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पिता का सपना, बेटी का स्वर्णिम इतिहास: अस्मिता डे के संघर्ष और सफलता की महागाथा

Gold Medal : अस्मिता डे की प्रेरणादायक कहानी ; जानिए कैसे एक साइकिल मैकेनिक की बेटी ने पिता के निधन और आर्थिक संघर्षों से उबरकर 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो में भारत के लिए ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीता।
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भारत

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Chitra Badoliya

Aug 02, 2026

Asmita Dey

अस्मिता डे: संघर्ष से सफलता तक! (Ai)

“मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है; पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।”

इन पंक्तियों को 23 वर्षीय अस्मिता डे ने अपने अदम्य साहस, समर्पण और मेहनत के बल पर सच कर दिखाया है। शुक्रवार को ग्लासगो (स्कॉटलैंड) में आयोजित 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में महिलाओं के 48 किलोग्राम जूडो वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर अस्मिता ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया। वे इस स्पर्धा में जूडो में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला जूडो खिलाड़ी बन गई हैं। यह स्वर्णिम सफलता सिर्फ अस्मिता की मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक साइकिल मैकेनिक पिता के असीम त्याग, एक मां की अडिग हिम्मत और एक बेटी के कभी न हार मानने वाले जज्बे की अनूठी मिसाल है।

मिट्टी के घर से कॉमनवेल्थ के मैट तक का सफर

अस्मिता डे का जन्म त्रिपुरा के एक छोटे से कस्बे बेलोनिया में हुआ था। उनका परिवार एक साधारण मिट्टी के घर में रहता था। उनके पिता पेशे से एक साइकिल मैकेनिक थे, जिनकी रोजाना की कमाई मात्र ₹300 के आसपास थी। सीमित वित्तीय साधनों के बावजूद, उनके पिता का दिल और सपने बहुत बड़े थे।

जब खेल के शुरुआती दिनों में अस्मिता को घुटने की गंभीर चोट (Knee Injury) लगी, तो आर्थिक तंगी उनके पिता के आड़े नहीं आई। उन्होंने अपनी बेटी के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी, दिल्ली जाकर उसका इलाज करवाया और महंगी दवाइयां खरीदीं, ताकि अस्मिता एक बार फिर जूडो मैट पर उतर सके। अस्मिता के लिए उनके पिता सिर्फ एक अभिभावक नहीं, बल्कि उनके सबसे बड़े मार्गदर्शक और स्तंभ थे।

पिता का असामयिक निधन: एक गहरा भावनात्मक और आर्थिक आघात

दिसंबर 2025 में अस्मिता के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उनकी दुनिया हिलाकर रख दी। उनके पिता का अचानक ब्रेन स्ट्रोक के कारण निधन हो गया। पिता के जाने से अस्मिता भावनात्मक रूप से पूरी तरह टूट गईं। अस्मिता बताती हैं:

  • पिताजी के जाने के बाद मुझे लगा कि मेरे सारे सपने बिखर गए हैं। मैट पर लौटने का ख्याल भी मन से गायब हो चुका था।
  • आर्थिक तंगी और पिता को खोने का गम इन दोहरे संकट ने अस्मिता पर खेल छोड़ने का भारी दबाव बना दिया था। ऐसा लग रहा था कि यह स्वर्णिम सफर यहीं थम जाएगा।

मां की प्रेरणा: टूटने से बचा सपना

कठिन परिस्थितियों में जब अस्मिता ने खेल से दूरी बनाने का मन बना लिया था, तब उनकी मां उनके लिए शक्ति का मुख्य स्रोत बनीं। पिता के निधन के महज 10 दिन बाद, उनकी माँ ने अस्मिता के आंसुओं को पोंछते हुए कहा:

  • अगर मैं आज तुम्हें रोक दूंगी या रोने दूंगी, तो तुम्हारे पिता ऊपर से सोचेंगे कि तुमने उनके सपने को तोड़ दिया। तुम्हें वापस जाना होगा और उनके सपने को पूरा करना होगा।
  • मां की इन पंक्तियों ने अस्मिता के भीतर सोई हुई हिम्मत को फिर से जगा दिया। वे तुरंत भोपाल स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI Center, Bhopal) पहुंचीं और अपनी ट्रेनिंग दोबारा शुरू कर दी।

उत्तर प्रदेश पुलिस की वर्दी और राष्ट्रीय पहचान

अपनी कड़ी मेहनत और खेल प्रतिभा के दम पर अस्मिता को उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्ति मिली। वर्दी पहनने के बाद भी उनका ध्यान अपने मुख्य लक्ष्य जूडो से कभी नहीं भटका। राष्ट्रीय जूडो टीम की नियमित सदस्य के रूप में उन्होंने लगातार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया और आखिरकार 2026 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स की भारतीय टीम में जगह बनाई।

स्वर्णिम सफलता: इतिहास के पन्नों में दर्ज हुई उपलब्धि

स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में अस्मिता ने भारत का प्रतिनिधित्व 48 किलोग्राम भार वर्ग में किया। टूर्नामेंट के दौरान उन्होंने असाधारण तकनीक, गति और मानसिक मजबूती का परिचय देते हुए अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ दिया और भारत की झोली में स्वर्ण पदक डाल दिया। जब राष्ट्रगान की धुन बजी और तिरंगा लहराया, तो अस्मिता की आंखों में खुशी के साथ-साथ अपने दिवंगत पिता की यादों के आंसू भी थे। यह स्वर्ण पदक उनके पिता के त्याग को दी गई सबसे बड़ी श्रद्धांजलि थी।

अस्मिता की कहानी से मिलने वाली सीख

अस्मिता डे की यह यात्रा केवल एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह हर उस भारतीय परिवार की कहानी है जो सीमित संसाधनों में बड़े सपने देखने की हिम्मत रखता है।

  • सपनों की कोई कीमत नहीं होती: एक साइकिल मैकेनिक का ₹300 प्रतिदिन कमाना भी उसकी बेटी को अंतरराष्ट्रीय चैंपियन बनने से नहीं रोक सका।
  • परिवार का समर्थन ही सबसे बड़ी ताकत है: कठिन से कठिन दौर में परिवार का साथ और मां की प्रेरणा से किसी भी चुनौती से पार पाया जा सकता है।
  • दृढ़ संकल्प और वापसी (Resilience): जीवन में असफलताएं और व्यक्तिगत त्रासदी आ सकती हैं, लेकिन जो गिरकर संभलना जानता है, इतिहास वही रचता है।

आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा

अस्मिता डे का स्वर्णिम सफर त्रिपुरा की गलियों से शुरू होकर पूरे भारत और विश्व पटल तक फैल चुका है। उनकी यह उपलब्धि न सिर्फ भारतीय खेल जगत के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि देश की लाखों बेटियों के लिए एक जीवंत मिसाल है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विषम क्यों न हों, यदि हौसला और मेहनत सच्ची हो, तो कोई भी सपना असंभव नहीं होता। अस्मिता ने साबित कर दिया है कि सपने सिर्फ व्यक्तिगत नहीं होते, वे पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों की धरोहर होते हैं।