बदलाव का केंद्र बिंदु है। यह कैंप केवल सुरक्षा चौकी नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए भरोसे का प्रतीक बनता जा रहा है। वर्षों तक नक्सल दबाव में जीने को मजबूर ग्रामीण बताते हैं कि पहले नक्सलियों के लिए खाना बनाना, संदेश पहुंचाना और रास्तों की जानकारी देना उनकी मजबूरी थी। विरोध का मतलब जान का खतरा था। कैंप खुलने के बाद नक्सली गतिविधियों में स्पष्ट कमी आई है और गांव का माहौल धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है।