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ब्रिटिश हुकूमत के लिए खौफ का नाम थे मिर्जापुर के सैठोले कोल, गांव में पैर रखने से भी डरते थे अंग्रेज

सैठोले कोल पूर्वांचल के इकलौते आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी, जिनके गांव में घुसने से पहले अंग्रेज सौ बार सोचते थे। 1939 में लालगंज में नेताजी की जनसभा में मिला सम्मान।

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प्रतीकात्मक तस्वीर: PC: AI

"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…" आज भी यह पंक्तियां मिर्जापुर के लालगंज थाने में लगे अशोक स्तंभ पर अंकित उन स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियों में गूंजती हैं, जिन्होंने सिर पर कफन बांधकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी। इन्हीं में से एक थे मिर्जापुर के आदिवासी नेता सैठोले कोल, जिनका नाम सुनते ही अंग्रेज थर्रा उठते थे।

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोला

बचपन से ही उनके मन में विद्रोह की चिंगारी धधक रही थी। उन्होंने आदिवासी समाज को संगठित कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोला। लालगंज के महुलरिया गांव में हजारों आदिवासियों की सभा बुलाकर उन्होंने अंग्रेजी राज को ललकारा। गांव-गांव घूमकर गुपचुप तरीके से आजादी का अलख जगाते रहे। नतीजा यह हुआ कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

जेल जाने के बाद भी नहीं टूटा जज्बा

जेल से रिहा होने के बाद भी उनका जुनून कम नहीं हुआ। जंगलों में आदिवासियों को इकट्ठा कर उन्होंने फिर अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका। अंग्रेजी पुलिस बौखलाई और बार-बार छापेमारी की कोशिशें कीं, लेकिन सैठोले कोल के गांव में पैर रखने से पहले वे सौ बार सोचते थे। पूर्वांचल के इकलौते आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनका नाम आज भी गौरव से लिया जाता है।

नेताजी बोस ने किया था सम्मानित

लालगंज के पतुलखी के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिव मूर्ति दुबे के आग्रह पर ट्रेन से 1939 में कोलकाता से मिर्जापुर पहुंचे। लालगंज में बापू उपरौंध इंटर कॉलेज के सामने आयोजित विशाल जनसभा में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सैठोले कोल को सम्मानित किया। यह पल पूरे इलाके के लिए गर्व का क्षण था।

सैठोले का नाम आज भी लालगंज थाने के अशोक स्तंभ पर

सैठोले कोल का नाम आज भी लालगंज थाने के अशोक स्तंभ पर अन्य महान सेनानियों रविनंदन दुबे, केदारनाथ तिवारी, शिवधारी पांडेय और केदारनाथ मालवीय के साथ अंकित है। 4 जुलाई 1975 को इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने अंतिम सांस ली, लेकिन उनका अदम्य साहस और देशभक्ति की गाथा आज भी पीढ़ियों को प्रेरित करती है।