
Botswana Cheetah in MP: (photo: patrika.com Creation)
Botswana Cheetah in MP: भारत में चीता लौटना सिर्फ एक वन्यजीव परियोजना नहीं, बल्कि एक भावनात्मक सपना है। एक ऐसी प्रजाति, जिसे सैकड़ों साल पहले हमने खो दिया था, आज फिर हमारी धरती पर सांस ले रही है। लेकिन जैसे-जैसे Botswana से 8 नए चीतों को लाने की तैयारी तेज होती जा रही हैं, वैसे-वैसे एक सवाल और गहराता जा रहा है, क्या हम सिर्फ चीते ला रहे हैं, या उनके जीने की पूरी तैयारी भी कर चुके हैं?
Project Cheetah के तहत आज भारत में करीब 34 वयस्क और शावक चीते मौजूद हैं। यह संख्या सिर्फ अफ्रीका से लाए गए चीतों की नहीं है, बल्कि इसमें भारतीय धरती पर जन्मे शावक भी शामिल हैं। कुनो नेशनल पार्क में मादाओं ने शावकों को जन्म दिया, कुछ शावक जीवित भी रहे और यही इस परियोजना की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है। यह संकेत है कि भारत का पर्यावरण चीते को पूरी तरह न सही, लेकिन स्वीकार कर रहा है। यही वजह है कि सरकार अब दूसरे चरण में नए चीते लाने की तैयारी कर रही है।
मध्य प्रदेश में चीते के लिए फिलहाल तीन ठिकाने तय किए गए हैं, भविष्य में 7 स्थानों पर चीतों को बसाया जाएगा। इनमें से दो घरों में चीता बसाये जा चुके हैं और एक अभी तैयार नहीं है। गांधी सागर अभयारण्य जहां कुनो के बाद चीतों का दूसरा घर है, वहीं रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व (नौरादेही) को तीसरे घर के रूप में तैयार किया जाना है। फिलहाल ये अभी पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाया है। दो घरों में रह रहे चीते बाड़ों में हैं। कुनो और गांधी सागर अभयारण्य के जंगलों में बने इन बाड़ों का कोई कोना या अन्य कोई स्थान अब तक ऐसा नहीं है, जिसे इन चीतों ने अपना सुरक्षित ठिकाना या अपना घर बनाया हो। ये बात हैरान करती है।
कुनो नेशनल पार्क में रखे गए साउथ अफ्रीका से लाए गए चीते हैं। इसका क्षेत्रफल लगभग 748 वर्ग किलोमीटर है। यहां सबसे ज्यादा चीते हैं और यहीं से सबसे ज्यादा सवाल भी उठे हैं।
नौरादेही अभयारण्य करीब 1197 वर्ग किलोमीटर में बसा है। जिसे भविष्य का सबसे बड़ा चीता घर बनाने की योजना है, लेकिन अभी यह पूरी तरह तैयार नहीं है।
बहरहाल, कागज पर संतुलित से नजर आने वाले प्रोजेक्ट चीता की जमीनी हकीकत ये है कि चीता एक ऐसा शिकारी है जिसे खुला, फैला हुआ घास का मैदान चाहिए, जहां वह दौड़ सके, शिकार को तलाशता मीलों दूर जा सके और इंसानों से दूरी बना सके। एक्सपर्ट कहते हैं कि एमपी के जंगलों का क्षेत्र इनके लिए सीमित है और इन्हें विकसित करने का काम चीतों के आगमन के तीन साल बाद भी शुरू भी नहीं हो सका है।
चीता घने जंगल का नहीं, grassland और open forest का जानवर है। कुनो और गांधी सागर में घास के मैदान हैं, लेकिन सवाल यह है कि, क्या वहां पर्याप्त शिकार उपलब्ध है? क्या इतने चीतों का दबाव शिकार प्रजातियों पर संतुलित रहेगा? और अगर शिकार कम हुआ है, तो चीते फिर किस ओर जाएंगे?
ये सवाल ही बड़ा है क्यों कि भोजन की कम उपलब्धता बड़ा कारण है जिसकी वजह से पिछले महीनों में कुछ चीते जंगल छोड़कर बाहर निकल गए, कुछ राजस्थान की सीमा तक पहुंच गए। कुछ मामलों में मानव-चीता संघर्ष की घटनाएं भी सामने आईं। यह साफ संकेत है कि या तो जंगल सीमित है और उनका विस्तार किया जाना जरूरी है या फिर चीते को वह आजादी नहीं मिल पा रही, जिसकी उन्हें जरूरत है।
बता दें कि शुरुआत में चीते खुले जंगल में छोड़े गए थे, लेकिन मौतों के बाद रणनीति बदली गई। अब ज्यादातर चीते अपने बाड़ों (Enclosures) में रखे जा रहे हैं। वहीं दक्षिण अफ्रीका से आए विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि, लंबे समय तक बाड़ों में रखने से चीते का स्वभाव बदल सकता है। वह शिकार करना भूल सकता है, इंसानों का आदी हो सकता है और जंगल में खुद को बचाने में कमजोर पड़ सकता है। जबकि सरकार इसे सॉफ्ट रिलीज मानती है, लेकिन ऐसे में सवाल यह भी है कि Botswana से आने वाले नए चीते भी क्या इसी सीमित आजादी में रह सकेंगे?
पिछली बार लाए गए चीतों में कुछ वयस्क चीतों और शावकों की मौतें हुईं। कोई संक्रमण से मरा, तो कोई चीता भीषण गर्मी नहीं झेल पाया, कभी किसी चीते की जान आपसी संघर्ष में चली गई। इन मौतों ने प्रोजेक्ट को कई सवालों के बीच ला खड़ा किया। क्या हम समय रहते खतरे पहचान पाएंगे? क्या अब सिस्टम बदला है?
Botswana से आने वाले 8 नए चीते सिर्फ संख्या नहीं बढ़ाएंगे, वे दबाव भी बढ़ाएंगे, जंगल पर दबाव, शिकार पर दबाव, मेडिकल सिस्टम पर दबाव और सबसे बड़ा दबाव होगा प्रबंधन पर। दरअसल एक्सपर्ट वाचर का कहना है कि कुनो के जंगलों में जन्मीं मादा चीतों के साथ बंदी में पैदा हुए चीतों के लिए यह और भी मुश्किल है और बिना किसी शिक्षक के जंगल में छोड़े गए बाड़े में रहने वाले चीतों के लिए अनुकूलन और जीवित रहना संभव नहीं होगा।
वाचर के मुताबिक चीता को जितना ज्यादा समय तक बंदी में रखा जाएगा उसके लिए उतनी ही मुश्किलें बढ़ जाएंगी। वह शिकार करना भूल जाएगा। अपनी संचार प्रणाली शुरू करने में उसे दिक्कतें आएंगी। सबसे बड़ा खतरा ये कि उसका वजन बढ़ जाएगा और मांसपेशियां कमजोर हो जाएंगी। इसके बाद वह जंगल में जाने लायक नहीं रहेगा।
वैसे भी भारतीय परिस्थितियों में चीता को लेकर एक अन्य जतिलता ये भी है कि उसे उपमहाद्वीप के मौजूदा पारिस्थितिकीय तंत्र में तेंदुओं और बाघों का सामना करना पड़ता है, इसके लिए वह बाडो़ं में तैयार नहीं हो पाएगा।
चीतों के जंगल से बाहर आने की बात पर RTI एक्टिविस्ट अजय दुबे कहते हैं कि चीतों के भोजन की व्यवस्था करने के लिए एमपी के जंगलों में घूमने वाले हिरणों (चीतल) को कूनो में लाया गया है। उन्हें यहां भोजन की तलाश की जरूरत नहीं पड़ती, किसी भूखे शिकारी की तरह नहीं बल्कि वे यहां बाड़ों में उनके लिए रखे गए चीतलों का आसानी से शिकार करते हैं और पेट भरते हैं। दुबे का कहना है कि हमारी सरकार इनके भोजन के लिए दूसरे राज्यों पर भी निर्भर हो रही है। जबकि बड़ा सवाल ये है कि हमारे यहां इतनी बड़ी संख्या में चीतल हैं, तो उनकी संख्या क्यों नहीं बढ़ रही। कब तक हम दूसरे राज्यों से मांगने का अवसर ढूंढ़ते रहेंगे। दुबे का कहना है कि भोजन की कमी बड़ा कारण है जो चीतों को जंगलों से बाहर आने को मजबूर कर देते हैं।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि प्रोजेक्ट चीता की तैयारी 2020 से लगातार की जा रही थी, लेकिन पांच साल बाद भी चीतों के रहने के लिए पर्याप्त ग्रासलैंड विकसित नहीं किए गए। अभी और चीते आएंगे तो ऐसे में मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।
हालांकि उन्होंने बोत्सवाना से लाए जाने वाले चीतों के स्वागत की बात कही। लेकिन उन्होंने पिछले अनुभवों से सीखने और पर्याप्त सुविधाओं के साथ उनका स्वागत करने की नसीहत भी सरकार को दी है।
कहना होगा...Project Cheetah भारत का सपना है, लेकिन सपना तभी सच बनता है जब तैयारी पूरी हो। शावकों का जन्म उम्मीद देता है, लेकिन पिछली मौतें चेतावनी भी देकर गई हैं। ऐसे में Botswana से नए चीते लाने से पहले हमें खुद से पूछना होगा हम कितने तैयार…?
Updated on:
05 Jan 2026 04:32 pm
Published on:
04 Jan 2026 06:00 am
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