
Bone fracture without injury due to cancer multiple myeloma: भारत में बढ़ती उम्रदराज लोगों की संख्या ने बढ़ाई मेडिकल जगत की चिंता (AI Creative)
Bone fracture without injury: रामेश्वर गुप्ता की उम्र 58 साल है। पिछले कुछ महीनों से पीठ में हल्का दर्द रहता था, जिसे उन्होंने उम्र का असर समझकर नजरअंदाज कर दिया। एक दिन बिस्तर से उठते वक्त अचानक कट जैसी आवाज आई और उनकी पसली में फ्रैक्चर हो गया, बिना गिरने या बिना किसी चोट के। जांच में पता चला कि यह कोई सामान्य बुढ़ापे का दर्द नहीं, बल्कि मल्टीपल मायलोमा नाम का एक खतरनाक ब्लड कैंसर था।
ये कहानी रामेश्वर की अकेली कहानी नहीं है, डॉक्टरों के मुताबिक ऐसे बिना वजह फ्रैक्चर अक्सर किसी गंभीर बीमारी का पहला संकेत होते हैं, जिस पर आमतौर पर व्यक्ति का ध्यान सबसे अंत में जाता है। यानी जब जाता है, तब तक देर हो चुकी होती है।
मल्टीपल मायलोमा हड्डियों का कैंसर नहीं, बल्कि बोन मैरो (अस्थि मज्जा) का कैंसर है। बोन मैरो हड्डियों के अंदर मौजूद वह नरम टिशु है, जो खून बनाता है। इसमें मौजूद प्लाज्मा कोशिकाएं, जो शरीर को इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करती हैं, असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं। ये असामान्य कोशिकाएं न सिर्फ स्वस्थ खून की कोशिकाओं की जगह ले लेती हैं, बल्कि हड्डियों को अंदर से खोखला भी बनाने लगती हैं।
यही कारण है कि हल्के दबाव, झुकने, खांसने या बिस्तर से उठने भर से भी हड्डी टूट सकती है, इसे मेडिकल भाषा में पैथोलॉजिकल फ्रैक्चर कहा जाता है।
इसका सटीक कारण आज भी विज्ञान की खोज का विषय है, लेकिन शोध बताते हैं कि उम्र बढ़ना (जयादातर मरीज 60-70 साल के बीच), मोटापा, कुछ जीन बदलाव (genetic mutations), पहले से मौजूद MGUS नाम की हल्की स्थिति और रेडिएशन या कुछ रसायनों के संपर्क में लंबे समय तक रहना खतरा बढ़ाते हैं। पुरुषों में इसका खतरा महिलाओं से थोड़ा ज्यादा पाया गया है।
अच्छी खबर यह है कि पिछले दो दशकों में मल्टीपल मायलोमा के इलाज में बड़ी प्रगति हुई है। कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट और हड्डियों को मजबूत रखने वाली बिसफॉस्फोनेट दवाएं मिलकर मरीज की जीवन गुणवत्ता और उम्र दोनों बेहतर बना रही हैं। समय पर पहचान होने पर मरीज सालों तक सामान्य जीवन जी सकते हैं। इसलिए बुजुर्गों में अस्पष्ट हड्डी दर्द को कभी हल्के में न लें।
भारतीय जनसंख्या-आधारित कैंसर रजिस्ट्री के एक अध्ययन में 2012-14 की अवधि में करीब 1,916 मायलोमा के मामले दर्ज किए गए, जो कुल कैंसर मामलों का लगभग 1.19% थे।
पुरुषों में उम्र-समायोजित दर 1.13 प्रति लाख और महिलाओं में 0.81 प्रति लाख पाई गई। यह वैश्विक औसत से थोड़ी कम है, लेकिन भारत के दक्षिणी और उत्तरी क्षेत्रों में यह दर सबसे ज्यादा और पूर्वोत्तर में सबसे कम देखी गई। ज्यादातर मरीज 60-69 साल की उम्र वर्ग के थे।
एक हालिया वैश्विक अध्ययन (2021 के आंकड़ों पर आधारित) के मुताबिक, दुनिया की सबसे बड़ी आबादी होने के कारण भारत भी मायलोमा के कुल मामलों, प्रचलन (prevalence) और रोग-भार (disability-adjusted life years) के मामले में ऊंचे स्थान पर है।
भारत में मामले बढ़ने के पीछे मुख्य वजहें मानी जा रही हैं, बढ़ती उम्रदराज आबादी, बेहतर जांच सुविधाएं (जिससे पहले छूट जाने वाले मामले अब पकड़ में आ रहे हैं), शहरीकरण और बदलती जीवनशैली।
GLOBOCAN 2022 के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में दुनिया भर में करीब 1,88,000 नए मायलोमा मामले और लगभग 1,21,000 मौतें दर्ज हुईं। पूर्वी एशिया में सबसे ज्यादा (21%) मामले पाए गए, इसके बाद उत्तरी अमेरिका (19%) और दक्षिण-मध्य एशिया (जिसमें भारत शामिल है, करीब 11%) का स्थान रहा।
सबसे ज्यादा घटना-दर ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड और उत्तरी अमेरिका में देखी गई। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 2045 तक वैश्विक मामले बढ़कर करीब 3,21,000 सालाना तक पहुंच सकते हैं, यानी करीब 71% की बढ़त, मुख्यतः बढ़ती और उम्रदराज होती आबादी के कारण।
एक अन्य अध्ययन के अनुसार करीब 90% मायलोमा मरीज़ों में हड्डियों को नुकसान (osteolytic lesions) देखा जाता है और लगभग 60% मरीजों को किसी न किसी समय पैथोलॉजिकल फ्रैक्चर का सामना करना पड़ता है।
अगर आपके घर में कोई बुजुर्ग बार-बार कमर दर्द, अस्पष्ट थकान या बिना चोट लगे हड्डी टूटने की शिकायत करे, तो इसे सामान्य उम्र का असर मानकर टालें नहीं। समय पर ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट और जरूरत पड़ने पर बोन मैरो जांच करवाना जानलेवा देरी से बचा सकता है। शुरुआती पहचान ही इस बीमारी से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार है।
Updated on:
24 Aug 2026 10:10 am
Published on:
24 Aug 2026 10:10 am
