
भारत के जांबाज जवान शहीद अब्दुल हमीद का योगदान अतुलनीय है। ( फोटो: AI)
भारत के सैन्य इतिहास में 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध कई निर्णायक लड़ाइयों के लिए याद किया जाता है। इन्हीं में से एक थी पंजाब के खेमकरण क्षेत्र में लड़ी गई असल उत्तर की लड़ाई, जहां भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान के बड़े बख्तरबंद हमले का डटकर मुकाबला किया। इसी युद्धभूमि में कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद ने असाधारण साहस दिखाया। दुश्मन के शक्तिशाली पैटन टैंकों के सामने उन्होंने अपनी एंटी-टैंक गन के साथ मोर्चा संभाला और आखिरी सांस तक लड़ते हुए वीरगति पाई। उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। भारत सरकार और रक्षा मंत्रालय के रिकॉर्ड में भी उनकी वीरता को 1965 के युद्ध की महत्वपूर्ण घटनाओं में याद किया गया है।
इतिहास गवाह है कि 1965 के युद्ध में पाकिस्तान ने पंजाब के खेमकरण क्षेत्र की ओर बड़े बख्तरबंद हमले की योजना बनाई थी। उसका उद्देश्य भारतीय क्षेत्र में तेजी से बढ़त बनाना और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा करना था। पाकिस्तानी सेना के पास अमेरिकी मूल के M47 और M48 पैटन टैंक थे। उस दौर में इन टैंकों को आधुनिक और शक्तिशाली बख्तरबंद हथियार माना जाता था।
भारत के सामने चुनौती आसान नहीं थी। भारी टैंकों से लैस दुश्मन के दस्ते को रोकने के लिए भारतीय सैनिकों को भूभाग, छिपने की जगहों और एंटी-टैंक हथियारों का प्रभावी इस्तेमाल करना था। असल में उत्तर की लड़ाई में भारतीय सेना ने इसी रणनीति का इस्तेमाल किया।
रक्षा मंत्रालय के दस्तावेजों और भारत सरकार के आधिकारिक विवरणों में असल उत्तर की लड़ाई को 1965 के युद्ध की महत्वपूर्ण सैन्य घटनाओं में शामिल किया गया है। 2025 में 1965 के युद्ध की डायमंड जुबली के अवसर पर रक्षा मंत्रालय ने भी अब्दुल हमीद को उन वीर सैनिकों में याद किया, जिन्होंने दुश्मन के टैंक हमले के सामने अदम्य साहस दिखाया था।
सितंबर 1965 में खेमकरण सेक्टर में लड़ाई तेज हुई। असल उत्तर गांव और उसके आसपास का क्षेत्र भारतीय और पाकिस्तानी सेनाओं के बीच भीषण टकराव का केंद्र बन गया।
भारतीय सैनिकों ने इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों का फायदा उठाया। खेतों और नहरों से घिरे इलाके में पाकिस्तानी टैंकों की आवाजाही आसान नहीं थी। भारतीय सेना ने ऐसी स्थिति तैयार की जिसमें दुश्मन के टैंक अपेक्षाकृत सीमित रास्तों से आगे बढ़ने को मजबूर हुए।
इसी मोर्चे पर 4 ग्रेनेडियर्स की टुकड़ी तैनात थी। कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद इसी यूनिट का हिस्सा थे। उनके पास 106 मिमी रिकॉयलेस राइफल से लैस एक जीप थी। यह हथियार दुश्मन के टैंकों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता था, लेकिन इसके लिए बेहद सटीक निशाने और जोखिम उठाने वाले साहस की जरूरत थी।
युद्ध की तस्वीर की कल्पना कीजिए-एक तरफ भारी-भरकम पैटन टैंक और दूसरी तरफ अपेक्षाकृत हल्की जीप पर एंटी-टैंक हथियार। सामान्य परिस्थितियों में यह मुकाबला बराबरी का नहीं माना जाता। लेकिन युद्धभूमि में अब्दुल हमीद ने अपनी रणनीति और निशानेबाजी से इस अंतर को काफी हद तक बेअसर कर दिया।
उन्होंने खुले मैदान में सीधे टैंकों के सामने खड़े होने के बजाय भूभाग और छिपने की जगहों का इस्तेमाल किया। जैसे ही पाकिस्तानी टैंक उनकी प्रभावी फायरिंग रेंज में आते, वह तेजी से निशाना साधते और हमला करते। इसके बाद अपनी स्थिति बदलना भी जरूरी था, क्योंकि दुश्मन की नजर पड़ते ही जवाबी गोलाबारी का खतरा बढ़ जाता था।
रक्षा मंत्रालय के 2025 के आधिकारिक विवरण में कहा गया है कि अब्दुल हमीद ने लगातार मशीनगन और टैंक फायर के बीच कई दुश्मन टैंकों को नष्ट करते हुए अपना जीवन बलिदान किया।
अब्दुल हमीद की वीरता के साथ एक तथ्य अक्सर अलग-अलग स्रोतों में अलग संख्या के साथ सामने आता है। कई लोकप्रिय विवरणों में उनके द्वारा सात या आठ पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट करने का उल्लेख मिलता है। कुछ स्रोत बताते हैं कि उन्होंने आठ टैंकों को तबाह किया और नौवें टैंक को निशाना बनाते समय वीरगति पाई।
हालांकि उनके परमवीर चक्र के आधिकारिक प्रशस्ति-पत्र से संबंधित विवरणों में टैंकों की संख्या को लेकर अलग-अलग प्रकाशित संदर्भ मिलते हैं। इसलिए समाचार लेख में संख्या को लेकर सावधानी जरूरी है।
रक्षा मंत्रालय और PIB के हालिया आधिकारिक स्मरण में भी उनकी वीरता को मुख्य रूप से दुश्मन के अनेक टैंकों को नष्ट करने और भारी टैंक एवं मशीनगन फायर के बीच शहादत देने के रूप में वर्णित किया गया है।
इसलिए उनकी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सिर्फ टैंकों की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि उन्होंने अत्यंत जोखिम भरे हालात में दुश्मन के बख्तरबंद हमले को चुनौती दी।
10 सितंबर 1965 अब्दुल हमीद के जीवन का आखिरी दिन था। वह लगातार दुश्मन के टैंकों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे थे। एक के बाद एक हमलों के बीच उनकी स्थिति भी दुश्मन की नजर में आ गई।
उन्होंने पीछे हटने के बजाय अपना अभियान जारी रखा। इसी दौरान पाकिस्तानी टैंक और मशीनगन की गोलाबारी की चपेट में उनकी जीप आ गई। वह गंभीर रूप से घायल हुए और युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए।
भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में उनके बलिदान का उल्लेख इसी असाधारण सैन्य साहस के संदर्भ में किया गया है।
उनकी शहादत ने भारतीय सैनिकों के मनोबल को और मजबूत किया। असल उत्तर में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी बख्तरबंद हमले को रोकने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की।
असल उत्तर की लड़ाई को 1965 के युद्ध की सबसे चर्चित टैंक लड़ाइयों में गिना जाता है। पाकिस्तानी सेना के बड़ी संख्या में टैंक भारतीय मोर्चे के सामने पहुंचे थे, लेकिन भारतीय सैनिकों ने इलाके की परिस्थितियों और अपनी रक्षात्मक रणनीति का इस्तेमाल करते हुए उनके हमले को विफल किया।
युद्ध के बाद इस इलाके में बड़ी संख्या में नष्ट या छोड़े गए पाकिस्तानी टैंक दिखाई दिए। इसी वजह से असल उत्तर को लोकप्रिय रूप से ‘पैटन टैंकों का कब्रिस्तान’ कहा जाने लगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2015 में पंजाब के 1965 युद्ध स्मारकों की यात्रा के दौरान असल उत्तर गांव में शहीद वीर अब्दुल हमीद की वीरता को याद किया था। PIB के आधिकारिक रिकॉर्ड में असल उत्तर की लड़ाई को उनके शौर्य से जोड़ा गया है।
अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में हुआ था। उनके पिता मोहम्मद उस्मान दर्जी का काम करते थे। अब्दुल हमीद ने भी शुरुआती जीवन में परिवार के काम में हाथ बंटाया।
दिसंबर 1954 में वह भारतीय सेना में भर्ती हुए और 4 ग्रेनेडियर्स में तैनात हुए। सेना में रहते हुए उन्होंने अलग-अलग चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना किया। 1962 के भारत-चीन युद्ध में भी उनकी यूनिट ने हिस्सा लिया था।
सन 1965 का युद्ध उनके सैन्य जीवन का वह अध्याय बना, जिसने उन्हें भारतीय इतिहास में अमर कर दिया।
अब्दुल हमीद को मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया। यह भारत का सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार है। उनका नाम उन चुनिंदा सैनिकों में दर्ज है जिन्होंने युद्धभूमि में असाधारण साहस और सर्वोच्च बलिदान का परिचय दिया।
सन 2015 में 1965 के युद्ध की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित ‘शौर्यांजलि’ कार्यक्रम में भी रक्षा मंत्री ने कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद की वीरता को विशेष रूप से याद किया था। PIB के अनुसार, इस अवसर पर उनके शौर्य को देश के सैन्य इतिहास की प्रेरक गाथा के रूप में रेखांकित किया गया।
सन 2025 में 1965 के युद्ध की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर भी केंद्र सरकार ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। रक्षा मंत्रालय ने कहा कि उन्होंने दुश्मन के टैंकों के हमले के बीच अनेक टैंकों को नष्ट करते हुए अपना जीवन न्योछावर किया।
अब्दुल हमीद की कहानी सिर्फ एक सैनिक की वीरगाथा नहीं है। यह भारतीय सेना के उस जज्बे की कहानी है, जिसमें सैनिक हथियारों की तुलना नहीं करता, बल्कि अपने सामने खड़े खतरे का मुकाबला करता है।
पैटन टैंक उस समय दुश्मन की बख्तरबंद ताकत का प्रतीक थे। उनके सामने एक हल्की जीप और एंटी-टैंक गन के साथ खड़े अब्दुल हमीद ने दिखाया कि युद्ध में तकनीकी ताकत के साथ साहस, प्रशिक्षण, रणनीति और अदम्य इच्छाशक्ति भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
उनका बलिदान यह भी याद दिलाता है कि भारतीय सेना की वीरता किसी धर्म, जाति या क्षेत्र की सीमा में नहीं बंधती। अब्दुल हमीद भारत के उस सैनिक का नाम हैं, जिसने देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
10 सितंबर 1965 को असल उत्तर की धरती पर दी गई उनकी कुर्बानी आज भी भारतीय सैन्य इतिहास में उसी गर्व के साथ याद की जाती है—क्योंकि कुछ शहीद मरते नहीं, वे देश की स्मृति में हमेशा जीवित रहते हैं।
Updated on:
15 Aug 2026 03:08 pm
Published on:
15 Aug 2026 03:08 pm
