
प्रतीकात्मक तस्वीर | Photo - Gemini AI
China vs India Population : एशिया के ताकतवर देश चीन और भारत हैं। ये दोनों देश जनसंख्या और अर्थव्यवस्था को लेकर भी पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान रखते हैं। चीन ने जनसंख्या और मैन्युफैक्चरिंग के मामले में अपनी पहचान कायम भी कर रखी है। अब चीन बूढ़ा होता जा रहा है और चीन खुद को युवा बनाने के लिए कंडोम और गर्भनिरोधक दवाईयों की कीमत बढ़ाने का काम कर रहा है। जबकि, जनसंख्या के मामले में हम चीन को पीछे छोड़ चुके हैं और भारत हर दिन युवा बनते दिख रहा है। इतना ही नहीं, भारत का दबदबा विश्व की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री, डिजिटलाइजेशन में भी तेजी से बढ़ रहा है। इन सबके बावजूद भी चीनी अंतरराष्ट्रीय सहयोग केंद्र के विश्लेषक केजी माओ चीन को बेस्ट बनाने को लेकर बहस छेड़ दिए हैं।
विश्लेषक केजी माओ का तर्क है कि दुनिया एक ऐसे बदलाव की ओर बढ़ रही है जहां चीन टॉप पर होगा, जबकि अमेरिका और भारत "दूसरे स्थान" के लिए आपस में लड़ेंगे।
केजी माओ के तर्क के बाद दुनियाभर में चर्चा छिड़ी है। ऐसे में आइए, जरा तर्क के साथ आंकड़ों को समझने की कोशिश करते हैं-
साल 2025 चीन के लिए सही नहीं रहा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, 1998 के बाद से अपने पहली बार चीन में वार्षिक गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा चीन में संपत्ति का संकट (Property crisis) अभी भी जारी है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की जानकारी के अनुसार, भारत की वास्तविक GDP FY 2025-26 की Q2 में 8.2% बढ़ी। यह पिछली तिमाही के 7.8% और FY 2024-25 की Q4 के 7.4% से अधिक है। यह सब वैश्विक व्यापार और नीति अनिश्चितताओं के बीच मजबूत घरेलू मांग के कारण संभव हुआ है।
RBI ने FY 2025-26 के लिए भारत की GDP वृद्धि अनुमान को 6.8% से बढ़ाकर 7.3% कर दिया है। भारत की घरेलू वृद्धि निम्नलिखित कारकों के कारण अग्रसर है-
आईएमएफ (International Monetary Fund) के 2026 के अनुमानों के अनुसार, भारत की विकास दर 6.6% रहने की संभावना है, जबकि चीन की विकास दर घटकर 4.8% के आसपास रह सकती है।
वहीं, लगातार 3 सालों से चीन की जनसंख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है। 2026 में चीन ने इस जनसंख्या संकट से बचने के लिए कंडोम व अन्य गर्भनिरोधक दवाईयों पर टैक्स बढ़ा ताकि जनसंख्या को तेजी से बढ़ाया जा सके।
भारत की 65% से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। इसके उलट, चीन की कार्यशील आयु की आबादी (15-64 वर्ष) 2014 में ही अपने चरम पर पहुंच गई थी और तब से लगातार घटती दिख रही है। नए साल 2026 में भी भारत की औसत आयु लगभग 28-29 वर्ष, जबकि चीन की औसत आयु 39 वर्ष को पार करती दिख रही है।
इसका मतलब है कि भारत के पास काम करने वाले युवा हाथ हैं तो वहीं, चीन के पास बुजुर्ग।
दरअसल, बुढ़ापा को "डेमोग्राफिक विंटर" कहा जाता है। इसका देश के विकास पर काफी प्रभाव पड़ता है। देखिए, चीन अकेला नहीं है, दुनिया के कई शक्तिशाली मुल्क "डेमोग्राफिक विंटर" से जूझ रहे हैं और वहां पर बुरा प्रभाव दिख रहा है-
जापान: यहां दुनिया की सबसे अधिक बुजुर्ग आबादी है। यहां वयस्कों के लिए डायपर की बिक्री बच्चों के डायपर से अधिक होती है। यहां की सरकार आबादी बढ़ाने के कई तरह की योजनाएं चलाती आ रही है।
दक्षिण कोरिया: ये दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर (0.7) वाला देश है।
कई यूरोपीय देश: इटली, जर्मनी और स्पेन जैसे देशों में कार्यबल की भारी कमी है और वे प्रवासन (Migration) पर निर्भर हो चुके हैं।
रूस: यहां भी जन्म दर में भारी गिरावट देखी जा रही है, जो भविष्य के लिए एक आर्थिक संकट की ओर इशारा करता है।
अगर आप, इसके उलट भारत की तस्वीर देखें तो भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) लगभग 2.0 के करीब है, ये (2023-24 में 1.9) थी, जबकि चीन की दर लगभग 1.0 है। हालांकि, भारत में भी जन्मदर घट रहा लेकिन रफ्तार कम है। इस मामले में चीन का ग्राफ तेजी से नीचे गिरता जा रहा है।
गिरते जन्मदर का देश के विकास पर प्रभाव पड़ता है। मुख्य कारणों में से ये एक कारक है जिससे भारत का उत्थान हो रहा है और चीन का इस मामले में पिछड़ता जा रहा है। भारत की मध्य आयु (Median Age) मात्र 28-29 वर्ष है। इसके क्या फायदे हैं देखिए-
भारत की 65% आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है, जो उसे अगले दो दशकों तक दुनिया का 'वर्कफोर्स इंजन' बनाए रख सकती है। हालांकि, ये बात युवा ताकत के इस्तेमाल पर भी निर्भर करती है।
मैन्युफैक्चरिंग के मामले में भारत अब चीन के कैसे मात देते जा रहा है। इसको देख सकते हैं।विश्व की दिग्गज कंपनियां जैसे एप्पल (Apple) और टेस्ला (Tesla) अब अपनी सप्लाई चेन को चीन से हटाकर भारत ला रहे हैं। साथ ही मेक इन इंडिया (Make in India) और पीएलआई (PLI) योजनाओं ने भारत को मोबाइल फोन का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता और रक्षा निर्यातक बना दिया है।
साथ ही भारत पहले से ही दुनिया का 'Back Office' रहा है, लेकिन अब भारत फिनटेक (जैसे UPI) के माध्यम से डिजिटल इकोनॉमी का नेतृत्व करते नजर आ रहा है। कई देशों में यूपीआई का दायरा भी बढ़ाने का काम हुआ है।
इस तरह भारत हरे निशान के साथ बढ़ रहा है। जबकि, चीन का लाल निशान चीन के लिए खतरे की घंटी बनते जा रहा है। ऐसे में केजी माओ का तर्क उलटा पड़ता दिखता है।
Published on:
04 Jan 2026 09:00 am
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