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इंदिरा गांधी का ‘छिंदवाड़ा प्रयोग’, एक नेता, एक परिवार से बढ़कर कमलनाथ पर भरोसे की कहानी, क्या आपने सुनी है?

MP News: मध्य प्रदेश की एकमात्र सीट है 'छिंदवाड़ा', जहां आज भी वहां के नेता को नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी की विरासत 'भरोसे को' वोट मिलता है, जो उन्होंने एक युवा छात्र नेता कमलनाथ को अपनी पारखी नजर से देखकर लिखी थी। 18 नवंबर को कमलनाथ और 19 नवंबर को इंदिरा गांधी का जन्मदिन है, इस मौके पर आप भी पढ़िए इंदिरा गांधी की राजनीतिक रणनीति और कमलनाथ पर भरोसे की कहानी पर संजना कुमार की रिपोर्ट...

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MP News Indira Gandhi With Kamalnath Untold Story

MP News Indira Gandhi With Kamalnath Untold Story(फोटो: सोशल मीडिया)

MP News: मध्य प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में एक कहावत अक्सर कही-सुनी जाती है, छिंदवाड़ा की मिट्टी कांग्रेस की नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी की देन है।' यह कहावत एक मजाकिया पंक्ति नहीं है, इससे इतर एक राजनीतिक भावना है, जिसकी वजह 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के एक बेहद शांत लेकिन रणनीतिक निर्णय में छिपी थी। कहा जाता है कि कांग्रेस के दिग्गज नेता और एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को इंदिरा गांधी ने छिंदवाड़ा तोहफे में दिया था। अब सवाल उठता है कि क्या यह सच है कि ये केवल तोहफा था? आज 18 नवंबर को जहां कमलनाथ का जन्मदिन है, तो 19 नवंबर को इंदिरा गांधी का, इस मौके पर ये कहानी एक बार फिर चर्चा में है, आप भी पढ़ें इंदिरा गांधी की राजनीतिक रणनीति और कमलनाथ पर भरोसे की अनकही कहानी...

तोहफे में दिया एक राजनीतिक घर, जिसकी नींव उन्होंने खुद रखी

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी सीट को एक तोहफा कहना तकनीकी लिहाज से गलत होगा, लेकिन दिल और भरोसे की बात आते ही 'तोहफा' की भाषा का प्रयोग सही लगता है। इंदिरा गांधी ने कमलनाथ को केवल छिंदवाड़ा से सांसद का टिकट नहीं दिया, बल्कि उन्होंने उन्हें एक ऐसा राजनीतिक घर दिया जिसकी नींव उन्होंने खुद रखी थी, जिसपर भरोसे की इमारत आज भी वैसी ही खड़ी है। ये भरोसा ही था कि इंदिरा गांधी को इतने बड़े देश में एक युवा छात्र नेता ही ऐसा लगा जिसे उन्होंने पूरा संसदीय इलाका सौंप दिया।

हमारा लड़का है ये, यहां दिखा इंदिरा गांधी का पर्सनल इमोशनल लॉजिक

कमलनाथ और संजय गांधी दून स्कूल में एक साथ पढ़ा करते थे। वहीं से दोनों की दोस्ती की शुरुआत हुई। इमरजेंसी के बाद जब संजय गांधी को जेल भेजा जा रहा था, तब कमलनाथ जज से भिड़ गए थे, तब उन्हें भी जेल भेज दिया गया था। कहा जाता है कि यहीं से दोनों की दोस्ती गहरी हुई। कमलनाथ और संजय गांधी की दोस्ती का जिक्र किसी किताब या सोशल मीडिया पर सिर्फ एक लाइन में लिखा मिलता है, लेकिन उनकी दोस्ती के राजनीतिक असर का अनुमान भारत के कम ही राज्यों में नजर आता है। मध्य प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण बना।

दरअसल इंदिरा गांधी को एहसास था कि उनके बेटे संजय का ग्रुप आक्रामक है, लेकिन उन्हें ऐसे चेहरे की तलाश थी, जो प्रशासन को गहराई से समझता हो, एक ऐसा चेहरा जो जमीन पर टिका रहे, जनता से सीधा संवाद स्थापित कर सके। उनकी यह तलाश को कमलनाथ पर आकर खत्म हो गई।

इंदिरा गांधी ने कमलनाथ को पहचाना और कमलनाथ को दी बड़ी जिम्मेदारी

एक छात्र नेता के रूप में इंदिरा गांधी ने कमलनाथ को पहचाना। कहा जाता है कि उन्हें कमलाथ में दृढ़ता नजर आई, जमीन पकड़कर चलने की शैली, साथ ही उनका हर काम बिना किसी शोर-शराबे के पूरा करने का तरीका और उस पर जवाबदेही बनाए रखने का अंदाज इंदिरा गांधी ने बखूबी पहचाना।

जब संजय गांधी ने इंदिरा गांधी की पसंद को जाना तो तारीफ करते हुए कहा था, 'ये काम कर लेगा।' तब इंदिरा गांधी का जवाब था.. 'तो इसे करना ही चाहिए।' ये वही पल थे जिसे बाद इंदिरा गांधी ने कमलनाथ के लिए देश की राजनीति के लिए एक बड़ी राह खोल दी थी।

इंदिरा गांधी का MP Mission, जब कांग्रेस को जरूरत थी एक क्लीन पॉकेट की

70 के दशक में एमपी कांग्रेस में एक नहीं बल्कि कई गुट एक्टिव थे। विदर्भ का प्रभाव, मालवा गुट, बुंदेलखंड कूटनीति और महाकौशल की अपनी राजनीति का दौर था। इंदिरा गांधी चाहती थीं कि एक ऐसी प्योर अनमंटैमिनेटेड सीट बने जहां दिल्ली की आवाज सीधी सुनी जाए, एक भरोसेमंद चेहरा लगातार जमा रहे, केंद्र-राज्य के बीच एक राजनीतिक पुल का निर्माण किया जा सके और ये वही केंद्र था 'छिंदवाड़ा।'

छिंदवाड़ा बना इंदिरा गांधी की राजनीतिक लैब का महत्वपूर्ण मॉडल

इंदिरा गांधी ने इस सीट को सिर्फ एक चुनावी क्षेत्र की तरह कभी नहीं देखा, उन्होंने इसे अपनी राजनीति की प्रयोगशाला समझा। जहां उस समय आर्थिक पिछड़ापन था, आदिवासी आबादी थी, किसान और कोयला बेल्ट ने इसे और भी महत्वपूर्ण बनाया, स्थानीय लोगों की छोटी-छोटी उम्मीदें, आकांक्षाएं और इससे भी अहम था कमलनाथ का स्थायी नेता न होना। इंदिरा समझ गई थीं कि यही वो क्षेत्र है, जहां से कोई नई पौध लगाई जा सकती है। इंदिरा गांधी इस सीट को कमलनाथ के नेतृत्व की परीक्षा मानकर आगे बढ़ीं। जानकारी यह भी मिलती है कि उस समय कमलनाथ को बुलाकर इंदिरा गांधी ने कहा था- छिंदवाड़ा संभाल लोगे? यह केवल प्रश्नभर नहीं था, बल्कि एक आदेश था और एक भरोसा भी।

इंदिरा गांधी की सख्त और कड़ी शर्तें

यह कहानी भी अक्सर राजनीतिक गलियारों में कही और सुनी जाती है कि इंदिरा गांधी ने कमलनाथ को छिंदवाड़ा उपहार में दिया। लेकिन इस गिफ्ट के तीन बड़े भारी नियम थे, जिनका कमलनाथ ने बखूबी पालन किया। इन्हें ऐसे समझें

-1-छिंदवाड़ा हमेशा सुना हुआ महसूस होना चाहिए

इंदिरा गांधी अक्सर इस बात पर जोर देती थीं कि कभी कोई ये न कहे कि दिल्ली दूर है। कमलनाथ ने यही किया। सड़क, स्कूल, रोजगार सभी मूलभूत आवश्यकताएं उन्हीं वर्षों में एक-एक करके शुरू होने लगे।

-2-व्यक्ति नहीं, सीट बड़ी होनी चाहिए

इंदिरा गांधी चाहती थीं कि कोई नेता अपना निजी साम्राज्य न बनाए। कमलनाथ ने वही किया, संगठन, जिला प्रशासन, पंचायत सभी को समान महत्व देते हुए काम किया।

-3- छिंदवाड़ा जीत का मैदान नहीं, कांग्रेस का मॉडल बने

कमलनाथ की राजनीति में जो स्थिरता थी, उसकी नींव इंदिरा गांधी की इस सोच में भी नजर आती है। कमलनाथ ने इंदिरा गांधी की नींव पर चलकर कांग्रेस की इमारत खड़ी की, जिसकी चमक आज भी बरकरार है।

इंदिरा गांधी की भविष्यवाणी जो सच हो गई…

जानकारी मिलती है कि 1980 के बाद एक मीटिंग में इंदिरा गांधी ने मजाक जरूर किया था, लेकिन उनके इस मजाक में आत्मविश्वास की ऐसी झलक थी कि ये मजाक आगे चलकर सच साबित हुआ। दरअसल उनकी कही ये पंक्ति आज भी दोहराई जाती है कि जब उन्होंने कहा था, 'कमलनाथ की सीट कोई नहीं ले सकता।'

आज बरसों बाद भी यह बात सच ही बनी हुई है। एक बार के अलावा कमलनाथ लगातार छिंदवाड़ा से सांसद रहे। आज विधायक हैं। जनता के बीच कमलनाथ जी का संबोधन आज भी आप सुन सकते हैं। और कमलनाथ कहने पर जबान संभालकर बात करने कि हिदायत भी। छिंदवाड़ा का हर परिवार उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानकर उतना ही प्रेम और सम्मान उन्हें आज भी देता है। एमपी का ऐसा कोई दूसरा नेता नहीं हुआ जिसके लिए एक जिले के लोग इतनी मजबूती से उसका नाम लेकर खड़े रहते हैं। यह इंदिरा गांधी की ही पारखी नजरें थीं, जिन्होंने एक भरोसे के बल पर राजनीतिक रणनीति की पूरी कहानी अंत तक लिख दी।

जब इंदिरा गांधी ने कहा था 'छिंदवाड़ा मेरा रिपोर्ट कार्ड'

इस बात का जिक्र बहुत ही कम जगह मिलता है कि इंदिरा गांधी अक्सर ये लाइन कहा करती थीं कि 'छिंदवाड़ा मेरा रिपोर्ट कार्ड है।' 'छिंदवाड़ा में काम हुआ या नहीं, यह मेरे लिए गैज( एक मापक यंत्र, किसी चीज को नापने, आंकने या भांपने की क्रिया) है।' दरअसल एमपी में केंद्र की योजनाओं का प्रभाव सबसे पहले छिंदवाड़ा में ही दिखाई देता था। क्योंकि वहां कमलनाथ यानि एक सांसद-नेता-संगठन तीनों मिलकर एक सीधे मॉडल के रूप में काम करते थे। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी इसकी रिपोर्ट सीधे कमलनाथ से ही मांगती थीं।

इंदिरा गांधी और स्थिरता की राजनीतिक संस्कृति

किसी भी नेता को जीत दिलाना बड़ी बात नहीं होगी। लेकिन किसी इलाके को स्थायी नेतृत्व देना और उसे एक स्थिर राजनीतिक संस्कृति देना इंदिरा गांधी के इस फैसले की असली ताकत असल मायनों में यही है। और इसकी शुरुआत इंदिरा गांधी की इस चुपचाप दी गई मंजूरी से होती है, जिसका प्रभाव आज तक छिंदवाड़ा में हर कोई देखता है।

एमपी की एक मात्र सीट, जहां आज भी नेता को नहीं इंदिरा की विरासत को वोट

ऐसे में कहना होगा कि छिंदवाड़ा सीट कमलनाथ को दिया गया महज एक तोहफा भर नहीं था, बल्कि इंदिरा गांधी का 'ट्रस्ट ट्रांसफर' थी। इंदिरा गांधी ने अनुशासन, जमीन से जुड़े रहने का और जनता की भाषा समझने का ताला खुद लॉक किया, लेकिन उसकी चाबी कमलनाथ को सौंप दी थी। अब जब लोग कहते हैं कि इंदिरा गांधी ने कमलनाथ को छिंदवाड़ा गिफ्ट किया था, तो असल में इसका अर्थ यही है कि उन्होंने भरोसे की राजनीतिक विरासत कमलनाथ को सौंपी थी। एमपी की एक मात्र सीट 'छिंदवाड़ा' जहां आज भी वोट सिर्फ नेता को नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी की विरासत को मिलता है, जो उन्होंने एक युवा नेता कमलनाथ पर जताए भरोसे के पन्नों पर लिख दी थी।


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