2 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

8 लाख रुपये तक ग्रॉस सैलरी भी आएगी आयकर के दायरे में, जान लें क्या फायदे पहुंचा सकते हैं बड़ा नुकसान

कर्मचारियों को मिलने वाले पर्क्स के टैक्सेशन को लेकर असमंजस था। आयकर विभाग और कंपनियों के बीच इस बात को लेकर उलझन अब सॉल्व हो गई हैै।

3 min read
Google source verification

भारत

image

Ashish Deep

Aug 22, 2025

Advisory issued regarding salaries for female employees in MP

Advisory issued regarding salaries for female employees in MP (फोटो : फ्री पिक)

अगर आपकी सालाना इनकम 4 लाख रुपये से ऊपर है तो आपके लिए खतरे की घंटी बज सकती है। इनकम टैक्स विभाग ने दो नए रूल बनाए हैं, जिनके तहत कर्मचारियों को कंपनी से मिलने वाले Perquisites यानी नॉन-कैश बेनिफिट्स अब टैक्सेबल होंगे। यानी उन पर भी टैक्स देना होगा। इनमें कंपनी की कार, मकान, फर्नीचर, ड्राइवर, हाउसिंग, क्लब मेंबरशिप, फ्री या कंसेशनल शेयर जैसे कई फायदे शामिल होते हैं। लंबे समय से इन पर्क्स के टैक्सेशन को लेकर असमंजस था। आयकर विभाग और कंपनियों के बीच इस बात को लेकर उलझन थी कि आखिर किस इनकम लेवल से ऊपर इन बेनिफिट्स को टैक्सेबल माना जाए। अब सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (CBDT) ने इस उलझन को दूर कर दिया है।

पहले क्या थी इनकम टैक्स की व्यवस्था?

अब तक धारा 17(2)(iii) के तहत सैलरी के साथ मिलने वाले पर्क्स की वैल्यू टैक्सेबल इनकम में जोड़ी जाती थी, लेकिन इसमें एक शर्त थी, अगर कर्मचारी की सैलरी (बिना पर्क्स गिने) 50,000 रुपये से ज्यादा हो तब ही टैक्सेबल माना जाएगा। यह सीमा आज से लगभग 60 साल पहले तय की गई थी। उस समय 50,000 रुपये सालाना सैलरी काफी बड़ी रकम मानी जाती थी। मगर महंगाई और बढ़ते सैलरी लेवल को देखते हुए यह प्रावधान अप्रासंगिक हो चुका है। कंपनियां और टैक्स एक्सपर्ट्स बार-बार कहते रहे हैं कि इस नियम में क्लैरिटी होनी चाहिए।

अब क्या किया गया है?

CBDT ने 18 अगस्त 2025 को नोटिफिकेशन जारी कर आयकर नियम 1962 में दो नए नियम जोड़े हैं Rule 3C और Rule 3D।

Rule 3C : अब पर्क्स को टैक्सेबल मानने के लिए सैलरी इनकम की नई सीमा 4 लाख रुपये तय की गई है। यानी अगर किसी कर्मचारी की सालाना सैलरी 4 लाख रुपये से अधिक है तो उसे मिलने वाले पर्क्स की वैल्यू भी टैक्सेबल होगी।

Rule 3D : इसके तहत ग्रॉस टोटल इनकम की सीमा 8 लाख रुपये तय की गई है। अगर किसी कर्मचारी की कुल इनकम 8 लाख रुपये से ज्यादा है और उसे एम्प्लॉयर द्वारा इक्विटी शेयर या कोई प्रतिभूति दी गई हैं तो उनकी वैल्यू भी टैक्सेबल इनकम में जुड़ जाएगी। इन नए नियमों के लागू होने से अब साफ हो गया है कि पर्क्स को केवल हाई-इनकम कर्मचारियों तक सीमित नहीं रखा जाएगा। मिड-लेवल इनकम वाले भी टैक्स के दायरे में आएंगे।

किस इनकम वाले पर असर पड़ेगा?

सबसे ज्यादा असर उन कर्मचारियों पर होगा जिनकी सालाना सैलरी 4 लाख रुपये से ऊपर है और उन्हें कंपनी की ओर से कार, मकान, ड्राइवर या हाउसिंग पर्क्स मिलते हैं। जैसे ही आपकी सैलरी 4 लाख रुपये पार करेगी, पर्क्स की वैल्यू आपकी टैक्सेबल इनकम में जुड़ जाएगी। इसके अलावा, जिन कर्मचारियों की ग्रॉस इनकम 8 लाख रुपये से ऊपर है और उन्हें कंपनी की ओर से शेयर या स्वेट इक्विटी मिलते हैं, उन्हें भी अतिरिक्त टैक्स देना होगा। टेक कंपनियों और स्टार्टअप्स में कर्मचारियों को अक्सर ESOPs (Employee Stock Option Plans) या इक्विटी शेयर दिए जाते हैं। अब यह फायदा पूरी तरह टैक्स के दायरे में आएगा।

सर्विस क्लास की जेब कितनी कटेगी?

निवेश एक्सपर्ट अमित निगम के मुताबिक कर्मचारी की असली ‘वाट’ यहां से लगना शुरू होती है। CBDT ने केवल सीमा तय की है, लेकिन टैक्स दर वही लागू होगी जो आपका टैक्स स्लैब रेट है। इसका मतलब यह है कि पर्क्स की वैल्यू आपकी सैलरी में जुड़कर आपको ऊंचे स्लैब में धकेल सकती है।

उदाहरण 1: राहुल की सैलरी 5 लाख रुपये सालाना है
कंपनी पर्क्स (कार + मकान) = 2 लाख रुपये
कुल इनकम हो गई = 7 लाख रुपये

नई टैक्स दर के मुताबिक कैलकुलेशन :
3 लाख रुपये तक – टैक्स फ्री
3–6 लाख रुपये पर 5% = 15,000 रुपये
बाकी 1 लाख रुपये (6-7 लाख रुपये) पर 10% = 10,000 रुपये
कुल टैक्स = 25,000 रुपये (+सेस)

अगर पर्क्स न होते तो राहुल की इनकम 5 लाख रुपये रहती और टैक्स केवल 10,000 रुपये के करीब आता। यानी पर्क्स जुड़ने से टैक्स लगभग ढाई गुना बढ़ गया।

उदाहरण 2: नेहा की सैलरी = 9 लाख रुपये
कंपनी शेयर का फायदा = 1.5 लाख रुपये
कुल इनकम = 10.5 लाख रुपये

नई टैक्स रेजीम में टैक्स कैलकुलेशन :
3 लाख रुपये तक आय टैक्स फ्री है
3–7 लाख रुपये (4 लाख रुपये) पर 5% = 20,000 रुपये
7–10.5 लाख रुपये (3.5 लाख रुपये) पर 10% = 35,000 रुपये
कुल टैक्स = 55,000 रुपये (+सेस) यानी शेयर मिलने से नेहा का टैक्स सीधे 15,000 रुपये बढ़ गया।

अब कैसे होगा टैक्स का कैलकुलेशन?

निगम के मुताबिक इन बदलावों से सरकार का मकसद साफ है कि वह टैक्स बेस बढ़ाना और हाई-इनकम कर्मचारियों के लिए बेनिफिट्स को पारदर्शी बनाना चाहती है। अब तक बहुत से लोग पर्क्स का मजा टैक्स दिए बिना ले रहे थे। कंपनियों के लिए भी यह साफ था कि किस स्तर की सैलरी पर कौन-से पर्क्स टैक्सेबल माने जाएं। नई लिमिट्स से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।