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शी जिनपिंग के साथ 400 लोग क्यों? इस बार चीन का प्रतिनिधिमंडल भारत से क्या-क्या बात करने आया है? जानें सब!

India China Trade: शी जिनपिंग का भारत दौरा सिर्फ एक साधारण यात्रा नहीं है, बल्कि चीन-भारत संबंधों के भविष्य का खेल बदलने वाला मौका हो सकता है, जानिए इस 400 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के पीछे की असली कहानी और इसके संभावित लाभ और जोखिम क्या हो सकते हैं?
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Sanjana Kumar

Sep 12, 2026

India China Trade

India China Trade: 400 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल के साथ भारत पहुंचे राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (AI Creative)

India China Trade: भारत में इस बार ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ लगभग 400 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के संभावित आगमन की खबर ने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। सात साल में शी का पहला भारत दौरा है और वो भी एक बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ उनका भारत आना, दोनों देशों के बीच बढ़ते आर्थिक-राजनीतिक संवाद का संकेत माना जा रहा है। तो चलिए, आखिर इस यात्रा के पीछे क्या कारण हैं, भारत की चीन पर निर्भरता कितनी है और शी-मोदी की मुलाकात के संभावित लाभ-जोखिम पर डालते हैं एक नजर।

शी जिनपिंग के साथ 400 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल क्यों?

सूत्रों के मुताबिक, सितंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने के लिए शी जिनपिंग के साथ लगभग 400 अधिकारियों का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल भारत आ चुका है। यह प्रतिनिधिमंडल पिछले दौरे (2019 में) की तुलना में दोगुना है, जब उनके साथ लगभग 200 अधिकारी थे। इस विस्तार को लेकर माना जा रहा है कि चीन इस यात्रा को केवल एक औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक और रणनीतिक बातचीत का मंच बनाना चाहता है।

प्रतिनिधिमंडल में शामिल लोगों में सरकारी अधिकारी, व्यापार प्रतिनिधि, सुरक्षा और प्रोटोकॉल टीम के सदस्य हो सकते हैं, जो होटल, सुरक्षा व्यवस्था और द्विपक्षीय वार्ता की तैयारियों में जुटे गए हैं। बताया जा रहा है कि यह द्विपक्षीय वार्ता 12 सितंबर शाम 5.45 बजे होगी।

भारत चीन पर कितना निर्भर

भारत की चीन पर निर्भरता की तस्वीर दोनों देशों के बीच व्यापार में भारी असंतुलन दिखाती है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने चीन से लगभग 131.6 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि निर्यात मात्र 19.47 अरब डॉलर रहा, जिससे व्यापार घाटा लगभग 112.16 अरब डॉलर रहा। इसी अवधि में अप्रैल-जून 2026 में आयात 38 अरब डॉलर और निर्यात 5.59 अरब डॉलर रहा, जिससे तिमाही घाटा लगभग 32.5 अरब डॉलर रहा।

DGCI&S के आंकड़ों बताते हैं कि, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा लगभग 100.9 अरब डॉलर था। इसके अलावा, अप्रैल 2025-मार्च 2026 की अवधि में आयात 154.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 16% की वृद्धि दर्शाता है।

आंकड़ों से जानें कैसी निर्भरता

आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि भारत चीन से कई महत्वपूर्ण वस्तुएं आयात करता है। इनमें सक्रिय फार्मास्यूटिकल घटक (APIs), ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, मोबाइल फोन पार्ट्स, मशीनरी और पूंजीगत सामान। वित्त वर्ष 2024-25 में ऑटो कंपोनेंट्स का कुल आयात 7.17 अरब डॉलर था, जिसमें से चीन से 1.91 अरब डॉलर का हिस्सा था। NITI Aayog के आंकड़ों के मुताबिक, Q1 FY26 में चीन से आयात कुल आयात का लगभग 43% था।

लाभ और जोखिम

लाभ: चीन से सस्ते और उच्च गुणवत्ता वाले मध्यवर्ती और पूंजीगत सामान मिलने से भारत की विनिर्माण और निर्यात क्षमता को बढ़ावा मिलता है।

-शी जिनपिंग के दौरे से सीमा तनाव में कमी और कूटनीतिक संवाद को बढ़ावा मिल सकता है। विशेषज्ञ कमर आगा के अनुसार, यह दौरा भारत-चीन संबंधों में एक टर्निंग प्वाइंट हो सकता है।

जोखिम: भारी व्यापार घाटा भारत की आर्थिक सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। चीन पर निर्भरता के कारण आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान या राजनीतिक तनाव की स्थिति में भारत की उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है।

-रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर निर्भरता (जैसे फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स) भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में बाधा बन सकती है।

इस मुलाकात का भविष्य क्या?

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान द्विपक्षीय वार्ता में व्यापार संतुलन, निवेश, सीमा मुद्दे और तकनीकी सहयोग जैसे विषय प्रमुख रहेंगे। भारत को इस अवसर का उपयोग चीन पर निर्भरता घटाने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने के लिए करना चाहिए। साथ ही, इस दौरे से सीमा पर स्थिरता और कूटनीतिक संवाद को भी बढ़ावा मिल सकता है।

अब महत्वपूर्ण है कि भारत को चीन पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू विनिर्माण (Make in India), वैकल्पिक व्यापार साझेदारों और आत्मनिर्भरता योजनाओं की तेजी की दिशा में काम करना होगा। इसके साथ ही अब इस दौरे से उत्पन्न कूटनीतिक अवसरों का उपयोग भी सीमा स्थिरता और आर्थिक संतुलन सुधारने में किया जाए तो बेहतर होगा।

तभी यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत-चीन संबंधों में नए अध्याय की शुरुआत हो सकता है, जहां आर्थिक संतुलन, रणनीतिक आत्मनिर्भरता और कूटनीतिक संवाद साथ-साथ आगे बढ़ें।