
सांकेतिक इमेज (सोर्स- ChatGpt)
शहरों में बढ़ते जल संकट के बीच बायो-फिल्टरिंग तकनीकों का उपयोग एक नया और प्रभावी समाधान बनकर उभर रहा है। यह तकनीक पारंपरिक रासायनिक या ऊर्जा-गहन प्रणालियों की तुलना में अधिक टिकाऊ, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प प्रदान करती है। आइए देखें कि क्या आपके शहर में यह तकनीक लागू हो रही है और इसका असर क्या हो सकता है?
बायो-फिल्टरिंग प्राकृतिक या इंजीनियर्ड सिस्टम होते हैं। जिनमें ग्रेवल, रेत, कंपोस्ट जैसे फिल्टर मीडिया और सूक्ष्मजीवों का संयोजन होता है, जो दूषित पानी या हवा को साफ करते हैं। उदाहरण के लिए, ग्रीन बायो फिल्टर (GBF) में फिल्टर बेड पर प्राकृतिक कार्बन चक्र आधारित बैक्टीरिया काम करते हैं, जो कार्बनिक पदार्थों को कार्बन डाइऑक्साइड और पानी में बदल देते हैं। जिससे बदबू नहीं होती है और रोगाणुओं की संख्या भी कम होती है। इस तरह की तकनीकें ऊर्जा या रसायनों पर निर्भर नहीं होतीं और शहरी जल प्रबंधन के लिए उपयुक्त हैं।
दिल्ली जल बोर्ड के 'सुझला धारा' प्रोजेक्ट के तहत, केशोपुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में 2015 में 80 किलोलीटर प्रति दिन क्षमता वाला बायो-फिल्टर सिस्टम लगाया गया था। इस सिस्टम में वर्मी-फिल्ट्रेशन और नैनो-मेम्ब्रेन तकनीक का उपयोग होता है। जिससे लगभग 85% सीवेज को फिल्टर कर पीने योग्य पानी बनाया जा सकता है। यह तकनीक WHO और BIS मानकों के अनुरूप पानी तैयार करती है।
1990 के दशक में विकसित वर्टिकल इको-फिल्ट्रेशन तकनीक ने घरेलू और औद्योगिक जल को बिना रसायन या बिजली के प्रभावी रूप से साफ किया। बाद में इसे हॉरिजॉन्टल इको-फिल्ट्रेशन या ग्रीन ब्रिज सिस्टम में बदला गया, जिसे कई स्थानों पर लागू किया गया है। इसी तकनीकी पर पुणे में 2003, उदयपुर में आहर नदी पर 2010 और प्रयागराज के रसूलाबाद घाट पर 2011 में लगा फिल्टर सिस्टम इसके उदाहरण हैं। उदयपुर में इस तकनीक से घुलनशील ऑक्सीजन स्तर 0 से 8 मिलीग्राम/लीटर तक बढ़ा, जिससे मछुआरों और किसानों को लाभ हुआ।
शहरों में बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और भूजल स्तर में गिरावट जैसे कारक जल संकट को बढ़ा रहे हैं। बायो-फिल्टरिंग तकनीकें जल की बचत, जल पुनर्चक्रण और पारंपरिक जल स्रोतों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, वर्मी-फिल्ट्रेशन से सीवेज को दोबारा उपयोगी पानी में बदलकर शहरों में जल सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।
अगर आपके शहर में बायो-फिल्टरिंग तकनीक लागू हो रही है, तो यह आमतौर पर नगर निगम, जल बोर्ड या स्थानीय संस्थाओं द्वारा संचालित किसी STP या जल पुनर्चक्रण परियोजना के तहत होगा। इसकी जानकारी के लिए अपने नगर निगम या जल बोर्ड की वेबसाइट या कार्यालय से पूछें कि क्या वर्मी-फिल्टर, ग्रीन बायो-फिल्टर या वर्टिकल/हॉरिजॉन्टल इको-फिल्ट्रेशन जैसी तकनीकें लागू की जा रही हैं?
स्थानीय STP या जल पुनर्चक्रण केंद्रों का दौरा करें और देखें कि क्या फिल्टर बेड, कीट आधारित सिस्टम या नैनो-मेम्ब्रेन तकनीक का उपयोग हो रहा है? अगर आपके शहर में यह तकनीकी लागू नहीं हुई है तो स्थानीय प्रतिनिधियों या नगर निगम को यह सुझाव दे सकते हैं कि यह तकनीकी जल संकट से निपटने में कारगर हो सकती है।
यदि आपके शहर में जल संकट, सीवेज समस्या या जल पुनर्चक्रण की आवश्यकता है, तो बायो-फिल्टरिंग तकनीकें प्रभावी विकल्प हो सकती हैं। वे कम लागत, कम रखरखाव और पर्यावरण-अनुकूल समाधान प्रदान करती हैं। हालांकि, तकनीक की सफलता के लिए स्थानीय जल गुणवत्ता, जल प्रवाह, रखरखाव क्षमता और संस्थागत समर्थन जैसे कारकों का ध्यान रखना जरूरी है।
बायो-फिल्टरिंग तकनीकें जैसे- वर्मी-फिल्ट्रेशन हो, ग्रीन बायो फिल्टर या ग्रीन ब्रिज सिस्टम, ये सभी शहरी जल संकट का एक व्यवहारिक और टिकाऊ समाधान पेश करती हैं। दिल्ली के केशोपुर STP में लागू 80 KLD वर्मी-फिल्टर सिस्टम और उदयपुर, पुणे जैसे शहरों में ग्रीन ब्रिज तकनीक के सफल प्रयोग इस बात की पुष्टि करते हैं। यदि आपके शहर में अभी तक यह तकनीक नहीं आई है, तो यह समय है कि आप स्थानीय प्रशासन से इसके संभावित लाभ और लागू करने की प्रक्रिया पर चर्चा करें।
बायो-फिल्टरिंग न केवल जल शुद्धिकरण में सहायक है, बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी मदद करती है। यह तकनीक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करती है और स्थानीय जैव विविधता को बढ़ावा देती है। इसके अलावा, यह तकनीक स्थानीय समुदायों को रोजगार के अवसर भी प्रदान कर सकती है, क्योंकि इसके रखरखाव और संचालन के लिए स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, बायो-फिल्टरिंग तकनीकें न केवल जल संकट का समाधान प्रस्तुत करती हैं, बल्कि व्यापक पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ भी प्रदान करती हैं।
Updated on:
10 Aug 2026 03:32 pm
Published on:
10 Aug 2026 03:32 pm
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